गुरुवार, 2 जनवरी 2020

धधकता-बदलता पलामू


पलामू का नाम आते ही जो सबसे पहले छवि बनती है, वह है अकाल, भूख और बंधुआ मजदूरी की। पलामू यानी मृत्यु उपत्यका। इस छवि के निर्माण में कुछ तो प्रकृति की भूमिका रही तो कुछ नव सामंतों और जमींदारों की। इस छवि से पलामू आज भी मुक्त नहीं है। अकाल आज भी एक दो बरस के अंतराल के बाद आ ही जाता है। इसके बाद भूख का नर्तन शुरू होता है। इस नर्तन को बड़े शौक से पलामू के अधिकारी और नेता देखते हैं, क्योंकि अकाल-सूखा इनकी झोली और तिजोरी को भरने का काम करता है। यह खेल आज से नहीं, 1967 से और उसके पहले से चला आ रहा है। तब कई योजनाएं बनीं खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए। पर मजा देखिए, वे आज तक पूरी नहीं हुईं, आज तक चल रही हैं और लागत हर साल चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ रही है। सो, पलामू के चरित्र में आज भी कोई ठोस और उपलब्धिपरक बदलाव नहीं आया है। ऐसा भी नहीं कि रांची बहुत दूर है। कुल दूरी 160 किमी. है। झारखंड की राजनीति में पलामू के नेताओं की जबरदस्त दखल है। यह दखल इन्दिरा गांधी के समय भी रहा और सरकार में, पर, इन नेताओं ने पलामू के लिए कुछ विशेष किया हो, पता नहीं। कुछ ईमानदार नेता आज भी सिंचाई साधनों के लिए लड़ रहे हैं। कुछ मांग करते-करते चल बसे। पर, पलामू वहीं है। पलामू का एक चेहरा यह है। दूसरा चेहरा और भी बदसूरत है। तरह-तरह के नक्सली गुट यहां हावी हैं। जमींदारों के उत्पीडऩ से शुरू हुआ हक-हकूक की लड़ाई का आंदोलन आज कई ऐसे पड़ावों पर पहुंच बिखरा-बिखरा और भ्रष्ट नजर आता है। कुछ ऐसे जमींदरों के उत्पीडि़त लोग हैं, जो आज भी न्याय के लिए तरस रहे हैं। मलवरिया नरसंहार की याद से ही सिहरन पैदा हो जाती है। आज मलवरिया को लोग याद करना नहीं चाहते। पलामू की एक हकीकत यह भी है कि जो कभी यहां के राजा थे, वे आज रंक बन गए हैं। आज मजदूरी कर रहे हैं। पलामू का नंगा सच समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में आता रहता है। कई बड़े पत्रकारों ने यहां हफ्तों रहकर यहां की खाक छानी और रिपोर्टिंग की। मशहूर साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने यहां आकर अकाल पर कई उम्दा रिर्पोताज लिखे। रामशरण जोशी भी सत्तर के दशक में यहां आकर बंधुआ मजदूरों के दर्द को राष्ट्रीय स्तर पर ले गये। नब्बे के दशक में पी साइनाथ आए और कई रिपोर्टें लिखीं। महाश्वेता देवी ने पलामू को रामेश्वर की आंखों से देखा। वे कई बार यहां आईं। बंधुआ मजदूरों की मुक्ति आंदोलन से जुड़ीं। यहां की दशा, दर्द और दमन देखकर 'भूखÓ उपन्यास लिखा। पलामू के ही रहने वाले मनमोहन पाठक ने 'गगन घटा गहरानीÓ लिखकर स्तब्ध कर दिया। इस क्लैसिक रचना पर हिंदी में चर्चा नहीं होती। डाल्टनगंज के ही रहने वाले काशी में रह रहे कथाकार-पत्रकार श्याम बिहारी 'श्यामलÓ ने पलामू को केंद्र में रखकर 1998 में 'धपेलÓ उपन्यास लिखा, जिससे पहली बार व्यापक स्तर पर हिंदी समाज का ध्यान इस इलाके की ओर खिंचा! 'धपेलÓ पलामू के जनजीवन और वहाँ के चिरंतन संघर्ष की संपूर्णता में उजागर करने वाली पहली औपन्यासिक रचना के रूप में देश स्तर पर चर्चित हुआ, जिसकी सराहना ख्यात आलोचक नामवर सिंह तक ने की। 'श्यामलÓ का दूसरा उपन्यास 'अग्नि पुरुषÓ भी पलामू पर ही केन्द्रित है, जिसमें यहां के जनजीवन में मिथक के रूप में चर्चित 'सतुआ पाड़ेÓ की कथा के बहाने अपने समय-समाज की पड़ताल की गई है। युवा कथाकार राकेश कुमार सिंह ने भी अपने गांव-घर का ऋण लेखन से चुकाया। राकेश ने 'जहां खिले हैं रक्त पलाश', 'पठार पर कोहराÓ, 'साधो, यह मुर्दों का गांवÓ 'आपरेशन महिषासुरÓ के जरिए पलामू के नग्न, जटिल होते यथार्थ और इसके रक्तचरित्र को कई कोणों से देखने-समझने का प्रयत्न किया है। पलामू की यात्रा जारी है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के बड़े भाई संजीबचंद्र चट्टोपाध्याय ने पलामू नाम से एक यात्रा वृत्तांत लिखा था-1888 में। यह शायद पलामू पर लिखी कोई पहली साहित्यिक कृति मानी जा सकती है। 

बदलता पलामू, सिकुड़ता पलामू
पलामू आज सिकुड़ गया है। पहले गढ़वा और लातेहार दोनों ही पलामू के अंग थे। एक अप्रैल, 1991 को गढ़वा अनुमंडल को जिला घोषित किया गया और लातेहार अनुमंडल को दस साल बाद, चार अप्रैल, 2001 को जिला बना दिया गया। पलामू पहले परगना था। 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी के मातहत हुआ। एक जनवरी, 1892 को यह जिला बना। सौ साल बाद 3 मई, 1993 को इसे प्रमंडल बनाया गया। पलामू, धरती का प्राचीनतम भूखंड माना जाता है। पलामू के नामकरण पर भी तरह-तरह के कयास लगाए जाते हैं। पहला तो यही कि यहां कभी खूब पाला पड़ता था, जिसके कारण फसलों, पशु-पक्षियों और जन की काफी हानि होती थी। इसलिए इसे पलामू कहा गया-यानी पाला का घर। एक दूसरा मत यह है कि इस क्षेत्र में पलायनवादियों या भागे हुए लोगों को शरण मिलती रही। सो, यह पलामू कहलाया। तीसरा मत यह है कि औरंगा नदी के किनारे स्थित किले के राजाओं की कुलदेवी 'पालामाÓ थीं, इसलिए पलामू कहा गया। पालामा यानी पालन करने वाली मां। पलामू के डिप्टी कमिश्नर रहे मैकफर्सन ने अनुमान लगाया कि पलामू द्रविड़ गोत्र का शब्द है। द्रविड़ भाषा में पाल का अर्थ दांत और आम का अर्थ पानी होता है। इसी से पलामू शब्द निकला। अनुमान कई हैं। हवलदारी रामगुप्त 'हलधरÓ ने अपनी पुस्तक 'इतिहास पलामू काÓ और रामेश्वरम ने अपने कई लेखों में पलामू शब्द पर विचार किया है। अंग्रेज जब आए तो वे पलामू को पालामऊ च्ंसंउंन लिखने लगे। कहानियाँ और भी हैं फिर भी एक बात साफ है, जब से इस अंचल को पुकारा जा रहा है, वह शब्द पलामू ही है। अब यह शब्द कहां से आया है, किसने इसे प्रचलित किया, यह आज तक अज्ञात है। एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि यहां कई जातियां आईं और बस गईं और बाद में आगे बढ़ती गईं। पर एक जाति कोल के बारे में कोई जानकारी नहीं है। कोल आदिम काल से ही यहां की उपत्यका में निवास करते आ रहे हैं और आज भी हैं। अब ये आदिम जनजाति की श्रेणी में हैं। संजीब ने इनका खूब जिक्र किया है। ये आर्यों और द्रविड़ों के आगमन से पहले से ही यहां रह रहे हैं। वे जब आए तो ये जंगलों की ओर खिसक गए और जंगल ही इनका आसरा हो गया। बहुत बाद में द्रविड़ गोत्र की मार्ह जाति आई। कहा जाता है कि यह कर्नाटक की ओर से आई। इन्होंने कई किलों का निर्माण किया, जिनके ध्वंसावशेष आज भी मौजूद हैं। फिर इसी गोत्र के मध्यकाल में उरांव आए। ये रोहतास होते हुए पलामू आए और यहां लंबे समय तक रहने के बाद रांची की ओर चले आए। रोहतासगढ़ का किला उरांवों का ही बनवाया हुआ बताया जाता है। मुगलों ने आक्रमण कर कब्जा कर लिया तो फिर वे वहां से पलायन कर गये। मुगल और उरांवों के संघर्ष की कथाएं आज भी लोकगीतों में सुरक्षित हैं। इसमें महिलाओं ने मोर्चा संभाला था। इस संघर्ष की याद में ही 'जनी शिकारÓ पर्व मनाया जाता है। पलामू के इतिहास में रकशेलों का भी बड़ा महत्व है। उनका यहां दो हजार साल पुराना इतिहास मिलता है।

पौराणिक आख्यानों में पलामू
पौराणिक आख्यानों पर विश्वास करें तो पुराने लोग कहते आ रहे हैं कि इस वन प्रांत को महाराज दशरथ ने रामजी के विवाहोत्सव के समय बाजा बजाने वालों को ईनाम में दिया था। महाभारत काल में यह वन खंड प्रतापी राजा बब्रुवाहन के राच्य में शामिल था। पांडवों ने यहां अज्ञातवास में कुछ समय भी बिताया थे। हुसैनाबाद में भीम चूल्हा को लोग उसी से जोड़कर देखते हैं। बौद्ध काल के भी कुछ अवशेष मिले हैं। हुुसैनाबाद के आस-पास प्राचीन इतिहास के कई सूत्र मौजूद हैं। प्रखंड के पंसा व सहराविरा गांव में दो स्तूप मिले हैं। स्तूप मिट्टी के बने हैं। दूसरा स्तूप सहारविरा गांव में मिला है। यह पंसा गांव से 5 किमी. दूर है। इस स्तूप की ऊंचाई तीन मीटर है और परिधि आठ मीटर। इसमें पकी ईंटों का भी इस्तेमाल हुआ है। स्तूप के बीच में पत्थर का स्तंभ है। स्तंभ के ऊपरी हिस्से पर बुद्ध की आकृति है। यह 6वीं-7वीं शताब्दी का है। पलामू में एक रॉक पेंटिंग मिली है। हुसैनाबाद अनुमंडल के महुदड़ पंचायत की लिखलाही पहाड़ी पर के इनसाइक्लोपीडिया रामेश्वरम मछली के जीवाश्म का भी जिक्र करते हैं, जो पलामू के रजडंडा, महुआडांड़ में मिला था। नेतरहाट की पहाड़ी में आठ लाख वर्ष पूर्व च्वालामुखी के विस्फोट से प्राकृतिक रंगशाला का निर्माण हुआ था, जो आज भी है।
स्पष्ट है कि पलामू का इतिहास ज्ञात इतिहास से कहीं अधिक प्राचीन है। जिले के शाहपुर, अमानत पुल, रंकाकलां, दुर्गावती पुल, बजना, वीरबंध, मैलापुल, चंदरपुर, झाबर, हाथीगारा एवं बालूगारा, नाकगढ़ पहाड़ी आदि स्थलों पर खुदाई में पूर्व, मध्य और उत्तर पाषाणकाल के साथ नव पाषाणकाल के पत्थर के औजार भी प्राप्त हुए। इनमें कुल्हाड़ी, स्क्रेपर, ब्लेड, बोरर और ब्यूरिम मुख्य हैं। भवनाथपुर के निकट प्रागैतिहासिक काल के दुर्लभ शैलचित्र भी मिले हैं। कई प्राकृतिक गुफाएं भी यहां हैं।

औरंगा नदी को निहारता पलामू किला
औरंगा नदी के तट पर पलामू किला है। 17वीं शताब्दी से चेरो वंश के राजा यहीं से राज करते थे। इस वंश के प्रथम शासक भागवत राय थे। उनका शासन 1613 ई. में शुरू हुआ था। इस वंश के सबसे प्रतापी राजा थे मेदिनी राय। गढ़वा से 16 किमी उत्तर-पूर्व में विश्रामपुर में एक गढ़ है। इसे पलामू के राजा जयकिशन राय के भाई नरपत राय ने बनवाया था। डालटनगंज के पास भी एक अधूरे किले के अवशेष हैं। इसे 18वीं शताब्दी में पलामू के ही राजा गोपाल राय ने बनवाना शुरू किया था लेकिन किला अधूरा रह गया। पलामू में पुराना किला और नया किला हैं। इतिहास की किताबों में दर्ज तथ्य के अनुसार पुराने किले से 12वीं शताब्दी की बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में एक मूर्ति मिली थी।

च्यवन ऋषि की संतान चेरो
चेरों का काल पलामू के लिए स्वर्णकाल था। इनकी उत्पत्ति च्यवन ऋषि से बताई जाती है। इस जाति से सबसे पहले नेपाल की तराई में कुमाऊं प्रांत में अपना राच्य स्थापित किया। इसके बाद इस वंश ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने राच्य कायम किए। कालांतर में इनके वंश के भगवंत राय और पूरनमल पलामू पहुंचे। जिस समय ये पलामू पहुंचे, उस समय पलामू किले पर राजा मानसिंह का अधिकार था। दोनों ने मानसिंह के दरबार में नौकरी कर ली। दोनों की सूझ-बूझ और बहादुरी से प्रसन्न होकर इन्हें सेना की कमान सौंप दी गई। लेकिन एक विश्वासघात से पलामू की तकदीर ही नहीं, इतिहास भी बदल गया। हुआ यह कि राजा मान सिंह के पुत्र का विवाह सरगुजा में तय हुआ। वे बारात लेकर सरगुजा चले गए और किले का भार अपने सरदार भगवंत राय पर छोड़ गए। मौका पाकर भगवंत राय ने मानसिंह के पूरे परिवार को मार डाला और खुद राजा बन बैठा। सेना लेकर वह आगे बढ़ा और बारात वापस लेकर लौट रहे मान सिंह का मुकाबला किया। मानसिंह हार गए और सरगुजा लौट गए। वहां मान सिंह ने वही किया जो भगवंत ने उनके परिवार के साथ किया। उन्होंने सरगुजा के राजा की हत्या कर राच्य अपने अधीन कर लिया और पूरनमल को अपना मंत्री बना लिया। यहीं से रकशेल राजा का अंत और चेरो राजवंश का उदय होता है। 

किले पर आक्रमण और मस्जिद का निर्माण
चेरो राज के संस्थापक भगवंत राय के पोते अनंत राय के शासन काल में औरंगजेब का तत्कालीन बिहार सूबेदार दाऊद खां ने पलामू पर कब्जा कर लिया। लेकिन उसके वापस लौटते ही चेरो राजा ने पुन: अधिकार कर लिया। इस बीच और घटनाएं हुईं। दाऊद खां ने पुन: 3 अप्रैल 1660 को उसे पराजित किया। इस बार उसने किले को ही नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि किले के अंदर मंदिरों को तोड़कर मस्जिद का निर्माण भी करवाया। उसी तरह किले के सिंहद्वार पर स्थित मंदिर को भी तोड़कर मस्जिद बनवाई। इसके ध्वंसावशेष आज भी किले के अंदर और बाहर मौजूद हैं। मुगलों के आगमन के साथ ही पलामू में उथल-पुथल तेज हो गई। अंग्रेजों के समय तो पूरा क्षेत्र धधक उठा। 1857 की आग यहां भी लगी और नीलांबर-पीतांबर ने इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया। 1857 के संग्राम के करीब 26 साल पहले ही झारखंड की जनजातियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का राजनीतिक अर्थ भी पहली बार 1831 के कोल विद्रोह से उजागर हुआ था। उसमें मुंडा, हो, उरांव, भुइयां आदि जनजातियां शामिल थीं। इस विद्रोह का केंद्र रांची, सिंहभूम और पलामू था। इसके बाद तो पलामू रह-रहकर धधकता रहा। और आज भी धधक रहा है। भले ही आज कारण दूसरे हों।

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