आदिवासी लोक कथाओं में बादलों की कड़क और बिजली

डॉ वेरियर ऐल्विन
भारतीय आदिवासियों के अधिकांश सृष्टि-संबंधी विश्वासों की पृष्ठभूमि में लोकप्रिय हिंदू-धर्म की परंपरा है और इंद्र, राम, भीम और कभी-कभी अर्जुन भी शास्त्र के महान पृष्ठों से आदिवासियों की गृह निर्मित पौराणिक-कथाओं को प्रेरणा देने तथा विविधता प्रदान करने के लिए चले आते हैं। बिजली मारुति के कतिपय अस्त्रों में से है और वज्र को तो पर्जन्य ने ही प्रयोग किया था।
कहा जाता है कि प्रथम पुरुष कीे आत्मा, बिजली रूप में, सबसे पहले
ऐन्थोवन ने, पश्चिमी भारत में प्रचलित विविध विश्वासों का अच्छा वर्णन किया है। बादलों की कड़क कभी इंद्र का रुष्ट स्वर है, तो कभी उसका अट्टहास। यह वह होहल्ला है, जो वह बादलों में 'गुल्ली-डंडाÓ या 'फुटबालÓ खेलते समय करता है। उसका विवाह होता है, वह युद्ध करता है, वर्षा लाने को अपना बाण चलाता है, या अपने हंटर से बादलों की पिटाई करता है। कभी बादलों की कड़क भगवान के रथ के आकाश में चलने से उत्पन्न हुई कही जाती है और यह उन नक्कारों की ध्वनि है, जो देवगण वर्षा के आने पर बजाते हैं, या यह किसी बूढ़े खूसट द्वारा आकाश में पत्थर लुढ़काने या पीसने की आवाज है।
पृथ्वी पर आई। महाभारत में कहा गया कि बिजली दधीचि की अस्थियों से निकली, पर एक और भी प्राचीन विश्वास है कि बिजली शेषनाग की फुंकार है, जो सांपों का राजा है। जिस प्रकार अग्नि काष्ठ का भक्षण करती है, उसी प्रकार बिजली जल का भक्षण कर लेती है। यह उस पर प्रहार करती है, जिसने 'बज्र-पापÓ या ब्रह्म-हत्या किया हो।

इस विषय की आदिवासी परंपराओं के अध्ययन से लेखन योग्य विविधता दृष्टिगोचर होती है और कम से कम छह अभिप्राय अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं। प्रथम और सबसे लोकप्रिय है कि बिजली एक लड़की है, जो विवाह-दिवस पर आकाश में भागी फिरती है और बादलों की कड़क उसके दुष्ट स्वामी का शोर है, जो उसके पीछे दौड़ रहा है। एक बैगा कथा वर्णन करती है कि किस प्रकार लक्ष्मण ने 'बीजलदाई कन्याÓ के लिए बारह वर्ष बिताए, जो दर्पण की भांति सुंदर थी, जिस पर एक युवक सूर्य की किरणों की प्रतिच्छाया डालता है। वह प्रकाश की भांति ही विलीन हो जानेवाली है। इस समय (12वर्ष) की समाप्ति पर उसके श्वसुर ने एक घड़ा, जिसमें उसी का रक्त भरा था, दिया और घर ले जाने और भीतर न देखने के लिए कहा। पर लक्ष्मण उसे अपने कक्ष में ले गया और खोल डाला। भीतर से उसकी वधू इतनी शक्तिशाली निकली कि छत को तोड़कर आकाश में जाकर बिजली बन गई। लक्ष्मण ने अपना धनुष-बाण संभाला ओर उसकी पीछा किया, घनगर्जन बादलों को चीरते हुए उसके बाणों का रव है।
 इसी प्रकार एक 'देवारÓ कथा में एक युवा नेता 'बेल कुंवरÓ का विवाह बीजल कन्या से होता है। वह एक बांस की नाल में छिप जाती है और उस नाल को बेल कुंवर के धनुष-बाण के साथ विवाह-स्तंभ के चारों ओर घुमाया जाता है। लड़का बांस को घर ले जाता है, पर रास्ते में-कितनी ही बार मना करने पर भी इसे मत खोलना-वह भीतर देखता है, उसकी वधू उछलकर बाहर निकल आती है ओर एक खोखले वृक्ष में छिप जाती है। बेल कुंवर उस पर बाण चलाता है, वह चरका देती है, बाण बांस के झुरमुट में लगता है। बेल कुंवर बार-बार बाण चलाता है, पर वह एक गांठ से दूसरी गांठ सरकती रहती है और अन्त में आकाश पर पहुंच जाती है। इस प्रकार बिजली अभी तक कुंवारी ही है और बादलों की कड़क सदा के लिए उसकी रुष्ट आवाज है, जब भी वह उसे देखता है, चिल्लाता है।
'कोंडÓ और 'सावराÓ कथाओं का अभिप्राय वही है। एक लड़की जो अग्नि सदृश सुंदर है, किसी लोहार के आसोत्र में ज्वालामय लोहे से उत्पन्न होती है। वह इतनी सुंदर है कि सभी लोहार उससे प्रेम करते हैं और एक ईष्र्यालु पत्नी उसे शाप देती है कि विवाह होने पर भी उसे अपने पति से सदा अलग रहना पड़ेगा। इस प्रकार जब उसका विवाह होता है तो पतिगृह जाते समय रास्ते में ही उसके कंधों में पंख निकल आते हैं और वह उड़कर आकाश चली जाती है।
ये मनोरंजक विचार हैं, पर कार्य-रूप में परिणित नहीं हुए। बिजली गिर जाना भयंकर तथा बुरी बात है। प्राय: यह पाप का दंड माना जाता है या किसी जातीय टैबू का तोडऩा। जिस वृक्ष या घर पर बिजली गिर जाती है, उसे भारी जादू से भरा समझा जाता है और वह बड़े विचार से स्पर्श या व्यवहार किया जाता है। 'सावराÓ लोगों का कहना है कि बिजली से मरने वालों की आत्मा पृथ्वी पर जुगनू बनकर लौट आती है और अपने अन्य जीवन को सदा जल-जलकर कष्ट में बिताती है।
                                                                                                                  (1959, विशाल भारत)

भवानी दयाल संन्‍यासी और उनकी किताब महात्‍मा गांधी

आज यहां हम ऐसी ही किताब की चर्चा करने जा रहे हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है। यह किताब, जो आपके हाथों में सौ साल बाद दुबारा प्रकाशित हो रही है। पुस्तक का नाम है-'सत्याग्रही महात्मा गान्धी अर्थात् मोहनदास कर्मचन्द गांधीÓ। लेखक हैं भवानी दयाल। लेखक तब दक्षिण अफ्रिका के डरबन, नेटाल में रहते थे। जन्म भी वहीं हुआ था, लेकिन मूल भारत था। भवानी दयाल ने यह पुस्तक 1916 में लिखी थी, क्योंकि प्रकाशन की तिथि 1917 है। जो
पुस्तक के लेखक, भवानी दयाल को भी जानना चाहिए, जो बाद में आर्य समाज से दीक्षा लेकर संन्यास धारण कर भवानी दयाल संन्यासी कहलाए और जिनके बारे में हमारी पीढ़ी बहुत कुछ नहीं जानती और वह प्रदेश भी, जहां से उनका वास्ता रहा।
भवानी दयाल संन्यासी का पैतृक गांव बहुआरा है। यह बिहार के सासाराम जिले में है। कुदरा से 10-12 किलोमीटर की दूरी पर। पहले यह आरा जिले में था। 'प्रवासी की कहानीÓ में भवानी दयाल संन्यासी अपने माता-पिता के बारे में जानकारी देते हैं- 'मेरी माता का नाम मोहिनी देवी था। उनका जन्म अवध में हुआ था। एक अच्छे जमींदार की बेटी थीं।...मेरे पिता का नाम जयराम सिंह था। वे बिहार के रहने वाले थे। बचपन में ही उनके मां-बाप मर गए थे।Ó मां-पिता के मिलने की कहानी किसी नाटक से कम नहीं। एब बार सरयू स्नान के मेले में संन्यासी की मां घर और गांव वालों के साथ स्नान करने अयोध्या गईं। वहां अचानक साथियों से विलग हो जाने के कारण वह भटक गईं। परिजनों को तलाशने की कोशिश की, लेकिन विफल रहीं। लाचार, मेले में एक किनारे बैठ रोने लगीं। इसी बीच एक ब्राह्मण वेशधारी आरकाटी उसके पास पहुंचा और अपने लोभ में फंसा दिया कि वह उनके परिजन से मिला देगा, लेकिन वह उसे कलकत्ते के डीपो पहुंचा दिया, जहां से जहाज लोगों को बेहतर जिंदगी का लालच देकर गोरे दक्षिण अफ्रिका ले जाते थे। इधर, जयराम सिंह भी गांव में बनियारी करते हुए काफी डांट-फटकार पाते थे। जमींदार से डांट सुनकर एक बार वे भी अपना गांव छोड़ नौकरी की आस में काशी पहुंचे और फिर यहां से वे भी आरकाटी के फंदे में फंस गए। पर, यहां का जीवन देख वह यहां से भागना चाहते थे। आरकाटी ने कहा, पांच रुपये तुम पर खर्च हुए हैं, वह दे दो, तो चले जाओ। न पांच रुपया हुआ न वे भाग सके और अंतत: वे भी उसी जहाज पर सवार कर दिए गए। इसी जहाज पर दोनों साथ आए और शादी हो गई। नेटाल में दोनों ने पांच साल किसी तरह गुजारे और किसी तरह कुछ पैसा भी बचा लिए। पता चला कि नेटाल के पास ट्रांसवाल सुंदर शहर है। यहां सोने की खान है। इसलिए नेटाल से ट्रांसवाल चले आए। यहां आकर जोहान्सबर्ग में डेरा डाला और व्यापार करने लगे। इससे आर्थिक स्थिति काफी सुधर गई। वे यहां हिंदुस्थानियों के बीच बाबूजी के नाम से ख्यात हो गए। जब यहां ट्रांसवाल इंडियन एसोसिएशन की स्थापना हुई तो जयराम सिंह प्रधान चुने गए। यहीं ट्रांसवाल के जोहान्सबर्ग में दस सितंबर, 1892 को भवानी दयाल का जन्म हुआ। हालांकि दुखद यह रहा कि सात साल बाद उनकी माता का 1899 में निधन हो गया। इसी समय यहां अंग्रेज और बोअरों के बीच युद्ध छिड़ गया था। गांधीजी ने अंग्रेेजों की इस युद्ध में बहुत मदद की। 1904 में भवानी दयाल परिवार संग पहली बार अपनी जन्मभूमि से मातृभूमि भारत आए। यहां रहने के बाद 1907 में भवानी दयाल का विवाह हुआ। पिता ने भी यहां अपनी दूसरी शादी कर ली थी। पिताजी का जब 1911 में देहांत हुआ तो घर में कलह भी शुरू हो गया। विमाता का व्यवहार भी अनुकूल नहीं था। इसलिए 1912 मेंं साढ़े आठ साल व्यतीत कर अपनी जन्मभूमि लौट गए। अपने पत्नी, छह महीने के पुत्र, छोटे भाई देवीदयाल और उनकी पत्नी के साथ। जिस दिन वहां पहुंचे तो वहां उन्हें जहाज से उतरने ही नहीं दिया गया। कानूनी अड़चन सामने आ गया। इसके बाद गांधीजी ने हस्तक्षेप किया और उनके वकील मित्र पोलक मामले को कोर्ट ले गए। किसी तरह जहाज से उतरे तो वे सीधे गांधी के आश्रम पहुंचे। पिताजी के रहते ही गांधीजी से परिचय हो गया था। पिताजी भी गांधी के आंदोलन में साथ रहे। हर स्तर पर मदद की। यहां संन्यासी ने धोबी का भी काम किया। वे गांधीजी को मजदूरों की तरह काम करते हुए देख चुके थे। इसलिए इस काम को करने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुई। वे बाबू लालबहादुर सिंह के धोबीखाने यानी लांड्री में काम करते थे। बाबू साहब ट्रांसवाल के प्रसिद्ध सत्याग्रही थे। कई बार उन्होंने जेल की यात्रा की। संन्यासी यहां कुछ दिनों में ही पक्का धोबी बन गए, लेकिन यह काम टिकाऊ न हो सका, क्योंकि 1913 के सितंबर में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का शंख फूंक दिया। सत्याग्रह में केवल भवानी दयाल ही शामिल नहीं हुए, पत्नी जगरानी देवी ने भी साथ दिया। संग्राम तेज हो गया। जेल भी जाना पड़ा। जेल से छूटे तो गांधीजी ने पत्र लिखकर कहा, फिनिक्स जाकर इंडियन ओपिनियन के हिंदी अंश का संपादन करें। यहां आकर संपादन किया। फिर सोने की खान में मजदूरी की। काम करते हुए हिंदी प्रचारिणी सभा, हिंदी रात्रि पाठशाला और हिंदी फुटबाल क्लब की स्थापना भी की। इसी समय 1914 में उन्होंने 'दक्षिण अफ्रिका के सत्याग्रह का इतिहासÓ लिखा। दो साल बाद 1916 में यह प्रकाशित हुआ। हिंदी प्रचार का काम भी चलता रहा। 1915 में जब नेटाल आए तो यहां दो साल तक हिंदी की सेवा करते रहे। इसके बाद दक्षिण अफ्रिका हिंदी साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन भी संन्यासी ने कराया। डरबन से धर्मवीर का सम्पादन किया। इसी बीच संन्यासी ने हमारी कारावास की कहानी, महात्मा गांधी का जीवन-चरित्र, वैदिक धर्म और आर्य सभ्यता, शिक्षित और किसान और नेटाली हिंदू नामक पुस्तकें लिख डालीं। संन्यासी ने अपने परिवार के भविष्य के लिए यहां 1919 में गन्ने की खेती शुरू कर दी थी। उस समय उनके दो पुत्र थे। यह सब काम करते हुए भवानी दयाल संन्यासी उन चंद भारतीयों में शामिल थे, जिन्होंने महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में चलाए गए सत्याग्रह आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभायी थी। उन्होंने भारत ही नहीं दक्षिण अफ्रीका के इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी से पहले सत्याग्रह का इतिहास लिखा। वहीं अपनी पत्नी के साथ मिल कर 'जगरानी प्रेसÓ स्थापित किया और 'हिंदीÓ नाम से पत्रिका निकाल कर हिंदी का प्रसार-प्रचार किया। 1919 में वे दूसरी बार भारत आए और अपने बच्चों को वृंदावन के गुरुकुल में प्रवेश करा दिया। यह सब हो गया तो उनकी भेंट पं बनारसी दास चतुर्वेदी से हुई। यहां रहते हुए अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन दिसंबर में हुआ तो वे अफ्रिका के हिंदुस्तानियों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। इसके बाद राजेंद्र प्रसाद से परिचय हुआ। 1920 के अगस्त में संन्यासी जी दक्षिण अफ्रिका चले गए। जिस दिन वे दक्षिण अफ्रिका पहुंचे, उसी दिन उन्हें तिलक के देहावसान व गांधीजी के असहयोग आंदोलन के श्रीगणेश का समाचार मिला। दक्षिण अफ्रिका में गांधीजी ने 1894 में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की थी। यह 1913 तक हिंदुस्तानियों की सेवा करती रही। जब 1914 में दक्षिण अफ्रिका से गांधीजी सदा के लिए विदा हो गए कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने सुप्रीम कौंसिल में दरख्वास्त देकर उसकी सारी जायदाद जब्त करा दी। इसके बाद लंबी लड़ाई के बाद 1921 को उसे पुनर्जीवित किया गया। तब भवानी दयाल को उसका प्रधान चुना गया। इस पद पर वे 18 साल तक रहे।
भवानी दयाल ने 1922 में छापाखाना खोला। इसमें उनकी पत्नी जगरानी देवी की बड़ी भूमिका रही। यहां से हिंदी समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ। दुर्भाग्य यह रहा कि जगरानी देवी का अप्रैल के दूसरे सप्ताह में निधन हो गया। अखबार का पहला अंक मई में आना था। अंक तो निश्चित समय पर आया, लेकिन जगरानी देवी जग से विदा ले चुकी थीं। भवानी दयाली ने उनकी स्मृति में छापेखाने का नाम 'जगरानी प्रेसÓ रखा। अभी पत्नी के देहांत से उबरे नहीं थे कि मातृभूमि से भी खबर आई कि विमाता और उनका इकलौता पुत्र भी अब दुनिया में नहीं रहे। फिर वे भारत आए। यहां फिर 1922 के दिसंबर में होने वाले गया कांग्रेस में भाग लिया। 1926 में अपने गांव बहुअरा में प्रवासी भवन बनवाया। 1927 के चैत्र की रामनवमी पर इस भवन का वार्षिकोत्सव हुआ और इसी अवसर पर भवानी दयाल आर्य समाज से दीक्षित होकर संन्यासी बन गए। आर्य समाज का प्रचार के साथ-साथ देश की आजादी के आंदोलन का काम भी साथ-साथ चलता रहा। मातृभूमि से जन्मभूमि की यात्रा भी होती रही। आजादी का आंदोलन भी। इसी क्रम में 1929 नमक कानून तोडऩे और जनता को भड़काने के एवज में गिरफ्तार कर लिए गए और आरा से इन्हें में 11 अप्रैल की शाम को उन्हें हजारीबाग जेल के लिए रवाना कर दिया गया। 12 को जेल में दाखिल हुए। यहां पर रहते हुए उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका निकाली। प्रारंभ में रामवृक्ष बेनीपुरी ने 'कैदीÓ निकाला। बाद में 'कारागारÓ नाम की पत्रिका निकाली। उसके संपादन का भार उन्हें सौंपा गया। बिहार के सभी नेता कारागार के लिए लेख लिखकर देते थे। कारागार का प्रथमांक 'कृष्णांकÓ था, जो जन्माष्टमी के समय प्रकाशित हुआ थाा। दूसरा अंक दीपावली अंक था और तीसरा सत्याग्रह अंक। प्रवासी की यह अधूरी कहानी है। 'प्रवासी की कहानीÓ की भूमिका में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लिखा है- ''स्वामी भवानी दयाल संन्यासी से मेरी मुलाकात कई बरसों से है। मुलाकात के पहले ही जब मुझे दक्षिण अफ्रिका के भारतियों इतिहास से कुछ परिचय हुआ, स्वामीजी के नाम और काम से परिचय हो चुका था। साक्षात् से वह परिचय और भी गहरा हो गया, और जैसे-जैसे परिचय बढ़ता गया उनके गुणों और कार्रवाइयों से अभिज्ञता होती गई; आदर और स्नेह बढ़ते गए। जब स्वामीजी 1930 में हिंदुस्तान आये और यहां के सत्याग्रह में आरा जिला में काम करने लगे, तो उनकी कार्यशक्ति, और अस्वस्थ शरीर से भी कितना परिश्रम वह कर सकते थे, इसका भी पता चला। यों तो स्वामीजी प्रवासियों की ओर से भेजे हुए डेपुटेशन में भारत आते-जाते रहते हैं और वहां दक्षिण अफ्रिका में भी बराबर उनकी सेवा में ही लगे रहते हैं। पर हमको, जब-जब वह देश में आते हैं, अपने प्रेम और सहृदयता से बाधित करते हैं। वहां पर राजनीतिक और सामाजिक सेवा के अलावे स्वामीजी ने हिंदी प्रचार में भी बहुत बड़ा काम किया है। हम बिहारियों को इसका गौरव है कि वह हमारे ही प्रदेश के हैं और वह भारतीय होते हुए भी प्रान्त को नहीं भूले हैं। मैं समझता हूं कि ऐसे सज्जन की जीवनी से नवयुवकों को अपने जीवन बनाने में सहायता मिलेगी और स्वामीजी का त्याग, उनकी कार्यदक्षता और देश प्रेम उनके लिये एक आदर्श उपस्थित करके उनके लिए पथ-प्रदर्शक बनेगी। -राजेंद्र प्रसाद।ÓÓ
प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में भी जिक्र किया है, 'जेल में कुछ बातों में आपस में सुखद प्रतिद्वंद्विता हुई। कुछ लोगों ने 'बन्दीÓ या 'कैदीÓ नाम का एक हस्तलिखित मासिक पत्र निकाला। दूसरों ने 'कारागारÓ नाम का दूसरा मासिक निकाला, जिसमें यह लिखा कि कैदी या बन्दी तो आते-जाते रहते हैं, बदलते रहते हैं़, पर कारागार तो स्थायी रूप से चलता रहता है! इन पत्रों में राष्ट्रीय आन्दोलन-सम्बंधी लेख लिखे जाते थे। एक विशेषांक में सभी जिलों के प्रमुख कार्यकर्ताओं से, अपने-अपने जिले में आन्दोलन की प्रगति पर, लेख लिखवाये जाते थे। मेरा ख्याल है कि उससे बहुत कुछ मसाला मिलता, जिससे आन्दोलन का इतिहास लिखा जा सकता। याद नहीं, वह विशेषांक कहां है। इन पत्रिकाओं के मुख्य प्रबन्धक और लेखकों में सर्वश्री भवानीदयाल, गया के बाबू मथुराप्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी और उत्साही युवक महामायाप्रसाद थे।Ó
संस्करण है, उस पर लिखा है, द्वितीयबार। यानी दूसरा संस्करण। संभव है, एक साल में इसका दूसरा संस्करण निकला हो। यह भी संभव है कि गांधी पर हिंदी में यह पहली पुस्तक हो। क्योंकि गांधी भारत 1915 में आते हैं। एक साल तक देश का भ्रमण करते हैं। किसी भारतवासी ने इतनी तत्परता दिखाते हुए उस समय कोई किताब लिख दी हो, मुश्किल लगता है। एक तीसरी उल्लेखनीय बात यह है कि भवानी दयाल ने 1916 में ही उन्हें महात्मा का नाम दे दिया था। चूंकि भवानी दयाल दक्षिण अफ्रिका में उनके साथ रहे। काम किया। उनके पिता जयराम सिंह का गांधी के प्रति अपूर्व प्रेम था। इसलिए गांधी के कर्म और चिंतन से भवानी दयाल काफी प्रभावित हुए। इतने प्रभावित कि अपनी इस पुस्तक में उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है-''महात्मा गान्धी का चरित्र लिखकर वास्तव में मैंने अनधिकार चेष्टा की है। उस महान पुरुष के जीवन का सच्चा चित्र खींचना मेरे लिये कठिन ही नहीं किन्तु असम्भव है। तो भी जो कुछ अपनी तुच्छातितुच्छ बुद्धि के अनुसार लिखा है, वह हिन्दी प्रेमियों की सेवा में सादर समर्पित है।...थोड़े दिनों तक महात्मा गान्धी के साथ रहकर उनके राजनैतिक सिद्धान्तों के जानने में जो कुछ सफलता प्राप्त की है, उसे मैंने 'दक्षिण अफ्रिका के सत्याग्रह का इतिहासÓ, 'हमारी कारावास की कहानीÓ और इस पुस्तक में दर्शाने का प्रयास किया है।ÓÓ
संन्यासी ने देश सेवा के साथ समाज की भी सेवा की। 1937 में लारेंस मारक्बिस में वेद मंदिर की आधारशिला रखी। 1944 में उन्हें काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्वर्णजयंती का अध्यक्ष चुना गया। उसी समय अजमेर से प्रकाशित 'प्रवासीÓ पत्रिका का संचालन और सम्पादन किया। इसके पहले 1931 में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के दसवें देवघर अधिवेशन में अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए, बिहार की चिंत्य स्थिति पर बड़ा मार्मिक प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था, 'बिहार में न लेखकों की कमी है न पाठकों की, न सम्पादकों की, न सुकवियों की और साहित्यसेवियों की। अन्य क्षेत्रों की पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें बिहार में ही अधिक खपती हैं। फिर भी हमारी यह दीन दशा क्यों? कारण यह है कि हममें कल्पना और कार्यशक्ति का अभाव हो गया है। हमारी दिमागी उड़ान एवं बुद्धि गुलाम हो गई है तथा हम अपनी राष्ट्रभाषा के उज्ज्वल भविष्य में अविश्वास करने लगे हैं।Ó
प्रवासीजी का देहान्त 9 मई 1950 को प्रवासी भवन अजमेर, में हुआ। गांधीजी की जब यह जीवनी लिखी, तब उनकी उम्र मात्रा 24 साल की थी। आप उनकी प्रतिभा, सोच और संस्कार का अनुमान लगा सकते हैं। प्रवासी की यह कहानी हम इसलिए अधूरी छोड़ रहे हैं कि आप उनके बारे में जानने के लिए कुछ और देखें और पढ़ें। आजादी के आंदोलन में इनकी महती भूमिका रही। विदेश में हिंदी के प्रचार में इनका सबसे बड़ा योगदान रहा है। हिंदी के इस सेवक के नाम पर अपने देश में न कोई पुरस्कार है न किसी मार्ग का नाम। देश तो भूला ही चुका है, बिहार ने भी कहां उन्हें मान-सम्मान और याद किया। बिहार शताब्दी के सौ नायकों में भी नहीं। कम से कम गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर तो हम उन्हें याद कर ही सकते हैं।

भारतेंदु ने की थी तदीय समाज की स्थापना

भारतेंदु हरिश्चंद्र की आज जयंती है। वह एक कवि, नाटककार, घुमंतू, इतिहास लेखक, संपादक और न जाने क्या-क्या थे। साहित्य की हर विधाओं में लिखा। उम्र कम पाई, लेकिन काम कई उम्र का कर गए। उनके हर रूप, रस, गंध, विचार की चर्चा होती है, लेकिन एक चीज की चर्चा प्राय: नहीं होती। न होने के पीछे क्या कारण है, पता नहीं। लेकिन भारतेंदु का यह उल्लेखनीय और अलहदा पहलू है, जिसकी चर्चा होनी चाहिए। तब, हम एक नए भारतेंदु से मुखातिब हो सकते हैं।
यह था तदीय समाज की स्थापना। भारतेंदु ने सं 1930 में इसकी स्थापना की थी। इसका उद्देश्य था धर्म तथा ईश्वर के प्रति अनुराग। इसके साथ गोवध रोकने के लिए इस समाज ने साठ हजार हस्ताक्षर के साथ एक प्रार्थना पत्र दिल्ली दरबार में भेजा गया

था। गो महिमा आदि लेख लिखकर बराबर आंदोलन चलाते रहे। यही कारण है कि उसी समय अनेक स्थानों पर गोरक्षिणी सभाएं एवं गोशालाएं खुलने लगीं। मंदिरा, मांस सेवन रोकने के लिए कई प्रयत्न किए गए। इस समाज ने देशी वस्तुओं के व्यवहार करने की प्रतिज्ञाएं भी लोगों से कराई थी। समाज से एक मासिक पत्रिका भगवद भक्ति तोषिणी नाम की निकली थी, जो कुछ दिन बाद बंद होि गई। इसका अधिवेशन या बैठक प्रत्येक बुधवार को होता था और इसमें गीता तथा भागवत का पाठ होता था।
भारतेंदु ने स्वयं तदीय नामांकित अनन्य वीर वैष्णव, की पदवी लेते समय निम्नलिखित नियमों को आजन्म निबाहने की प्रतिज्ञा की थी।
यह इस प्रकार थी-
हम हरिश्चंद्र अगरवाले श्रीगोपालचंद्र के पुत्र काशी चौखंभा महल्ले के निवासी तदीय समाज के सामने परम सत्य ईश्वर को मध्यस्थ मानकर तदीय निम्मांकित अनन्य वीर वैष्णव का पद स्वीकार करते हैं और नीचे लिखे हुए नियमों का आजन्म मानना स्वीकार करते हैं।
यह था नियम-
1-हम केवल परम प्रेममय भगवान श्रीराधिकारमण का ही भजन करेंगे।
2-बड़ी से बड़ी आपत्ति में भी अन्याश्रय न करेंगे।
3-हम भगवान से किसी कामना हेतु प्रार्थना न करेंगे और न किसी देवता से कोई कामना चाहेंगे।
4-जुगल स्वरूप में हम भेद दृष्टि न देखेंगे।
5-वैष्णव में हम जाति बुद्धि न करेंगे।
6-वैष्णव के सब आचार्यों में से एक पर पूर्ण विश्वास रखेंगे परंतु दूसरे आचार्य के मत-विषय में कभी निंदा वा खंडन न करेंगे।
7-किसी प्रकार की हिंसा वा मांस भक्षण न करेंगे।
8-किसी प्रकार की मादक वस्तु न खाएंगे न पीएंगे।
9-श्रीमद भागवतगीता और श्रीभागवत की सत्यशास्त्र-मानकर नित्य मनन-शीलन करेंगे।
10-महाप्रसाद में अन्य बुद्धि न करेंगे।
11-हम आमरणांत अपने प्रभु और आचार्य पर दृढ़ विश्वास रख कर शुद्ध भक्ति के फैलाने का उपाय करेंगे।
12-वैष्णव मार्ग के अविरुद्ध सब कर्म करेंगे और इस मार्ग के विरुद्ध श्रौत स्मार्त वा लौकिक कोई कर्म न करेंगे।
13-यथा शक्ति सत्यशौचदायादिक का सर्वदा पालन करेंगे।
14-कभी कोई बात जिससे रहसय उद्घाटन होता हो अनिधकारी के सामने न कहेंगे। और न कभी ऐसी बात अवलंब करेंगे जिससे आस्तिकता की हानि हो।
15-चिन्ह की भांति तुलसी की माला और कोई पीत वस्त्र धारण करेंगे।
16-यदि ऊपर लिखे नियमों को हम भंग करेंगे तो जो अपराध बन पड़ेगा हम समाज के सामने कहेंगे और उसकी क्षमा चाहेंगे और उसकी घृणा करेंगे।
इसके बाद भारतेंदु का हस्ताक्षर है। तिथि है-मित्ती भाद्रपद शुक्ल 11 संवत 1930।
इसके साक्षी थे-
पं बेचनराम तिवारी
प्र ब्रह्मदत्त
चिंतामणि
दामोदर शर्मा
शुकदेव
नारायण राव
माणिक्यलाल जोशी शर्मा।
पर, भारतेंदु के इस प्रयास की कोई चर्चा नहीं होती। भारतेंदु ने इस छोटी सी उम्र में भी एक नए समाज की परिकल्पना की थी।

गांधीजी का पत्र वल्लभभाई पटेल को


                                                                                                                                कलकत्ता
     13 अगस्त 1947
 


चि. वल्लभभाई,
मैं तो यहां फंस गया हूं, और अब भारी खतरे का काम सिर पर ले रहा हूं। सुहरावर्दी और मैं आज दंगेवाले मुहल्लेमें साथ-साथ रहने जा रहे हैं। अब जो हो सो सही। देखते रहना। मैं लिखता रहूंगा।
मालूम होता है कि काका ने कश्मीर छोड़ दिया।
सुभाष बोस के विषय में मुझे तो तुम्हारे पत्र से ही मालूम हुआ। मुझे इन सब बातों पर भरोसा नहीं हो रहा है।
राजाजी के बारे में शरदबाबू को जैसा तुमने लिखा है वैसा ही मैं भी लिख चुका था। उसका कोई उत्तर नहीं मिला। इस बार तो वे मेरे पास आए भी नहीं थे।
मैं नहीं मानता कि कृपलानी के बारे में अखबारों ने जैसा आया है वैसा उन्होंने कहा होगा। लियाकत अली का वक्तव्य मुझे पसंद नहीं आया। वातावरण जहर से भरा है। कौन किसका है यह जल्दी पता नहीं चलता।
खाकसारों का मामला समझा। मैं यह धर्म समझकर चला हूं कि उन्हें ऐसी स्थिति में रख दिया जाए कि वे (हमारे खिलाफ ) कुछ भी न कह सकें। दूसरों के बारेमें भी ऐसा ही करता हूं।
काम सारा कठिन है और कठिनाई बढ़ती दिखाई देती है। ऊपर से अब यह दैवी प्रकोप आ पड़ा दीखता है। वर्षा न आई तो क्या करेंगे? बहुतों को मरना ही पड़ेगा न?
राजाओं की समस्या इतनी विकट है कि उसे तुम ही निपट सकोगे, परंतु तुम्हारे स्वास्थ्य से कौन निपटेगा?

                                                                                                                             बापू के आशीर्वाद
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(गांधी वांगमय से)

यह समिति आदिवासियों के बारे में नहीं जानती

अध्यक्ष महोदय, 
पिछड़े वर्ग का एक सदस्य होने के नाते मुझे नहीं पता है कि पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों के बीच में क्या अंतर है। जैसा इस समिति के पिछड़े वर्ग के एक सदस्य ने कहा है। जहां तक मेरा सवाल है, मैं इस प्रस्ताव के पेशकर्ता द्वारा सुझाए गए नामों के विवाद में नहीं पडऩा चाहता। ये सब जाने-माने लोग हैं और उन राज्यों से अच्छी तरह से परिचित हैं क्योंकि इनलोगों ने वहां काम किया है। लेकिन महोदय, मैं नम्रतापूर्वक कहूंगा कि मुझे नहीं लगता कि ये लोग पूर्वी राज्यों के बारे में बहुत कुछ जानते हैं। द इंडियन स्टेट पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के लोगों का वास्ता आमतौर पर उत्तर भारतीय राज्यों से रहा है और कॉन्फ्रेंस के दौरान उसी से संबंधित मामले निपटाये गए हैं। दक्षिणी भारत और भारत के पश्चिमी व मध्यवर्ती राज्यों का मामला भी कुछ ऐसा ही है। उड़ीसा और बंगाल प्रदेश की एजेंसियों तथा नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर पर शायद ही कॉन्फ्रेंस का कोई ध्यान गया है। अब मैं जो तुरूप का पता चलने जा रहा हूं उसके लिए मैं सदन से माफी चाहूंगा क्योंकि शायद इससे कुछ झटका लग सकता है। ब्रिटिश पश्चिम अफ्रीका से लौटने के बाद  पिछले 9 वर्षों में मैं भारत के प्राय: सभी आदिवासी क्षेत्रों में घूमा हूं। एक-एक आदिवासी इलाका गया हूं और इस दौरान 1,14,000 मील की यात्रा की है। इससे मुझे यह अंदाजा है कि आदिवासियों की आवश्यकताएं क्या हैं और उनके लिए यह सदन क्या कर सकती है। भारत के भारतीय राज्य राजस्थान और देशी रियासतों में करोड़ों की जो आबादी है उनमें आदिवासियों की जनसंख्या 1.7 करोड़ है। 1.7 करोड़ आदिवासी!
महोदय,
 इतनी बड़ी आबादी को ध्यान में रखकर मैं यह सुझाव देना चाहूंगा कि इस समिति में एक आदिबासी को जरूर शामिल किया जाए। मुझे लगता है कि वह समिति के लिए मददगार साबित होंगे। मैं समिति के काम में बाधा नहीं डाल रहा हूं, लेकिन मैं चाहता हूं कि आदिवासियों के मुद्दों पर लडऩे के लिए इसमें एक आदिवासी होना ही चाहिए। जब आप आदिवासियों के लिए लड़ते हैं, तो आपको एक आदिवासी की जरूरत है जो इस संकल्प के लेखकों के साथ लड़ेगा। यदि आप समिति में एक और आदिवासी शामिल करते हैं, तो मैं कहूंगा- 'हां, अब हम सातÓ हैं।
(यह वक्तव्य जयपाल सिंह मुंडा ने 21 दिसंबर 1946 को 'संविधान सभा की वार्ता समितिÓ के प्रस्ताव पर संशोधन रखते हुए दिया था।)
प्रस्तुति : एके पंकज।

शर्माजी की स्नेहमयी स्मृतियाँ



स्वामी भवानी दयाल संन्यासी

महापुरुषों की कृतियाँ और स्मृतियाँ देश की सर्वोपरि निधि हैं। समय के रेत पर उनका जो चरण चिह्न अंकित हो जाता है, वह भावी पीढ़ी के लिए दीप स्तम्भ का काम देता है। हिन्दी-साहित्य-संसार में श्रद्धेय पं पद्मसिंह शर्मा भी एक अद्वितीय महापुरुष थे, अतएव उनकी स्नेहमयी स्मृतियों को संकलित और संचित करना हिन्दी-प्रेमियों का कर्तव्य होना चाहिए। जो भाग्यशाली पुरुष कुछ काल तक शर्माजी के सहवास और सत्संग का अवसर प्राप्त कर चुके हैं, केवल वे ही विस्तार और अधिकारपूर्वक अपने अनुभवों को अंकित कर सकते हैं और मुझे विश्वास है कि उनके लिखे हुए संस्मरण हिन्दी साहित्य की स्थायी संपत्ति सिद्ध होंगे, किन्तु मुझ जैसे शर्माजी के प्रेमी और भक्त भी यदि दो-चार शब्द लिखने की धृष्टता कर डालें, तो मुझे आशा है, हिन्दी-प्रेमी उसे क्षन्तव्य समझेंगे।
पहले-पहल सन् 1912 में मैंने शर्माजी के दर्शन किये थे। पुण्य-सलिला भगवती भागीरथी के तट पर स्थित गुरुकुल कांगड़ी के वार्षिकोत्सव से लौटकर मैं ज्वालापुर आया था, और वहीं महाविद्यालय में शर्माजी की दिव्य-मूर्ति दृष्टिगोचर हुई थी। वृक्ष में जीव है या नहीं, इस विषय पर आर्यसमाजियों में दो पक्ष हैं। प्रख्यात तार्किक स्वर्गीय पं गणपति शर्मा का पक्ष था कि वृक्ष में जीव अवश्य है, और लब्ध प्रतिष्ठ दार्शनिक स्वर्गीय स्वामी दर्शनानन्दजी इसके विपक्ष में थे। इस विषय पर स्वामीजी और शर्माजी में शास्त्रार्थ छिड़ गया था, और मध्यस्थ थे साहित्याचार्य पं पद्मसिंह शर्मा। शर्माजी ने जिस योग्यता और दक्षता के साथ शास्त्रार्थ-सभा का संचान किया था, वह अब तक मुझे स्मरण है। 

इसके बाद मैं दक्षिण अफ्रिका चला आया। समय-समय पर शर्माजी के विद्वतापूर्ण लेख सामयिक पत्रों में पढ़ता रहा। लगभग बारह वर्ष के बाद सन् 1923 में कानपुर सम्मेलन के अवसर पर शर्माजी के दर्शन करने का सौभाग्य फिर प्राप्त हुआ, और इस बार उनसे व्यक्तिगत परिचय और कुछ घनिष्ठता भी हो गई। 

सम्मेलन में पधारे हुए प्रतिनिधियों और अतिथियों को एक धर्मशाला में ठहराया गया था। मेरे लिए एक अलग ही कोठरी की व्यवस्था कर दी गई थी। इसी कोठरी में श्री लक्ष्मीनारायण गर्दे और बनारसीदास चतुर्वेदी से मिलने के लिए शर्माजी आये, और प्रथम मिलन में ही उन्होंने मुझे अपना कृपापात्र बना लिया। उस दिन प्रेम का जो बीज अंकुरित हुआ, वह उनके जीवन के अन्तकाल तक बढ़ता ही गया। कानपुर में जितने दिनों तक सम्मेलन हुआ, शर्माजी का शेष समय मेरी ही कोठरी में बीतता था। इसका एक विशेष कारण भी था, हम लोगों में दो बातों में बड़ी समता थी। एक तो मैं चाय का भारी पियक्कड़ हूं, जहां जाता हूं, पहले चाय की व्यवस्था करता हूं। शर्माजी भी इस रोग के शिकार थे। दूसरी बात यह कि मैं चायपान के साथ ध्रूमपन भी करता हूँ और उन दिनों शर्माजी भी बीड़ी से इनकार नहीं करते थे। गर्देजी भी चाय और बीड़ी-दोनों के ही बड़े प्रेमी हैं, इसलिए शर्माजी और गर्देजी के साथ मेरी खूब पटती थी। केवल चतुर्वेदीजी एक निव्र्यसनी महात्मा थे, जो हमारी पार्टी में बराबर बने रहते थे। वे दो-चार दिन कितने आनन्द से कटे थे। चाय की प्यालियां आ रही हैं, बीडिय़ों का ढेर लगा हुआ है। कोठरी में एक ओर शर्माजी कागज-पेन्सिल लिये बैठे हैं, कुछ देर लेखनी चलती है और कुछ देर जबान। दूसरी ओर गर्देजी का डेरा है, वे अपने 'भारतमित्रÓ के पेट भरने की चिन्ता में व्यस्त हैं। एक कोने में चतुर्वेदीजी का आसन है, उनको यही फिक्र परेशान कर रही है कि प्रवासी भाइयों के सम्बन्ध में कैसा और किस ढंग का प्रस्ताव तैयार किया जाय, और उसको अमल लाने के लिए सलाह दी जाय। दरवाजे के पास बैठकर मैं अपनी 'हिन्दीÓ के लिए कुछ गोद-गाद कर रहा हूं, किंतु अधिक चिन्ता यही व्याप रही है कि शर्माजी और गर्देजी के लिए चाय और बीड़ी की कमी न होने पावे। 

मैं उसी साल दक्षिण-अफ्रिका लौट आया, परन्तु शर्माजी से पत्र-व्यवहार होता रहा। मुजफ्फपुर-सम्मेलन का सभापतित्व ग्रहण करने के पश्चात उन्होंने अपने भाषण की एक प्रति मेरे पास भेजते हुए लिखा था-'बिहार में सम्मेलन हुआ, और अच्छा हुआ, केवल एक कसर रह गई कि आप नहीं रहे।Ó फिर सन 1929 में शर्माजी से मुलाकात हुई। शर्माजी अपनी पुस्तक छपाने के लिए कलकत्ते में टिके थे और मैं भी प्रत्यागत प्रवासियों की दशा की जांच के लिए वहां जा पहुंचा। 'विशाल भारतÓ कार्यालय में अकस्मात शर्माजी के दर्शन हुए, और फिर तो नित्य ही एक बार परस्पर मिलना अनिवार्य हो गया। भिन्न-भिन्न विषयों पर दिल खोलकर बातें होती थीं, और बड़ा आनन्द रहता था। एक दिन हम लोग विद्यासागर-कालेज में व्याख्यान देने गये। विद्यालय के अन्तर्गत एक हिन्दी-साहित्य-सभ है, उसी का वार्षिकोत्सव था। आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय सभापति थे। बंगालियों का अच्छा जमाव था। हिन्दी-भाषा के प्रति बंगालियों में जो उपेक्षावृत्ति है, इसी पर शर्माजी बोले, और खूब बोले। आपने बंगालियों को ऐसी फटकर बतलाई कि सभापति राय महोदय तिलमिला उठे। शर्माजी खरी बात कहने में जरा भी संकोच नहीं करते थे। उनका स्वभाव जितना कोमल था, उतना ही कठोर भी। मित्र मंडली में बैठे हुए शर्माजी सरलता और सहृदयता की मूर्ति जान पड़ते थे, किन्तु जब उनकी आलोचनात्मक लेखनी उठती थी, तो साहित्य-शत्रुओं के हृदय प्रकम्पित हो उठते थे। 

एक दिन मैंने शर्माजी को मटियाबुर्ज की सैर कराई। वहां का दृश्य देखकर उनकी जो दशा हुई उसका चित्र कोई कुशल मनोवैज्ञानिक ही खींच सकता था। वे गन्दी घनी बस्तियां, अस्वच्छ जल के नाले, दुर्गन्धमयी मोरियां, कीचड़ से भरे हुए रास्ते। वे स्वास्थ्यहीन, भग्न हृदय, मलेरिया-पीडि़त बेकार प्रवासी भाई। शर्माजी कांप उठे, उनके मुंह से दर्दभरी आहें निकल पड़ीं, और वे तड़पते हुए वापस आये। 

उन्हीं दिनों वैद्यनाथधाम गुरुकुल का जलसा था। मेरे विशेष आग्रह से शर्माजी वहां जाने को तैयार हो गये। हम लोग यथासमय नौ बजे रात्रि को सियालदह स्टेशन पहुंचे। शर्माजी ने इंटर का टिकट लिया और मैंने थर्ड का। शर्माजी बोले-'आपके लिहाज से मैंने इन्टर का टिकट लिया और आपने थर्ड का ले लिया। चलिए, टिकट बदल डालिये और इन्टर का ले लीजिए।Ó मैंने निवेदन किया-'शर्माजी, मैं अकेला नहीं हूं, मेरे साथ आर्य भाइयों का एक झुंड है। वे सब थर्ड क्लास में ही जाने वाले हैं, उनको छोड़कर इन्टर में बैठना मेरे लिए उचित न होगा।Ó शर्माजी के लिए रात में सोना जरूरी था, इसलिए इन्टर में बैठने के लिए मजबूर थे। खैर, गाड़ी आई, शर्माजी इन्टरकी खोज में गये, और मेरी पार्टी ने थर्ड के एक डब्बे पर ही धावा बोलकर कब्जा-दखल कर लिया। दूसरा उसमें कोई आया ही नहीं। हम लोग बिस्तर डालकर लम्बे पड़े। दूसरे स्टेशन पर मैंने सोचा कि देखना चाहिए कि शर्माजी सो गये, या जगे हुए हैं। मेरे डब्बे के निकट ही इन्टर के डब्बे में बैठे हुए थे। उसमें इतनी भीड़ थी कि शर्माजी को मुश्किल से एक किनारे बैठने की जगह मिल सकी थी। डब्बे में बंगाली स्त्री-पुरुषों का बसेरा था, शर्माजी उनके मध्य में विदेशी बने बैठे थे। वे चुपचाप बैठे शायद इन्टर क्लास को कोस रहे थे। मैंने उनके डब्बे के पास पहुंचकर पूछा-'कहिये, शर्मा जी, क्या हाल है?Ó 'बस, खुद ही मुलाहिजा कर लीजए, पूछने की जरूरत क्या है?Ó-शर्माजी ने जवाब दिया। मैंने उनको अपने डब्बे में चलने को कहा। शर्माजी तैयार हो गये। मैंने एक सीट खाली करा दी, उस पर शर्माजी का बिस्तर पड़ गया। फिर तो वे ऐसा सोये कि जसीडीह में उठाने पर ही उठे। गाडी से झटपट उतर गये, लेकिन अपना एक बक्स उसी में छोड़ आये। जब गाड़ी खुल गई, तब आपको बक्स की याद आई। अब तो शर्माजी की चिन्ता का क्या कहना। कहने लगे-'बक्स में बहुत सी चीजें हैं, जिनकी मुझे अधिक परवाह नहीं, किन्तु कुछ हस्तलिखित पुस्तकें और नोट्स हैं, यही मेरे लिए दुर्लभ वस्तुएं हैं। यदि वे खो गईं, तो उनके पुनर्मिलन की कोई आशा नहीं।Ó फिर भी कभी आप नींद पर दोष मढ़ते और कभी अपनी लापरवाही को कोसते। मैंने कहा-'पंडितजी, अब फिक्र करने से कुछ फायदा नहीं। चलिये, कोशिश की जाय, ताकि आपकी दुर्लभ वस्तुएं गायब न होने पावें।Ó मैं शर्माजी को लेकर स्टेशन मास्टर के पास पहुंचा। उन्होंने अगले स्टेशन पर टेलीफोन कर दिया, और मुझे दिन में एक बजे बुलाया। हम लोग अछता-पछताकर गुरुकुल चले गये। वहां स्नान और जलपान हुआ, किन्तु शर्माजी की चिन्ता बढ़ती ही जा रही थी। अतएव, हम लोग वहां से जसीडीह के लिए पैदल ही रवाना हो गये-सवारी की भी परवा न की। लम्बी मंजिल तय कर के स्टेशन पहुंचे, और गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगे। किसी वस्तु की प्रतीक्षा में बैठिये, तो समय भी शीघ्र नहीं कटता। गाड़ी भी कुछ लेट हो गई-दो बजे आई। शर्माजी की बेचैनी बढ़ रही थी। खैर, शर्माजी का बक्स मिल गया, और उसे पाकर में वे इतने प्रसन्न हुए, मानो खोई हुई अमूल्य सम्पत्ति मिल गई हो। वहां से हम लोग सवारी लेकर गुरुकुल लौटे। 

शर्माजी सरस्वती-सम्मेलन के सभापति चुने गये थे, और मैं आर्य सम्मेलन का। हम लोग एक ही कमरे में ठहरे थे। शर्माजी के एक दो शिष्य भी मिल गये। फिर क्या पूछना था। चाय तैयार करने की समस्या हल हो गई थी। अब शर्माजी ने बीड़ी पान करना छोड़ दिया था और तम्बाकू का भोग लगाते थे। इस बार शर्माजी के सत्संग से मैंने खूब लाभ उठाया। आने 'पद्म-परागÓ की एक प्रति मुझे भेंट की। उलट-पुलटकर देखा, तो उसका एक पन्ना ही गायब था। मैंने शर्माजी से शिकायत की, तो बोले-'प्रेस के प्रेतों से तो मैं परेशान रहता ही था, अब जिल्दसाजों ने भी मुझे हैरान करना शुरू कर दिया है। खैर, एक पृष्ठ मैं अपने हाथ से लिखकर आपकी पुस्तक पूरी कर दूंगा।Ó 'बिहारी सतसईÓ की एक प्रति आपने मेरे पास भेजी थी, किन्तु मित्र की कृपा से वह खो गई। जब शर्माजी को यह खबर मिली, तो आपने फौरन उसकी दूसरी प्रति मेरे पस भेज दी। अस्तु

आपके सभापतित्व में सरस्वती सम्मेलन हुआ। गुरुकुल के कई ब्रह्मचारियों ने निबन्ध पढ़े और कइयों ने भाषण दिये। शर्माजी का अन्तिम भाषण बड़ा ही ओजपूर्ण था। एक बात मुझे बहुत खटकी। शर्माजी तो थे सभापति, किन्तु एक महाशय बीच-बीच में गड़बड़ मचाते थे। प्रत्येक निबन्ध्ण-पाठ के पश्चात वे उठकर खड़े हो जाते और लगते अनाप-शनाप बकने। सभा के अन्त में जब मैंने शर्माजी से कहा-'पंडितजी, आपके स्वभाव में निर्बलता है या सज्जनता, इसका विश्लेषण करना मेरे लिए कठिन हो रहा है। सम्मेलन में एक महाशय दाल-भात में मूसलचन्द बन रहे थे, और वे बीच-बीच में उठकर अनर्गल प्रलाप कर रहे थे। आपने उनको रोका क्यों नहीं, उनकी स्वच्छन्दता को सहन कैसे कर सकेशर्माजी हंस पड़े, और बोले-'कुछ महाशयों को व्याख्यान-व्याधिका दौरा हुआ करता है, और वे येनकेनप्रकारेण उसके उपचार के लिए अवसर ढूंढ करते हैं।Ó

यही शर्माजी से अन्तिम मिलन था। गुरुकुल-उत्सव के बाद वे तो कलकत्ता वापस गये, और मैंने अपने प्रवासी भवन को प्रस्थान किया। सन् 1931 में जब जेल से छूटकर प्रत्यागत प्रवासियों के सम्बन्ध में मैंने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की, और शर्माजी के पास उसकी एक प्रति भेजी, तो आपने चतुर्वेदीजी को सन्देश भेजा-'रिपोर्ट इतनी अच्छी निकली है कि मेरी ओर से उनको एक प्याला चाय पिला दीजिएगा।Ó
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उस दिन हिन्दुस्तान की डाक मिली। 'आर्यमित्रÓ के काले कलेवर में यह खबर पढ़कर हृदय कांप उठा कि शर्माजी सुरधाम सिधार गये। लोग कहते हैं इस भूतल पर करोड़ों मनुष्य हैं, यह गणना असत्य नहीं है, किन्तु क्या यह बात सत्य है? वास्तव में संसार में कुछ इने-गिने जीव ही रहते हैं, उन्हीं का जीवन जगत का जीवन है, और उन्हीं का मत विश्व का अभिमत। हिन्दी साहित्य संसार में शर्माजी अपनी सानी नहीं रखते थे। वे क्या न थे? वे कवि थे, लेखक थे, समालोचक थे और भाषा विज्ञान के पंडित थे। उनके जोड़ का सिद्धहस्त लेखक दूसरा कोई नजर नहीं आता। उनकी अपनी भाषा थी और अपनी शैली। साहित्य-सेवियों में उनका दर्जा केवल उन्हीं को प्राप्त था। आज वे इस संसार से उठ गये सही, किन्तु अपनी अमरकीर्ति छोड़ गये हैं। जब तक इस जगत में हिन्दी भाषा जीवित रहेगी, पं पद्मसिंह शर्माजी का नाम श्रद्धा और भक्ति के साथ स्मरण किया जाता रहेगा।

रांची से तीन बार सांसद रहे पीके घोष, लेकिन बेटों को कहा, राजनीति में मत जाना

पीके घोष यानी प्रशांत कुमार घोष। पीके रांची से तीन बार सांसद रहे। दिसंबर से इनका गहरा लगाव रहा। 20 दिसंबर, 1926 को उनका जन्म हुआ। 11 दिसंबर, 1962 में शादी हुई और 25 दिसंबर 2013 में रांची में निधन। वे पहली बार 1962 में रांची ईस्ट से विजयी हुए। तब रांची में दो लोकसभा की सीट होती थी। उस समय वे स्वतंत्र पार्टी में थे। बाद में इस पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया। इसके बाद 1967 में कांग्रेस के बैनर पर लड़े और विजयी हुए। इसके बाद 1971 में रांची से
ही चुनाव लड़े। बाद में उनकी जगह पर शिवप्रसाद साहू को टिकट दिया गया, लेकिन वह चुनाव हार गए। दूसरी बार शिव प्रसाद साहू जीत दर्ज की। पीके घोष 1980 से 84 तक छोटानागपुर व संथाल परगना के कांग्रेस महासचिव भी रहे। उनके बड़े बेटे सिद्धार्थ घोष बताते हैं कि पिता का साफ-स्वच्छ और पारदर्शी व्यक्तित्व था। मेरे दादा के पिता दरभंगा नरेश के दीवान थे। दरभंगा से मुजफ्फपुर और फिर रांची हम लोग बस गए। उस समय हमारी जमींदारी थी। काफी जमीनें थी। कृषि विवि भी हमारी जमी
न पर बनी। मूल रूप से हम लोग वर्धमान के हैं। पर दादा यहीं जन्में। पिता भी यहीं जन्मे। हमलोगों का जन्म भी यहीं हुआ। पिताजी राजनीति में गए। इंदिरा गांधी से उनकी बहुत बनती थी। 1984 में इंदिरा गांधी ने फिर रांची से टिकट देने का मन बनाया। इंदिरा गांधी के साथ मीटिंग में मैं भी था। तब मेरी उम्र 21 साल थी। हम दिल्ली उनके निवास पर गए थे। काफी कांग्रेस के लोग थे। आईं तो उन्होंने मुझे मेरे नाम से ही पुकारा। फिर मां का नाम लेकर हाल-चाल पूछा। उस समय मैं दंग रहा है कि उनकी स्मृति कितनी तेज थी। बाद में तो उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद पिताजी ने भी सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके बाद तो पतित होती राजनीति और कांग्रेस में भी पदलोलुपता को लेकर वे काफी क्षुब्ध महसूस करने लगे। मुझे याद है, जब राज्य बना तो मैं दिल्ली में एयर लाइंस से जुड़ा था। उन्होंने मुझे दिल्ली से बुला लिया और कहा कि कुछ राज्य के लिए करो। लेकिन यहां की राजनीति और प्रशासनिक अक्षमता को देखकर वे निराश हो गए। कहने लगे, ऐसे लोगों से राज्य का विकास नहीं हो सकता। किसी के पास सेंटीमेंट नहीं है। हालांकि उन्होंने हम तीनों भाइयों को राजनीति में नहीं आने दिया। सिद्धार्थ कहते हैं पिताजी अपनी पूरी कमाई समाज सेवा पर ही खर्च कर देते थे। बिहार आई बैंक के संस्थापकों में थे तो उनका अधिकांश पैसा इसी आई बैंक में ही चला जाता था। महान क्रांतिकारी प्रफुल्लचंद्र रॉय इनके नाना थे। ये बाकुंडा से 1952 से 57 तक विधायक रहे। दादा भी फ्रीडम फाइटर थे। पिता भी अनुशीलन समिति से जुड़े थे। बाद में 1940 से 51 तक फारवर्ड ब्लाक के सदस्य रह। फिर 1960 से 64 तक स्वतंत्र पार्टी कार्यकारिणी के सदस्य रहे।   

मुंबई से आकर मीनू रांची लोकसभा से झापा के टिकट पर चुनाव जीते थे

रांची संसदीय सीट से पहली बार कोई बाहरी संसद में पहुंचा था। दूसरा आम चुनाव था। झारखंड पार्टी के जयपाल सिंह मुंडा ने दूसरे आमसभा चुनाव में झारखंड पार्टी से मीनू मसानी को टिकट दे दिया। तब रांची में 1957 में दो लोकसभा सीट थी। एक ईस्ट और एक एस
टी के लिए। मीनू मुंबई के थे। उन्होंने रांची से मुर्गा छाप पर लड़ाया गया। जयपाल के इस निर्णय पर पार्टी के अंदर और बाहर तीखी प्रतिक्रिया भी हुई, लेकिन तब जयपाल सिंह की तूती बोलती थी। जयपाल ने दांव खेला और मीनू संसद पहुंच गए। रांची एसटी से खुद चुनाव लड़े और जीत दर्ज की। तब बिहार था और बिहार में उस समय 45 लोकसभा की सीट हुआ करती थी। तब छह सीटों पर झापा ने जीत दर्ज की थी, जिनमें तीन सामान्य सीट थी। 
हालांकि सबको लग रहा था कि रांची से टिकट जयपाल सिंह अपने सहयोगी रहे सुरेश प्रसाद को देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जयपाल के इस निर्णय पर कार्यकर्ताओं को धक्का लगा था। यद्यपि ये झापा के टिकट पर चुनाव लड़े थे, लेकिन कहा जाता है कि इनका आचरण निर्दलीय की तरह था। पर, आचरण भले निर्दलीय की तरह रहा हो, लेकिन उन्हें मत तो झापा के ही मिले। झापा का ही यहां जनाधार था। 1957 के इस चुनाव में मसानी को 39025 मत मिले थे। यानी 34.58 प्रतिशत जबकि जयपाल सिंह को 60.25 प्रतिशत मत मिले थे। वोटों की संख्या 139197 थी। यानी, मसानी से एक लाख से अधिक मत मिले थे। इससे जयपाल सिंह की लोकप्रियता समझ सकते हैं।
मीनू मुंबई में जन्मे थे। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर और लिंकन इन्न से कानून की पढ़ाई की थी। जयपाल की पढ़ाई भी लंदन में ही हुई थी। संविधान सभा में भी दोनों साथ-साथ रहे। हो सकता है कि जयपाल सिंह और मसानी में पहले से ही मित्रता रही हो। हालांकि 1929 में मसानी जब भारत आए तो बंबई उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। आजादी के आंदोलन में भी सक्रिय थे। लेकिन वे दोनों के बीच तालमेल नहीं बिठा सके। मसानी ने स्वयं स्वीकार किया कि वे एक अच्छे वकील के गुणों से लैस नहीं थे। इंग्लैंड से लौटने के चार साल बाद, मई 1932 में मसानी स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर पहली बार जेल गए। उन्हें नागरिक अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के लिए बिना सुनवाई के दो माह तक जेल में रखा गया, जो उस समय अपना प्रभाव बढ़ाना आरंभ कर रहा था। एक वर्ष से भी कम समय बाद, जनवरी, 1933 में, उन्हें एक बार फिर बैठकों पर लगे प्रतिबंध को तोडऩे के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था उन्होंने वह पूरा वर्ष नासिक की केंद्रीय कारागार में बिताया। जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन आदि नेताओं के साथ मिलकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की, लेकिन पार्टी में कम्युनिस्ट सदस्यों के बढ़ते प्रभाव के चलते वर्ष 1939 में लोहिया, मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से त्यागपत्र दे दिया और मसानी ने राजनीति छोड़कर एक कंपनी में काम करना शुरू कर दिया। सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो मीनू मसानी इसमें कूद पड़े। इस कारण जेल भी जाना पड़ा। जेल से रिहा होने के बाद 1943 में मीनू मसानी बंबई के महापौर बने। बाद में भारत के संविधान सभा के लिए चुने गए और भारत के नए संविधान निर्माण में नागरिकों के मूल अधिकारों से संबंधित समिति के सदस्य बने। संविधान सभा में मीनू मसानी ने भारत में समान नागरिक संहिता लागू किए जाने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उसे नामंजूर कर दिया गया। 1978 में जनता पार्टी की सरकार में ये मंत्री बने। 1998 में इनका निधन हुआ। मसानी ने करीब बीस पुस्तकें भी लिखी हैं। एक उनकी किताब 1940 की हमारा हिंदुस्तान है। सौ चित्रों से सजी इस पुस्तक को ऑक्सफोर्ड ने छापा था।

रांची की नजर में गांधी


मैं रांची हूं। झारखंड की राजधानी। जब बिहार था, तब भी मुझे ग्रीष्मकालीन राजधानी का ओहदा मिला था। यहां की आबोहवा को देखकर ही अंग्रेजों ने इसे सजाया-संवारा और अपना एक प्रशासनिक ठिकाना बनाया। कलकत्ता पास होने के कारण सैकड़ों भद्र बंगालियों ने रांची की इस पठार पर अपनी कोठियां खड़ी कीं। उन्हें नहीं पता था कि यह पठार कितना पुराना है? बाहर से लोग आते हैं, और पहाड़ी मंदिर से शहर का खूबसूरत नजारा देखते हैं, उन्हें भी नहीं पता कि यह पहाड़ी हिमालय से करोड़ों साल पुरानी है और इस पहाड़ी पर अंग्रेज आजादी के दीवानों को फांसी पर लटका दिया करते थे। इसलिए इसका एक नाम फांसी टुंगरी भी पड़ गया। वैसे, हर गली-मुहल्ले में आजादी के किस्से मिल जाएंगे। शहीद चौक के पास 1857 के वीरों को फांसी पर लटका दिया गया। जब, रांची छोटी थी, लेकिन इसका विस्तार बहुत था। कहानियां बहुत हैं, क्या-क्या सुनाऊं? पर, आज जो कहानी सुनाने जा रही हूं, वह बापू से संबंधित है। वही बापू, जिनका नाम था मोहनदास करमचंद गांधी। दुनिया ने उन्हें महात्मा कहा, लेकिन यह लोग नहीं जानते कि 'गांधी से महात्माÓ की यात्रा में रांची एक प्रमुख पड़ाव है।
गांधी के चरण झारखंड की धरती पर कई बार पड़े। एक लंबा कालखंड है। 1917 से 1940 के दरम्यान करीब पचास दिन उन्होंने झारखंड को दिया। कहते हैं, दो जून 1917 को पटना से चले और तीन को रांची पहुंचे और चार जून को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत बिहार-ओडिशा के लेफ्टिनेंट गर्वनर सर एडवर्ट गेट से आड्रे हाउस में उनकी मुलाकात हुई। गांधीजी की यह छोटी अवधि की यात्रा थी। इस यात्रा में उनके बेटे और बा भी शामिल थीं। दो दिन तक बातचीत होती रही। इसके बाद बिहार चले गए। अगले महीने आठ जुलाई को लिखे गए दो पत्र रांची के पते से मिलते हैं। इसके बाद 23 सितंबर, 1917 का पत्र रांची से लिखा मिलता है, जिसे मगनलाल गांधी को लिखा गया था। वह फिर चंपारण समिति की बैठक के सिलसिले में रांची आए थे। 24 सितंबर को चंपारण समिति की बैठक रांची में ही हुई थी। यह बैठक काफी लंबी चली और आंदोलन को लेकर काफी विमर्श हुआ। 25 जुलाई 1917 को गांधी जी ने लीडर अखबार के संपादक के नाम पत्र रांची से ही लिखा। गांधीजी चंपारण आंदोलन के सिलसिले में फिर पूना से 18 सितंबर को चले और 22 को रांची पहुंचे। यहां करीब 24 से 28 तक चंपारण जांच समिति की बैठक में शामिल हुए। इसके बाद पांच अक्टूबर को वे रांची से पटना चले गए। 25 सितंबर को ही जमनालाल बजाज को भी पत्र लिखा। इसके बाद मगन लाल गांधी को लिखे पत्र में जिक्र किया कि बुखार से मुक्त नहीं हुआ हूं। बुखार में भी वे चंपारण समिति की बैठक में भाग लेते रहे। एक पत्र 27 सितंबर को जीए नटेसन को लिखा और उसमें भी अंत में लिखा कि 'मेरे च्वर के कारण आप चिंतित न हों। वह अपने समय से ही जाएगा। वह अक्टूबर के पहले सप्ताह तक रांची में रहे। रांची में गांधीजी के रहने के बारे में चार अक्टूबर 1917 तक का जिक्र मिलता है। चंपारण के इस आंदोलन में रांची भी जुड़ गया और यह एक प्रमुख केंद्र बन गया। गेट ने एक कमीशन बना दी और गांधीजी को इसका मेंबर बनाने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद कमीशन का काम बेतिया से शुरू हुआ। एक तरह से चंपारण आंदोलन की नीति, रणनीति और जांच समिति का रांची में ही गठन किया गया। फिर इस आंदोलन की सफलता की कहानी सब जानते हैं। गांधीजी यहां श्रद्धानंद रोड में रहते थे। पर, अब किसी को पता नहीं कि वह कौन सा मकान था। पटना के एक वकील जो गांधीजी के साथ थे, उनके कोई रिश्तेदार यहां रहते थे तो पहली बार वे उन्हीं के यहां ठहरे थे। इस दौरान एक उल्लेखनीय बात यह हुई कि उनकी मुलाकात टाना भगतों से हुई। गौरतलब है कि 1914 से टाना भगत धार्मिक पाखंड के साथ अंग्रेजों के लगान के खिलाफ अहिंसक आंदोलन चला रहे थे। गांधीजी ने आठ जुलाई 1917 को अपनी डायरी में इसका उल्लेख किया है। लिखा है, आज मैंने टाना भगत नामक आदिवासी जमात के लोगों से बात की। ये अहिंसा और सदाचार को मानने वाले हैं।Ó गांधी के यहां पहुंचने से पहले से यहां सबसे पहले टाना भगतों ने अङ्क्षहसक लड़ाई छेड़ दी थी। इसे लोग कम जानते हैं। टाना भगत फिर गांधी के पक्के भक्त बन गए और खादी को अपना लिया। ये आज भी खद्दर ही पहनते हैं। दुनिया में ये गांधी के सच्चे अनुयायी हैं। पर, इन्हें कौन याद करता है? झारखंड में जब-जब गांधी की बात होगी, टाना भगतों की भी बात करनी होगी। गया कांग्रेस हो या रामगढ़ कांगे्रस, जब जगह पैदल ही हाजिर। एक बात कहना तो भूल रही थी। उसे याद करना जरूरी है। 1917 में ही मौलाना आजाद यहां नजरबंदी की सजा भोग रहे थे। वे चार साल तक यहां रहे। पर, कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता कि 1917 में उनकी मुलाकात बापू से हुई थी या नहीं?
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चंपारण आंदोलन जब मुकाम पा गया और गांधी की जब देश में धूम मची तो रांची को ओझल कर दिया गया। रांची की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया गया। पर, बापू न रांची को भूले न छोटानागपुर को। करीब सात-आठ साल बाद फिर बापू के कदम झारखंड की धरती पर पड़े। तब यह बिहार ही था। बापू की यह दूसरी यात्रा थी। 1925 का साल था। वे 13 से 18 सितंबर तक झारखंड की यात्रा चार पहिया वाहन से की। इस दौरान वे पुरुलिया, चाईबासा, चक्रधरपुर, खूंटी, मांडर, हजारीबाग घूमते हुए रांची पहुंचे। इन स्थानों पर आयोजित अनेकों बैठकों को संबोधित किया और आजादी की अलग जगाई। वे हर सभा में चरखा की बात जरूरत करते। स्वावलंबन का पाठ पढ़ाते। कहते, दूसरों पर निर्भरता ही गुलामी है। इसलिए, अपना सूत कातिए और कपडऩा बुनिए। एक सभा की याद है। 17 सितंबर को रांची के संत पॉल स्कूल के मैदान में तीन बजे सभा को संबोधित किया। स्कूल को भी नहीं पता था कि गांधी ने यहां सभा को संबोधित किया था। यहां भी बापू ने चरखा की बात की और लोगों ने एक हजार रुपये की थैली बापू को भेंट किया।
इस यात्रा में बापू झारखंड को समझ रहे थे। लोगों से मिल रहे थे। उनकी समस्याएं सुन रहे थे। झारखंड से लौटने के बाद 'यंग इंडियाÓ के आठ अक्टूबर 1925 के अंक में बापू ने 'छोटानागपुर मेंÓ शीर्षक से संस्मरण लिखा...सितंबर की यात्रा का जिक्रकरते हुए बापू लिखते हैं, छोटानागपुर की अपनी पूरी यात्रा मैंने मोटरकार से की। सभी रास्ते बहुत ही बढिय़ा थे और प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत दिव्य तथा मनोहारी था। चाईबासा से हम चक्रधरपुर गए फिर बीच में खूंटी और एक-दो अन्य स्थानों पर रुकते हुए रांची पहुंचे। हमारे रांची पहुंचने के वक्त ठीक शाम के सात बजे महिलाओं ने एक बैठक का आयोजन रखा था। बैठक में शामिल लोगों में बंगाली बहुसंख्यक थे।
बापू आगे लिखते हैं, 'छोटानागपुर प्रवास के दौरान और भी कई दिलचस्प बातें हुई जिनमें खादी पर एन.के. रॉय और उद्योग विभाग के एस.के. राव के साथ हुई चर्चा तो शामिल है ही ब्रह्मचर्य आश्रम (अब योगदा सत्संग आश्रम) का दौरा भी स्मरणीय है। जिसकी स्थापना कासिमबाजार के महराजा की देन है। मोटरगाड़ी से ही हम रांची से हजारीबाग गए, जहां पहले से तयशुदा कार्यक्रमों के अलावा मुझे संत कोलंबा मिशनरीज कॉलेज, जो बहुत पुराना शिक्षण संस्थान है, के छात्रों को भी संबोधित करने का आमंत्रण मिला। बापू ने वहां भी संबोधित किया और फिर पलामू आदि की भी यात्रा की। इस तरह बापू ने 1925 में झारखंड को बहुत नजदीक से देखा। तब पुरुलिया रांची में था। अब वह पं बंगाल का हिस्सा है। बापू ने योगदा आश्रम का ऊपर जिक्र किया है। इसकी स्थापना भी 1917 में हुई थी। चंपारण आंदोलन भी 1917 में शुरू हुआ था। दोनों ने अपने शताब्दी वर्ष मनाए। बापू से परमहंस योगदानंद की निकटता बढ़ गई थी। बापू के वर्धा आश्रम में भी परमहंस गए थे। दो संत अलग-अलग ध्येय पर काम कर रहे थे।
झारखंड में बापू की अनेक यादें हैं। कितना बखान करूं? पर इस बखान के बिना बापू के झारखंड की कहानी अधूरी ही रहेगी। वह कहानी है रामगढ़़ कांग्रेस की। बापू अंतिम बार 1940 में आए जब रांची से 40 किमी दूर रामगढ़ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। मार्च का महीना था। वे मोटरकार से रामगढ़ गए। वह कार आज भी सुरक्षित है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस महत्वपूर्ण अधिवेशन में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद अध्यक्ष बनाए गए थे। दामोदर नदी के किनारे जंगलों में सैकड़ों पंडाल लगाए गए थे, जिसमें महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ श्रीकृष्ण सिंह, डॉ.राजेंद्र प्रसाद जैसे तमाम नेताओं की भागीदारी हुई थी। इस बार जब वे आए तो रांची में वे बिरला कोठी, लालपुर में ठहरे थे, जहां अब बीआइटी एक्सटेंशन चलता है। वे रांची से फोर्ड गाड़ी में रामगढ़ पहुंचे थे। रांची के स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मी नारायण जायसवाल के पास फोर्ड कंपनी की बीआरएफ -50 गाड़ी थी। इस गाड़ी को खुद लक्ष्मी नारायण ड्राइव कर ले गए थे। रांची और रामगढ़ इसी गाड़ी से आना जाना होता था। गांधीजी 1940 में एक मार्च से 20 मार्च तक रहे। हालांकि वे 12 मार्च की शाम ईसाई मिशनरियों से बातचीत करने के लिए रामगढ़ से चले आए। 14 मार्च को रामगढ़़ में खादी ग्रामोद्योग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। 19 मार्च की सुबह ठक्कर भवन एवं हरिजनों एवं आदिवासियों के लिए भवन का उद़घाटन करने के बाद रामगढ़ चले गए। रामगढ़़ कांग्रेस ऐतिहासिक रहा। खूब आंधी-पानी भी आई। इसके बाद भी सम्मेलन संपन्न हुआ। पर, बापू का असहयोग आंदोलन हो या 1942 का करो या मरो का नारा, रांची ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। रांची में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। देश जब आजाद हुआ, उस आधी रात को रांची पहाड़ी पर तिरंगा फहराया गया। तब से इस मंदिर पर 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगा फहराया जाता है। पर, कुछ ऐसे भी क्रांतिकारी थे, जब बंटवारे से क्षुब्ध थे। रांची में उस रात जब जश्न मन रहा था, जब आजादी के एक दीवाने डॉ यदुगोपाल मुखर्जी सरकुलर रोड वाले अपने मकान में चिंतामग्न बैठे थे। वे बंटवारे से बहुत दुखी थे। गांधी के कहने पर ही अ‍िंहसक आंदोलन छोड़ कांग्रेस का दामन थामा था। ये ऐसे वीर सिपाही थे कि गांधी ने कहा था कि आजादी के बाद कांग्रेस की सदस्यता छोड़ देनी है। 15 अगस्त, 1947 को ही कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने बिहार का राज्यपाल बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उसे ठुकराकर गरीबों की सेवा आजीवन करते रहे। ऐसे भी निस्पृही थे रांची के आंगन में। अब अपनी राम कहानी को यहीं विराम देती हूं।

झारखंड में गांधी

संजय कृष्ण, रांची
अपने जीवन काल में महात्मा गांधी रांची और झारखंड 1917 के चंपारण आंदोलन से लेकर अंतिम बार रामगढ़़ में संपन्न रामगढ़ कांग्रेस में भाग लेने आए थे। इस तरह 1917 से 1940 के बीच करीब चालीस-पचास दिन की अवधि ठहरती है। सबसे पहले उनका आगमन चंपारण आंदोलन के सिलसिले में हुआ था। दो जून 1917 को पटना से रांची आए और तीन को पहुंचे और चार जून को पूर्व कार्यक्रम के तहत बिहार-ओडिशा के लेफ्टिनेंट गर्वनर सर एडवर्ट गेट से आड्रे हाउस में उनका मुलाकात हुई। गांधीजी की यह छोटी अवधि की यात्रा थी। इस यात्रा में उनके बेटे और पत्नी भी शामिल हुईं थी। इसके बाद वे बिहार चले गए। अगले महीने आठ जुलाई को लिखे गए दो पत्र रांची के पते से मिलते हैं। इसके बाद 23 सितंबर, 1917 का पत्र रांची से लिखा मिलता है, जिसे मगनलाल गांधी को लिखा गया था। वह फिर चंपारन समिति की बैठक के सिलसिले में रांची आए थे। 24 सितंबर को चंपारन समिति की बैठक रांची में ही हुई थी। यह बैठक काफी लंबी चली और आंदोलन को लेकर काफी विमर्श हुआ। 25 जुलाई 1917 को गांधी जी ने लीडर अखबार के संपादक के नाम पत्र रांची से ही लिखा। गांधीजी चंपारण आंदोलन के सिलसिले में फिर पूना से 18 सितंबर को चले और 22 को रांची पहुंचे। यहां करीब 24 से 28 तक चंपारण जांच समिति की बैठक में शामिल हुआ। इसके बाद पांच अक्टूबर को वे रांची से पटना चले गए। 25 सितंबर को ही जमनालाल बजाज को भी पत्र लिखा। इसके बाद मगन लाल गांधी को, जिसे जिक्र किया कि बुखार से मुक्त नहीं हुआ हंू। बुखार में भी वे चंपारन समिति की बैठक में भाग लेते रहे। एक पत्र 27 सितंबर को जीए नटेसन को लिखा और उसमें भी अंत में लिखा कि 'मेरे ज्वर के कारण आप चिंतित न हों। वह अपने समय से ही जाएगा। वह यहां अक्टूबर के पहले सप्ताह तक रांची रहे। रांची में गांधीजी के रहने के बारे में चार अक्टूबर 1917 तक का जिक्र मिलता है। चंपारन के इस आंदोलन में रांची भी जुड़ गया और यह एक प्रमुख केंद्र बन गया। गेट ने एक कमीशन बना दी और गांधीजी को इसका मेंबर बनाने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद कमीशन का काम बेतिया से शुरू हुआ। एक तरह से चंपारण आंदोलन की नीति, रणनीति और जांच समिति का रांची में ही गठन किया गया। फिर इस आंदोलन की सफलता की कहानी सब जानते हैं। गांधीजी यहां श्रद्धानंद रोड में रहते थे। पर, अब किसी को पता नहीं कि वह कौन सा मकान था। पटना के एक वकील जो गांधीजी के साथ थे, उनका कोई रिश्तेदार यहां थे तो पहली बार वे यहीं रहे। इस दौरान एक उल्लेखनीय बात यह हुई कि उनकी मुलाकात टाना भगतों से हुई। यह आंदोलन 1914 से शुरू हुआ और यहा धार्मिक पाखंड के साथ अंग्रजों के लगान के खिलाफ था और अहिंसक था। गांधी ने आठ जुलाई 1917 को अपनी डायरी में इसका उल्लेख किया है। लिखा है, आज मैंने टाना भगत नामक आदिवासी जमात के लोगों से बात की। ये अहिंसा और सदाचार को मानने वाले हैं।Ó
13 से 18 सितंबर तक चार पहिया से घूमा झारखंड



गांधीजी की दूसरी यात्रा 1925 में शुरू हुई। उन्होंने 1925 में 13 से 18 सितंबर तक  झारखंड की यात्राकी चार पहिया से। इस दौरान वे पुरुलिया, चाईबासा, चक्रधरपुर, खूंटी, रांची, मांडर, हजारीबाग में रहे और इन स्थानों पर आयोजित अनेक बैठकों को संबोधित किया। 17 को उन्होंने रांची के संत पॉल स्कूल के मैदान में तीन बजे सभा को संबोधित किया। उन्होंने चरखा की बात की और लोगों ने एक हजार रुपये की थैली उस सभा में गांधीजी को भेंट की।
अपनी झारखंड यात्रा में अनेक लोगों से भी मिले और कई महत्वपूर्ण संस्थानों को भी देखा था। झारखंड से लौटने के बाद 'यंग इंडियाÓ के आठ अक्टूबर 1925 के अंक में  'छोटानागपुर मेंÓ शीर्षक से उन्होंने दो संक्षिप्त संस्मरण लिखे...सितंबर की यात्रा का जिक्र करते हुए गांधीजी लिखते हैं, छोटानागपुर की अपनी पूरी यात्रा मैंने मोटरकार से की। सभी रास्ते बहुत ही बढिय़ा थे और प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत दिव्य तथा मनोहारी था। चाईबासा से हम चक्रधरपुर गए फिर बीच में खूंटी और एक-दो अन्य स्थानों पर रुकते हुए रांची पहुंचे। हमारे रांची पहुंचने के वक्त ठीक सात बजे शाम को महिलाओं ने एक बैठक का आयोजन रखा था। बैठक में आयोजकों ने मुझसे देशबंधु मेमोरियल फंड के लिए अपील करने की कोई बात नहीं की थी, ऐसा मेरा ख्याल है। फिर भी मैं शायद ही कभी किसी सार्वजनिक सभा या बैठक में इस अपील को रखने से चुका हूं और मैंने नि:संदेह इस बैठक में भी यह अपील की। बैठक में शामिल लोगों में बंगाली बहुसंख्यक थे।

योगदा आश्रम में भी गए गांधीजी
गांधीजी आगे लिखते हैं, 'छोटानागपुर प्रवास के दौरान और भी कई दिलचस्प बातें हुई जिनमें खद्दर पर एन.के. रॉय और उद्योग विभाग के एस.के. राव के साथ हुई चर्चा तो शामिल है ही ब्रह्मचर्य आश्रम (अब योगदा सत्संग आश्रम) का विजिट भी स्मरणीय है, जिसकी स्थापना कासिमबाजार के महराजा की देन है। मोटरगाड़ी से ही हम रांची से हजारीबाग गए, जहां पहले से तयशुदा कार्यक्रमों के अलावा मुझे संत कोलम्बा मिशनरीज कॉलेज, जो बहुत पुराना शिक्षण संस्थान है, के छात्रों को भी संबोधित करने का आमंत्रण मिला। गांधीजी ने वहां भी संबोधित किया और फिर पलामू आदि की भी यात्रा की। अंतिम बार गांधीजी ने रामगढ़ कांग्रेस में आए थे और करीब दस दिनों तक यहां रहे थे। 

मोटरकार से गए रामगढ़
मार्च, 1940 में कांग्रेस का अधिवेशन रांची से 40 किमी दूर रामगढ़ में हुआ। रांची से वे कार से गए। वह कार आज भी सुरक्षित है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस महत्वपूर्ण अधिवेशन में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद अध्यक्ष बनाए गए थे। दामोदर नदी के किनारे जंगलों में सैकड़ों पंडाल लगाए गए थे, जिसमें महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ श्रीकृष्ण सिंह, डॉ.राजेन्द्र प्रसाद जैसे तमाम नेताओं की भागीदारी हुई थी। इस बार जब वे आए तो  रांची में वे बिरला कोठी, लालपुर में ठहरे थे, जहां अब बीआइटी चलता है। वे रांची से फोर्ड गाड़ी में रामगढ़ पहुंचे थे। रांची के स्वतंत्रता आंदोलन लक्ष्मी नारायण जायसवाल के पास फोर्ड कंपनी की बीआरएफ -50 गाड़ी थी। इस गाड़ी को खुद लक्ष्मी नारायण ड्राइव कर रहे थे। रांची और रामगढ़ इसी गाड़ी से आना जाना होता था। गांधीजी 1940 में एक मार्च 20 मार्च तक रहे। हालांकि वे 12 मार्च की शाम ईसाई मिशनरियों से बातचीत करने के लिए रामगढ़ से चले आए। 14 मार्च को रामगढ़़ में खादी ग्रामोद्योग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। 19 मार्च की सुबह ठक्कर भवन एवं हरिजनों एवं आदिवासियों के लिए भवन का उद्घाटन करने के बाद रामगढ़ चले गए। रामगढ़़ कांग्रेस ऐतिहासिक रहा। खूब आंधी-पानी भी आई। इसके बाद भी सम्मेलन संपन्न हुआ।