भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी दिए जाने पर गांधी का वक्‍तव्‍य

                                                                                                                         नई दिल्ली
                                                                                                                       23 मार्च 1931
भगत सिंह और उनके साथी फांसी पाकर शहीद बन गए हैं। ऐसा लगता है मानो उनकी मृत्यु से हजारों लोगों की निजी हानि हुई है। इन नव युवक देशभक्तों की याद में प्रशंसा के जो शबद कहे जा सकते हैं, मैं उनके साथ हूं। तो भी देश के युवकों को उनके उदाहरण की नकल करने के विरुद्ध चेतावनी देता हूं। बलिदान करने की अपनी शक्ति, अपने परिश्रम और त्याग करने के अपने उत्साह का उपयोग हम उनकी तरह न करें। इस देश की मुक्ति खून करके प्राप्त नहीं की जानी चाहिए।
सरकार के बारे में मुझे ऐसे लगे बिना नहीं रहता कि उसने क्रांतिकारी पक्ष को अपने पक्ष में करने का सुनहरा अवसर गंवा दिया है। समझौते की दृष्टि में रखकर और कुछ नहीं तो फांसी की सजा को अनिश्चित काल तक अमल में न लाना उसका फर्ज था। सरकार ने अपने काम से समझौते को बड़ा धक्का पहुंचाया है और एक बार फिर लोकमत को ठुकराने और अपने अपरिमित पशुबल का प्रदर्शन करने की शक्ति को साबित किया है।
 पशुबल से काम लेने का यह आग्रह कदाचित अशुभ का सूचक है और यह बताता
है कि वह मुंह से तो शानदार और नेक इरादे जाहिर करती है, पर सत्ता नहीं छोडऩा चाहती। फिर भी प्रजा का कर्तव्य तो स्पष्ट है।
कांग्रेस को अपने निश्चित मार्ग से नहीं हटना चाहिए। मेरा मत तो यह है कि ज्यादा से ज्यादा उत्तेजना के कारण होने पर भी कांग्रेस समझौते को मान्य रखे और आशानुकूल परिणाम प्राप्त करने की शक्ति की परीक्षा होने दे।
 गुस्से में आकर हमें गलत मार्ग पर नहीं जाना चाहिए। सजा में कमी करना समझौते का भाग नहीं था, यह हमें समझ लेना चाहिए। हम सरकार पर गुंडाशाही का आरोप तो लगा सकते हैं, किंतु हम उस पर समझौते की शर्तों को भंग करने का आरोप नहीं लगा सकते। मेरा निश्चित मत है कि सरकार द्वारा की गई इस गंभीर भूल के परिणामस्वरूप स्वतंत्रा प्राप्त करने की हमारी शक्ति में वृद्धि हुई है और उसके लिए भगत सिंह और साथियों ने मृत्यु को भेंटा है।
थोड़ा भी क्रोधपूर्ण काम करके हम मौके को हाथ से न गंवा दें। सार्वजनिक हडताल होगी, यह तो निर्विवाद ही है। बिल्कुल शांत और गंभीरता के साथ जुलूस निकालने से बढ़कर और किसी दूसरे तरीके से हम मौत के मुंह में जाने वाले इन देशभक्तों का सम्मान कर भी नहीं सकते।



गांधी वांगमय से साभार

एक अलग आस्वाद की कहानियां ; महुआ माजी की कहानियां

   महुआ माजी ने कहीं कहा था कि ‘आज के दौर की लेखिकाएं स्त्राी विमर्श के नाम पर देह विमर्श कर रही हैं ये कथन सभी लेखिकाओं पर लागू नहीं होता। मेरे दोनों उपन्यास गंभीर विषयों पर हैं। ‘मैं बोरिशाइल्ला’ बांग्लादेश की मुक्तिगाथा पर केंद्रित है, जिसमें सांप्रदायिकता के असर की बात की गई है। दूसरा उपन्यास ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’ में यूरेनियम रेडिएशन के दुष्प्रभाव का चित्राण किया गया है। इस तरह के प्रसंग आए भी हैं तो वो जरूरत के हिसाब से रखे गए हैं और वो कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बेवजह नहीं डाले गए हैं। वैसे भी अन्य लेखिकाओं ने जरूरत के हिसाब से उसे डाला है। केवल उसी के लिए कहानी का ताना-बाना नहीं बुना गया। ये कोई अछूता विषय तो है नहीं कि कहानी की जरूरत है, फिर भी बचकर चल रहे हैं। जहां तक उनकी ये बात कि आज के दौर की लेखिकाओं द्वारा किया जा रहा स्त्राी विमर्श पुरुष विरोधी है तो उसकी शुरुआत तो मैत्रोयी जी नहीं की है। सभी लेखिकाएं ऐसा नहीं करतीं। कहानी की मांग के अनुसार तथ्यों को रखा जाता है। आज उसे जो भी मानें।’ 
  महुआ माजी का यह विचार जाहिर है, किसी बहस का हिस्सा है, जिस पर वह अपना तर्क दे रही हैं। वह अपने दो गंभीर उपन्यासों की चर्चा कर रही हैं और बता रही हैं उन पर ‘ठप्पा’ नहीं लगाया जा सकता। बतौर महुआ, उनकी अब तक आठ-दस कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं। हालांकि अब तक उनका एक संग्रह आ जाना चाहिए, जो नहीं आया है। आ जाता तो उनके पाठकों को यह सुविधा जरूर होती कि एक ही जगह उनकी रचनाओं का स्वाद ले सकते। इनमें उनकी व्यस्तता भी हो सकती है। वे एक लेखिका के साथ-साथ आज राजनीति में भी सक्रिय हैं। पिछली बार रांची विधानसभा क्षेत्रा से चुनाव भी लड़ चुकी हैं और इस बार भी काफी परिश्रम कर रही हैं। तो भी, सक्रिय राजनीति की भागमभाग के बीच अपने लेखन को बचाए रखना कम बड़ी बात नहीं। फिर भी समय निकाल वे कुछ लिख ही लेती हैं। हम यहां उनकी दो कहानियां- वागर्थ के 2005 में प्रकाशित ‘रोल मॉडल’ और 2017 में लिखी ‘इलेशगुंड़ि’ की चर्चा कर सकते हैं। ये दो कहानियां इसलिए कि पहली कहानी सक्रिय राजनीति से पहले की है, जब वे सिर्फ ‘लेखिका’ हुआ करती थीं, दूसरी राजनीति में रहते हुए लिखीं। दोनों में कहानीपन है। कहन है। कथा है। दोनों के क्षेत्रा अलग हैं। बोली-बानी का भी दोनों में अलग स्वाद और आनंद है। इससे हिंदी कहानी का फलक विस्तृत होता है। गैरहिंदी समाज के बारे में भी जान पाते हैं, अन्यथा यहां तो बहुत ‘अकाल’ है।
चलिए, बात देह विमर्श से ही शुरू करते हैं। यह अपने हिंदी साहित्य की बड़ी विडंबना है कि हम स्त्राी की आजादी को उसकी देह तक ही सीमित कर देते हैं। स्त्राी जितनी उच्छृंखल होगी, वह उतनी ही आजाद-हम ऐसा ही मानने लगते हैं। जैसे उसकी आजादी बस इसी में है। उनके विचार, उनकी बौद्धिकता, उनकी प्रतिभा का कोई मोल-मतलब नहीं। स्त्राी विमर्श के नाम पर लंबे समय से यही चल रहा है और चलता रहेगा और इस तरह की लेखिकाएं इस तरह के प्रसंगों के लिए-इसी तरह के कमजोर तर्क पेश करती रहंेगी। जैसे फिल्म के निर्देशक देह राग परोसने के लिए यह तर्क करते हैं- यह कहानी की मांग थी। पर वे यह सच नहीं बोलते कि कहानी की मांग हो न हो, कमजोर कथानक की फिल्म चलाने के लिए यह जरूरी हो जाता है। इसलिए लेखिकाएं भी ‘कहानी की मांग’ के नाम पर इस तरह की छूट ले लेती हैं। पर, जिनकी कथा मजबूत होती है, वह भी इस तरह के तर्क का सहारा लेती हैं, तो समझ में आता है कि उनको खुद की कथा पर विश्वास नहीं है। यद्यपि यह छूट लेने में कोई बुराई नहीं, लेकिन ‘मांग’ के नाम पर यह सब कहने-लिखने-बताने की जरूरत नहीं। जहां तक उनके गंभीर उपन्यास मरंगगोड़ा की बात है-वहां भी अनावश्यक की इस तरह के प्रसंग हैं, जिनकी कोई जरूरत नहीं। मन हो तो इस तरह के प्रसंग को बहुत सलीके से पेश किया जा सकता है। पाठक समझ भी जाएगा कि लेखिका या लेखक क्या कहना चाहता है। बेडरूम में प्रवेश करने की जरूरत नहीं होती है। महुआ ने पहले तो अपना बचाव किया, फिर उन सभी लेखिकाओं का। यानी, वह भी उसी कतार में खड़ी हो जाती हैं। इस प्रसंग में प्रेमचंद की एक सच्ची पहली कहानी, जिसे उन्होंने माना कि-यह मेरी पहली रचना है-याद आती है। यह कहानी उन्होंने अपने मामूं पर ही लिखा था। उनका यह वर्णन देखिए-
 ‘आखिरकार एक बार उन्होंने वही किया, जो बिन ब्याहे लोग अकसर किया करते थे। एक चमारिन के नयन बाणों से घायल हो गये।...दूसरे दिन शाम को चम्पा-यानी चमारिन-मामंू साहब के घर आई, तो उन्होंने अन्दर का द्वार बंद कर दिया। महीनों के असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मांमू साहब ने अपने प्रेम को व्यावहारिक रूप देने का निश्चय किया था। चाहे कुछ हो जाय, कुल-मरजाद रहे या जाय, बाप दादा का नाम डूबे या उतराये! उधर चमारों का जत्था ताक में था ही। इधर किवाड़ बंद हुए, उधर खटखटाना शुरू किया। पहले तो मांमू साहब ने समझा, कोई आसामी मिलने आया होगा, किवाड़ बंद पाकर लौट जायगा, लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुना तो घबड़ाए।....’ प्रसंग काफी लंबा और रोचक है। यह कहानीकार पर निर्भर करता है कि वह कहना क्या चाहता है। जिनका अपने कथन और कहन पर भरोसा नहीं था, वह ऐसे तर्क और प्रसंग की वकालत करते हैं। वह चाहते हैं कि इस्मत आपा और मंटो की तरह ख्यात हो जाएं, लेकिन वह उस तरह का विजन नहीं ले आ पाते। 
  महुआ की कहानी ‘इलेशगुंड़ि’ में भी इस तरह के प्रसंग हैं, जिनकी कतई जरूरत नहीं। वह इसलिए कि वह खुद की कहती हैं-कहानी की मांग के अनुसार। यहां कहानी की कोई मांग नहीं। यह लेखिका का अपना मन है। वह रूपकुमारी की पीड़ा को दूसरी तरह भी व्यक्त सकती थीं। इसके लिए यह जरूरी नहीं था कि...‘‘बहुत कम लोगों को पता था कि रूपकुमारी का गर्भ उसके पति की इसी आसुरी प्रवृत्ति के कारण ही गिर गया था। रूपकुमारी के लाख मना करने के बावजूद वही पहले की तरह उठा-पटक... ऊपर-नीचे...।...प्रचंड उत्तेजना से कालीपॉदो का खून गर्म हो उठा। जब खुद को रोक पाना असंभव हो गया तब अचानक आकर पीछे से जकड़ लिया उसे। कुछ देर तक तो वह खुद को कालीपॉदो के सख्त आलिंगन से छुड़ाने की कोशिश करती रही पर उसके स्पर्श में कुछ ऐसा था कि धीरे-धीरे उसका प्रतिरोध शिथिल पड़ता चला गया। पति-सुख से वंचित उपवासी देह उसके नियंत्राण से बाहर होती चली गयी। महीनों का संयम किसी पुराने जर्जर कीले की तरह भरभराकर ढह गया। सांप की तरह लिपट गयी वह उस कामी पुरुष से... प्रश्रय पाकर कालीपॉदो का वहशीपन थोड़ा कम हुआ और बड़े इतमिनान से वह किसी जोंक की तरह उसकी गर्दन की पतली खाल को चूसने लगा। तबतक, जबतक कि वहां गहरा नीला निशान नहीं पड़ गया। उस दिन जितनी देर तक वे दोनों कदम्ब पेड़ के नीचे आलिंगनरत रहे... एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था रहे... हवा में धूलकण की जगह कदम्ब फूल के रेणु उड़ते रहे। फिर भी उनकी देह कीचड़ से ऐसे सन गयी कि घर जाने से पहले दोनों को साथ-साथ पद्म-पोखर में उतरना पड़ा।’’
  लेखिका की बेवजह सफाई के बरक्स ही इस प्रसंग को यहां रखा गया है। ‘इलेशगुंड़ि’ दरअसल, रूपकुमारी की कहानी है। ‘इलेशगुंड़ि’ यानी बारिश की महीन बूंदें। बांग्ला का यह शब्द है और इसकी अर्थध्वनियां पूरी कहानी में अंतरर्धारा की तरह मौजूद हैै। बारिश की महीन-महीन या छोटी-छोटी बूंदे। नदी की सतह पर जब यह बूंदे पड़ती हैं तो हिल्सा मछली गहरे जल से सतह पर आ जाती है। इस तरह रूपकुमारी का दर्द भी सतह पर आता है-वह दिखाई देने लगता है। कालीपॉदो एक प्रमुख पात्रा है। शादी-सुदा है। रूपकुमारी भी। लेकिन रूपकुमारी अपने पति के छल का शिकार बन जाती है। शादी कर मौज लूट वह गांव से भाग जाता है। पर, रूप उसके इस छल से असावधान ही रहती है और उसकी प्रतीक्षा करती रहती है, लेकिन वह आता नहीं। कालीपॉदो भी उसे खोजता रहा है। एक दिन सूचना देता है- वह तो शहर में किसी और स्त्राी के साथ है। इसके बाद गांव से वह शहर जाती है-उसके घर। वहां झगड़ा होता है और फिर वह अपने गांव चली आती है। काली भी इसी ताक में। अंततः उसे अपने घर में पनाह देता है और उसकी कीमत भी वसूलता है।  
 सब कुछ ठीक चल रहा होता कि गांव में बाढ़ का प्रकोप। सभी बेघर। क्या अमीर क्या गरीब। त्राण शिविर में पनाह की सबको जरूरत। पर इस त्राण शिविर में कालीपॉदो रूपकुमारी को पहचानने से ही इनकार कर देता है। शिविर के बचावकर्मी सबका नाम रजिस्टर में लिखते हैं। वह रूपकुमारी से भी पूछते हैं। रूप कुछ कहती है-लेकिन कालीपॉदो बोल उठता है-कुछ नहीं लगता। वह उससे अपने संबंध को इनकार कर देता है। रूपकुमारी जो समय की मारी दुखियारी, उसके घर सौत बनकर हर दुख सहते हुए रह रही होती है। लेकिन इस त्राण शिविर में रूपकुमारी पर पति की तरह अधिकार रखने वाला काली कह देता है-कुछ नहीं लगता। रूप की इस कथा-व्यथा को महुआ माजी ने बहुत संवेदनशीलता के साथ उभारा है। रूप की पीड़ा को यहां बस आप महसूस कर सकते हैं। बाढ़ से पराजित मानुस कितना स्वार्थी और पतित हो सकता है...‘‘क्या वाकई भरपेट भोजन-कपड़े के लिए ही उसने सोच-समझकर कालोपॉदो को फाँसा?- वह खुद ही से पूछती। यह उस़की पेट की क्षुधा थी या देह की ? या फिर मन की? क्यों प्रत्याख्यान नहीं कर पायी वह उसके प्रेम-निवेदन का... देह-आमंत्राण का...? ये कैसी पहेली है ठाकुर! ये मन की ग्रंथियां इतनी जटिल क्यों हैं? क्या एक पुरुड्ढ-मानुष के बिना जीना वाकई इतना मुष्किल था? वह सोचती। फिर सबकुछ भूलकर कालीपॉदो की गृहस्थी में मन रमाने की कोशिश करती। चूल्हा-चौका... बड़े-बुजुर्गों की सेवा... बच्चों पर लाड़ जताना... गाय-गोरू की देखभाल... रिष्तेदारों की तिमारदारी... क्या कुछ नहीं करती वह। सबका दिल जीतने का प्रयास करती। लेकिन हरेक के बर्ताव में उसके लिए हिकारत...सिर्फ हिकारत...। बड़ों की देखा-देखी मासूम बच्चे भी उसे दुत्कारना सीख गए थे। एक अछूत-सी ही हैसियत थी उस घर में उसकी।’’ बाबा तुलसी बहुत पहले लिख गए हैं-पराधीन सपनेहुं सुख नहीं। स्त्राी की यही दशा। सालों से। राजेंद्र यादव ने कहीं लिखा था-कमर के उ$पर स्त्राी देवी है, कमर के नीचे वैश्या। हमारा समाज स्त्राी को बस इसी नजर से देखता है-स्त्राी इसके सिवाय भी कुछ है-हम सोच नहीं पाते और विमर्श के नाम पर एक स्त्राी भी जब खुद स्त्राी को इसी नजरिए से पेश करती है-तो समझ में आता है-मामला लेखन का नहीं, प्रतिबद्धता का नहीं बाजार का है। बाजार हमारे चारों तरफ घुस चुका है। दिमाग में भी। वह बराबर चलता रहता है। 
  यह कहानी 2017 की है। स्थान बंगाल का कोई गांव हो सकता है। बंगाल में बहने वाली कोई नदी। कोई पद्मपोखर और उसके किनारे कदंब का विशाल गाछ। ये सब भी किसी पात्रा की तरह ही उपस्थित होते हैं। हवाएं भी यहां कुछ कहती-सुनती नजर आती हैं। कहानी सिर्फ मानुस जात की नहीं। कहानी में कदंब की भी वही भूमिका है, नदी की भी और ‘इलेशगुंड़ि’ की भी। जब कहानी बंगाल के किसी गांव की है तो जाहिर है, यहां ऐसे शब्द भी आपको मिलेंगे जिसे हम हिंदी में आढ़त कहते हैं यहां आड़ोत पाते हैं। उपमा का सौंदर्य भी कम नहीं- ‘तुझे देख, तेरा कष्ट देख मेरा मन हापुस-हुपुस करता है रे रूपकुमारी।’ हापुस-हापुस शब्द बांग्ला में प्रचलित हैं। इस कहानी में बांग्ला का प्रभाव काफी है। शब्दों पर तो है ही।
   महुआ की दूसरी कहानी है ‘रोल मॉडल’। यह वागर्थ के 2005 के सितंबर अंक में आई थी। इस कहानी में रांची का जिक्र नहीं है, उन मुहल्लों के भी नहीं, जो कहानी में आते हैं, लेकिन रांची से जो परिचित हैं, उन्हें पता चल जाएगा कि कहानी कहां घटित होती है। दरअसल, रांची वैसे तो शिक्षा के लिए जाना जाता है। यहां ईसाई मिशनरियों ने एक बड़ा काम इस क्षेत्रा में किया। प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक। फिर बीआइटी जैसे संस्थान हैं। 2000 में बिहार से अलग हुए झारखंड में 2018 तक तो कई यूनिवर्सिटियां खुल गई हैं। लेकिन 2005 तक भी महत्वपूर्ण कॉलेज तो थे ही। इसलिए, झारखंड से इतर दूसरे प्रदेशों से भी लड़कियां और लड़कें यहां पढ़ने के लिए आते हैं। राज्य के दूसरे शहरों से तो आते ही हैं। बाहर से आई छात्राओं के लिए रहने के लिए कमरा चाहिए। हर कॉलेज और संस्थानों में पर्याप्त छात्रावास तो रहते नहीं। फिर उन्हें या तो पेइंग गेस्ट होकर रहना पड़ता है या कमरा किराया लेकर। यहां भी फिर बनारस की तरह अपने घर के कमरे किराये पर उठाने लगे। एक-एक कमरे में चार-चार चौकियां लगा दी और फिर प्रति चौकी कमाई करने लगे। जिनके घरों में अतिरिक्त कमरे थे, उन्हें अपने कमरे उठाने में तो कोई दिक्कत नहीं थीं, जिनके कम थे, वह भी एक-दो कमरे में खुद को समेट लिया और एकाध कमरा किराये पर लगा दिया। जिनके पास जगह-जगह ही थी, उन्होंने लॉज की शक्ल दे दी। और, जिनके पास कुछ नहीं था, वे दूसरों को देख कूढ़ने लगे। तरह-तरह की बातें बनाने लगे। इस तरह मोहल्लों की अलग पहचान बनने लगी और जब गलियां लड़कियों से गुलजार होने लगी तो फिर मंडराते हुए भंवरे भी आने लगे। फिर तरह-तरह की चर्चा भी आने लगी। जो गलियां सुनसान रहा करती थीं, गुलजार रहने लगीं, शाम में सन्नाटा पसर जाने वाली गलियों में भी देर शाम तक खुसूर-फुसूर शुरू हो गया। जिन बुजुर्गों के पास कोई काम नहीं था, उन्हें भी काम मिल गया, वे गलियों की ओर ताका करते थे। और, इसी कहानी में एक मजेदार पात्रा हैं सनातन बाबू। इनके पास कोई कमरा नहीं रहता है, लेकिन जब लड़कियां आकर पूछती हैं-अंकल कमरा है तो वे मना नहीं करते। बल्कि पूरी जांच-पड़ताल में जुट जाते हैं-कितने लोग हो, खाना कहां खाओगी, बनाओगी या मंगाओगी-बनाओगी तो गैस पर या स्टोव पर वगैरह-वगैरह। सनातन बाबू की हर जिज्ञासा और सवाल का जवाब देते जब लड़कियां थक जाती हैं-तब कहती हैं-तो अंकल अब हमारा कमरा दिखा दीजिए। अब सनातन बाबू का जवाब सुनिए-कमरा! कमरा कहां है? सनातन बाबू आश्चर्य से कहते हैं-हमारे घर पर कोई कमरा वमरा खाली नहीं है। नीचे हम मियां-बीवी और मंझले भाई का परिवार रहता है। उ$पर हमारे बड़े भाई का परिवार। हमारे यहां खाली कमरा होता तो अब तक दे नहीं देता? यहां इतनी देर धूप में खड़ा करके रखता क्या?
   इस तरह-तरह एक-एक दरवाजा खटखटाते हुए लड़कियों को कमरा मिल ही जाता है। गांव, कस्बे या दूसरे शहरों से आई लड़कियां यहां काफी अपने को उन्मुक्त और आजाद महसूस करती हैं। यह आजादी कपड़ों से भी झलकती है और देर शाम लौटते वक्त भी। जब कोई न कोई भंवरा छोड़ जाता है। या फिर देर रात जब घर से किसी प्रोजेक्ट पूरा करने का बहाना बना निकलती हैं।
हमारा मध्यवर्गीय समाज अपने घर में झांकने के बजाय दूसरों के घरों में ताका-ताकी में खूब रस लेता है। यह हमारे भीतर कहीं कंुठा भी है। मध्यवर्गीय परिवार परंपरा की भी चिंता करता है, समाज की भी, धर्म की भी। संस्कार तो पीछा करते रहते हैं, अंत तक। अंतिम तक। कुछ लोगों को लड़कियों का पहनावा पसंद नहीं। कुछ चाहते हैं, मोहल्ले से इन्हें बाहर किया जाए। तो कुछ अतिरिक्त कमाई से चुप हैं। अर्थ भी जरूरी है और इसके लिए थोड़ा-बहुत समझौता किया जा सकता है। पितृसत्तात्मक समाज की अपनी चिंता भी कम नहीं। दुश्वारियां यहां भी हैं। पर, यही लड़कियां तब ‘रोल मॉडल’ उन लोगों के लिए बन जाती हैं, जो लगातार इन्हें शक और संदेह की निगाह से देखते आ रहे थे। इसी तरह एक लड़की की, जो मकान मालिक की निगाह में उच्छृंखल मानी जाती थी, एक दिन मिठाई का डब्बा लेकर घर मालिक को खिलाती हुई यह सुखद सूचना देती है-अंकल मेरा जॉब लग गया है। पचास हजार महीना। अंकल का मुंह खुला का खुला रह जाता है। अंकल की सारी चेतना धराशायी हो जाती है। सुबह जब लड़की अपना सामान समेटकर जाने लगती है तब रतजगे अभिभावक अपनी बेटी का हाथ पकड़कर उस लड़की के पास आ धमकते हैं-हम भी अपनी लड़की को दिल्ली में कोचिंग कराना चाहते हैं। तुम रखोगी अपने पास तो ‘लायक’ बन जाएगी। उस परिवार के लिए वह लड़की रोल मॉडल बन जाती है। यहां भी पैसा प्रमुख कारण है। पैसा है तो सारी एैब छिप जाती हैं। पूंजी का बड़ा महत्व है। चाणक्य ने भी अपनी नीति पुस्तक का नाम ‘अर्थशास्त्रा’ रखा था और मार्क्स भी पूंजी के इर्द-गिर्द झूलते नजर आते हैं। पंूजी का बड़ा खेल है जीवन में। जिनके पास पूंजी है, उनके लिए परंपरा, संस्कार, संस्कृति कोई मायने नहीं रखती, लेकिन उसके वे सबसे बड़े प्रवक्ता और संरक्षक बना दिए जाते हैं। बहरहाल, यह कहानी एक दकियानूसी परिवार के विचार परिवर्तन की कहानी है। परिवार भी समाज की एक इकाई है। परिवार से ही समाज बनता है। एक परिवार के विचार बदले तो समाज का विचार भी बदल सकता है। जो दिखता है, वह पूरा सच नहीं होता। देखने का एक नजरिया यह भी है हम अपनी आंखों से जो देखते हैं, उसमें हमारी सोच और संस्कार भी शामिल होते हैं। दो आंखें वर्तमान को देखते हुए भी हजारों सालों को भी देखती हैं। इसलिए, जो दिखे, उस पर सहसा और तुरत विश्वास कर लेने की जरूरत नहीं है। महुआ की इस कहानी ने तब काफी चर्चा बटोरी थी। एक नया विषय था। महुआ अपने लिए नया-नया विषय तलाशती हैं। समाजशास्त्राी हैं, इसलिए किसी चीज को पैनी निगाह से देखती हैं। जब वे महिला आयोग की अध्यक्ष थीं, तब उनके पास परिवार की तरह-तरह की सच्ची कहानियां आईं। वे कहानियां भी किसी शक्ल में कागजों पर उतरेंगी, ऐसा विश्वास है। एक लेखक के लिए अनुभव भी जरूरी है और खोजी प्रवृत्ति भी। लगन तो चाहिए ही। महुआ में तीनों है। ये कहानियां रोज घटित होती हैं, लेकिन महुआ ने जिस रोचक ढंग से इसे प्रस्तुत किया है, वह प्रशंसनीय है। ये कहानियां विमर्श से हटकर लिखी गई हैं। इसलिए इनकी आयु लंबी होगी। जो विमर्श, राजनीति और किसी खांचे में निबद्ध होकर लिखी जाती हैं-वे अल्पायु होने के लिए अभिशप्त होती हैं। आंदोलन से उपजी कहानियां आंदोलन के साथ ही समाप्त हो जाती हैं।
लमही से साभार
                                                                        

‘जाग चेत कुछ करौ उपाई’: समय से गुजरते हुए

 मिथिलेश्वरजी का आत्मकथात्मक उपन्यास ‘जाग चेत कुछ करौ उपाई’ अभी-अभी वाणी प्रकाशन से छपकर आया है। पुस्तक की पीठ पर इसके बारे में सूचना दी गई है-‘...आत्मकथात्मक उपन्यासों का यह तीसरा और अंतिम उपन्यास है। लेकिन अब तक की उनकी कृतियों में बेजोड़, बेमिसाल और यादगार कृति है।’ इसके पहले उनकी आत्मकथा की दोनों पुस्तकें ‘पानी बीच प्यासी’ 2010 और ‘कहां तक कहें युगों की बात’ 2011 आ चुकी हैं। सूचना के मुताबिक, यह तीसरा और अंतिम है। मिथिलेश्वर जी 65 को छू रहे हैं। लेकिन अवकाश ग्रहण करने से पहले ही उन्होंने अपनी आत्मकथा अपने प्रिय पाठकों को सौंप दी। अपने जीवन-संघर्ष को अपने पाठकों से साझा किया है तो इसके पीछे एक दृष्टि और उद्देश्य भी है कि समय रहते अपने पाठकों को अपनी राम कहानी बता दें। ऐसा न हो कि आगे चलकर उम्र आधिक्य के कारण स्मृति लोप का शिकार होना पड़े और ‘आत्मकथा’ मन में ही रह जाए। एक सजग, सचेत और संवेदनशील रचनाकार के नाते उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई और यह आपबीती, उनके निजी जीवन या गांव-घर की चौहद्दी तक सिमटी नहीं है। एक पूरा काल खंड और उस काल खंड में समय का पूरा इतिवृत्त अपने पूरेपन में समाया हुआ है। जिन लोगों ने उनकी पहले दोनों आत्मकथा नहीं पढ़ी है, वह इस अंतिम आत्मकथात्मक उपन्यास को पढ़कर दोनांे की कमी को पूरा कर सकते हैं। क्योंकि इसमें उन्होंने अपने अब तक के संपूर्ण जीवन के कालखंड को समेट दिया है।
  साहित्य की सामाजिकता में विश्वास करने वाले मिथिलेश्वरजी पिछले 45-50 साल से रच रहे हैं। उनका पहला कहानी संग्रह 1976 में ‘बाबूजी’ नाम से आया था। तब से उनकी रचना प्रक्रिया अनवरत-सोद्देश्य जारी है। बेशक, इन 44-45 सालों में देश-समाज-गांव, परिवार-परंपरा और संस्कार बदले हैं। प्रेमचंद के गांव बदले हैं। रेणु के गांव ने नई शक्ल धारण की है। आरा-बैसाडीह का गांव भी बदलाव से अछूता नहीं रह सका है। वह गांव भी बदला। गांव की पगडंडियां बदलीं। गांव की संस्कृति और संस्कार बदले। तालाबों की शक्लोसूरत बदली। खपरैल और झोपड़ियां बदलीं। खूटें बदले। आम, जामुन, कटहल के स्वाद बदले। संवेदनाएं बदलीं। घर बदले। आंगन बदले। चूल्हों की तासीर बदली। ये बदलाव कई स्तरों पर हुए। इन बदलावों को देखने, समझने और महसूस करने के लिए मिथिलेश्वरजी की रचनाएं सबसे अधिक विश्वसनीय, प्रमाणिक और तरतीब नजर आती हैं। पांच दशकों का उनका रचनात्मक संसार देश के बदलाव की यात्रा भी है और उनकी यह आत्मकथा ‘उपसंहार’।  
   जब हम ‘जाग चेत कुछ करौ उपाई’ से गुजरते हैं तो उनकी दोनों आत्मकथाओं की यादें ताजा हो जाती हैं और एक बार फिर हम उनके साथ उनके बचपन के गांव से यात्रा आरंभ कर देते हैं। बैसाडीह की यादें, खेत-खलिहान, चोरी-सीनाजोरी और फिर पिता का आकस्मिक निधन। मजबूरियों और विवशताओं के बीच आरा में ठिकाना। मां का संबल। भरा-पूरा परिवार। भाई-बहन की शादी-ब्याह की चिंताएं। फिर नौकरी के लिए संघर्ष। हारी-बीमारी। फिर बेटियों की शादी...वगैरह-वगैरह। जब इन चाहे-अनचाहे उनके जीवन की घटनाओं से गुजरते हैं, उनके जीवट संघर्ष और मजबूत मनोबल को देखते हैं तो यह फिर असाधारण लेखक की साधारण कहानी भर नहीं रह जाती। यह कहानी हमें कई स्तरों पर जोड़ती है, एकाकार करती है और हमारे मर्म को छूती हुई हमें संवेदित करती है। उनका जीवन, समाज का जीवन लगने लगता है। ऐेसे चरित्रा हमें अपने आस-पास दिखाई देने लगते हैं। यह कहानी राम कहानी बन जाती है। घर-घर की कहानी बन जाती है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास ही यही विशेषता है कि यह सिर्फ उन तक ही सीमित नहीं रह जाता। उन्होंने अपने तक इसे केंद्रित भी नहीं किया है। धुरी वही हैं लेकिन परिधि का विस्तार अनंत-असीम है। 
  अपनी इस तीसरी रचना में पूववर्ती दोनों आत्मकथाओं का उल्लेख किया है, ‘‘पानी बीच मीन प्यासी’ नामक आत्मकथा का अंत गर्दिशों, परेशानियों और लंबी बेरोजगारी के बाद विश्वविद्यालय शिक्षक की नौकरी पाने के सुखद एहसास से किया था। मेरे जीवन में उस आत्मकथा के कालखंड की सबसे बड़ी घटना जीविकोपार्जन से जुड़ना था, इसलिए सुखद अनुभूतियों ने उस आत्मकथा को सुखांत बना दिया...। लेकिन इसके विपरीत ‘कहां तक कहें युगों की बात’ के कालखंड में मेेरे जीवन की सबसे बड़ी दुघर्टना या सबसे बड़ा हादसा मां का निधन रहा। इस स्थिति में न चाहते हुए भी मां के निधन के पूरे प्रसंग से इस आत्मकथा को समाप्त करना पड़ा। अगर ऐसा नहीं करता तो मां के निधन की असह्य पीड़ा को कम नहीं कर पाता। मां से संबंधित लंबे और कारुणिक प्रसंग ने ही इस आत्मकथा को दुखांत बना दिया।’’
   मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, लेकिन असमय किसी का निधन हमें झकझोर देता है। इस रचना में भी हम मृत्यु की छाया देख सकते हैं। मिथिलेश्वरजी के पिता भी 43-44 साल की उम्र में चल बसे थे। इस उपन्यास का अथ और इति भी मृत्यु से ही होता है। शुरुआत उनकी नौकरानी रामरती के आकस्मिक निधन से होती है और अंत भी उनके मित्रा चंद्रकांत के अचानक के दुनिया छोड़ अनंत में विलीन हो जाने से होता है। दूसरे अध्याय में अपने कालेज के साथी रामनाथ मिश्र के निधन के बहाने उनके पूरे जीवन, कर्म और संघर्ष को याद करते हैं। एक होनहार, प्रतिभाशाली व्यक्ति कैसे व्यवस्था की चक्की में पीसकर असमय मौत को गले लगा लेता है। रामनाथ मिश्र एक वित्तरहित कालेज में पढ़ाते हैं जो सरकारी होने की बाट जोहता है, लेकिन प्रबंधन तंत्रा के अपने गुणा-लाभ के कारण वह सरकारी नहीं हो पाता और मिश्रजी को इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि वे अपने बीमार बच्चे का ठीक से इलाज भी नहीं करा सकते और एक रात यही सोचते-सोचते दम तोड़ देते हैं। एक सज्जन, कर्मठ और ईमानदार आदमी का  यही हश्र होता है। मिश्र की पूरी कहानी अत्यंत संवेदना के साथ कही गई है। एक प्रतिभा का ऐसे काल-कवलित हो जाना हमें झकझोर देता है। सरकार और संस्थाओं के खोखले चरित्रा और उनके जानलेवा तंत्रा के वे अकेले शिकार नहीं है। सिर्फ आंख उठाकर अपने आस-पास देखने की जरूरत है। शिक्षा का संस्थानीकरण आगे चलकर बाजारीकरण में बदल जाता है। अपने देश में सबसे बुरा हाल शिक्षा और शिक्षण संस्थानों का है। सरकार ने निक्कमेपन की चादर ओढ़ ली है और शिक्षा को बाजार के हवाले कर दिया।
   तीसरे अध्याय में तीसरे मित्रा प्रो डीके तिवारी की कहानी है जो उनसे उम्र में बड़े थे और एक राजनीतिक दल में सक्रिय थे। इस दल के पास वैज्ञानिक विचारधारा थी। जिंदाबाद-मुर्दाबाद जैसे सुघड़-जीवंत नारे थे, वर्गहीन-जातिहीन समाज का सपना था, लेकिन यह पार्टी भी, जब टिकट देने का समय आता, जाति देखने लगती या जनाधार। इस तरह एक समर्पित और ईमानदार पार्टी कार्यकर्ता भी चुनाव लड़ने से वंचित हो जाता। डीके तिवारी भी अवकाश ग्रहण करने के बाद बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सके और वर्गहीन समाज का सपना भी उनके साथ ही चला गया। कथनी-करनी का अंतर व्यक्ति को भी कठघरे में खड़ा करता है और दल या पार्टी को भी। अपने को प्र्रगतिशील कहने या कहलाने वाली पार्टियां भी अपवाद नहीं रह सकीं और इसका खामियाजा तिवारी जैसे कर्मठ और समाज बदलने के धुन के पक्के कार्यकर्ताओं को निराशा या अवसाद में जाकर चुकानी पड़ती है। भारतीय राजनीति का चरित्रा-चेहरा, चाल और छल-छद्म दिखाई देने लगता है। बदलाव की बात या तो घोषणा पत्रों में होती या भाषणों में। यह तब भी सच था आज भी सच है। यह सचमुच भरोसा और विश्वसनीयता का संकट काल है। संक्रमण का दौर है।
     इस संक्रमण के दौर से गुजरते हैं तो बहुत कुछ दिखाई देता है। एक तो यही कि हमारे विश्वविद्यालय मूर्खों के अड्डों में तब्दील होते जा रहे हैं, जहां रचनात्मकता के लिए कोई स्पेस नहीं बचा है। देश में विश्वविद्यालयों की संख्या कम नहीं। हिंदी विभाग तो होंगे ही। अब उन पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे यहां सबसे अधिक जातिवाद है। नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद आगे हो जाता है और प्रतिभा मंुह ताकती रह जाती है। गुरु-शिष्य परंपरा भी कायम है। यहां रचनाकार नहीं, डिग्रीधारी अध्यापक चाहिए। जिसने चोरी से ही सही, डाक्टरेट किया हो, डी लिट्ट किया है। प्रोन्नति तो उसे ही मिल सकती है। यह महत्वहीन है कि आप रचनाकार हैं, दर्जनों संग्रह छप गए हों, देश की प्रतिष्ठित पत्रा-पत्रिकाओं में छपते रहे हों। इसलिए, हमारे देश के विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में आपकांे रचनाकार कम, तथाकथित विद्वान और डिग्रीधारी खूब मिलेंगे। शोध की तो पूछिए ही मत। पैसा दीजिए शोधग्रंथ लीजिए। विद्या के मंदिर में यह खेल खूब है। और तो और, हिंदी के प्राध्यापक भी यूजीसी से शोध के नाम पर लाखों वसूलते हैं और शोध के नाम पर कूड़ा-करकट एकत्रित करते हैं। हमारे विश्वविद्यालयों का यही हाल है। अपवाद हो सकते हैं। उन्हें आप उंगलियों पर गिन सकते हैं लेकिन विश्वविद्यालों में प्रतिभा का प्रवेश जैसे वर्जित है। मिथिलेश्वर जी ने इस तरह के अपने कई अनुभव साझा किए हैं, जो सिर्फ उनका अनुभव नहीं रह जाता। मिथिलेश्वर जी को जब नौकरी मिली तो उनके कहानियों के कई संग्रह आ चुके थे। सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार उनकी झोली में था। इस बिना पर उनकी नियुक्ति हुई, लेकिन ये अपवाद ही हैं। फिर भी उन्हें कम परेशानी नहीं झेलनी पड़ी। प्रोन्नति के लिए पीएच डी करनी पड़ी। हिंदी के कथित-तथाकथित सेवकों के ताने अलग से। लिखने के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं, इसकी चिढ़ साथी प्राध्यापकों को। जैसे ये कोई बड़ा अपराध कर रहे हों। ऐसे दुर्गंध देते विश्वविद्यालयों में रचनात्मक काम छोड़ हर काम होते हैं, जिससे उसका कोई वास्ता नहीं होना चाहिए। अच्छा, आप किताब कैसे लिख लेते हैं? कैसे समय निकाल लेेते हैं? जैसे पढ़ना-लिखना पाप हो। हम ऐसे ही समाज में रह और जी रहे हैं। एक ठस और बेदम। प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक यही स्थिति है। विश्वविद्यालय ही क्यों, बदबू देते सरकारी अस्पताल भी हैं, जहां इस लेखक को कई तरह के अनुभव से गुजरना पड़ता है। मिथिलेश्वरजी ने ठीक ही लिखा है कि ‘ जीवन की यात्रा किसी सरल रेखा की तरह नहीं होती, हमारे व्यक्तिगत जीवन में उतार-चढ़ाव के साथ-साथ हमारे अनुभव हमें बहुत कुछ समझाते-बताते तथा जमीनी सच्चाइयों से अवगत कराते हैं।’ यहां भी कई तरह के अनुभव और जमीनी सच्चाइयों से वे हमें रूबरू कराते हैं।     
  मिथिलेश्वरजी की यह आत्मकथा दर असल उनका ‘आत्म’ भर नहीं है, यह समाज की, व्यवस्था की, घटती संवेदना और निर्लज्ज राजनीति की भी कथा-व्यथा है, जिसमें हम जी रहे हैं। संास ले रहे हैं। इस कथा को पढ़ते हुए हम उनके ‘आत्म’ और उसके विस्तार को देख सकते हैं। उनकी सादगी, ईमानदारी और लेखन के प्रति उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता और उत्तरदायित्व को समझ सकते हैं, जहां किसी प्रकार के नारे का शोर नहीं है। यहां कोई वाद नहीं, न उसका दावा है। बहुत सादगी के साथ हम उनकी रचना प्रक्रिया को महसूस करते हैं। कहानियों और उसके पात्रों की स्थिति, परिस्थिति और मनःस्थिति को समझ सकते हैं। चरित्रों के बहुलतावादी संसार में विचरण कर सकते हैं, जिसके पास कहने और सुनाने को बहुत कुछ है। यहां गंवई मन के शहरी अनुभव भी हैं। क्योंकि यहां रमेसर बाबा जैसे चरित्रा हैं, जिनके पास लोककथाओं का अनमोल खजाना है। तीव्र वैज्ञानिक विकास के तहत तेजी से बदलती और ग्लोबल होती दुनिया में हमारी लोक कथाएं और लोकगीत बहुत तेजी से गायब हो रही हैं। कहने-सुनने की परंपरा भी खत्म हो रही है। गांवों में लगने वाले चौपाल पर चलने वाली किस्से-कहानियों की जगह राजनीति ने ली है। तब, इन्हें बचाना और भी जरूरी हो जाता है। मिथिलेश्वरजी ने इसके लिए कई खतरे उठाए। जान जोखिम में डाल गांव-गांव जाकर ऐसी लोककथाओं का संकलित किया। रमेसर बाबा हों या पोखरियां गांव का नानी या फिर रसिक बिहारी ओझा निर्भीक से मुलाकात। और इस यात्रा में लहूलुहान एक बूढ़ी माता, जिसे चाहते हुए भी एक संवेनशील रचनाकार नहीं भूल पाता। मिथिलेश्वरजी लिखते हैं, ‘आज मैं आकलन करता हूं तो पाता हूं कि भोजपुरी लोककथाओं की खोज-यात्रा ने मुझे अनेक नई जानकारियां दीं, नए अनुभव से संपन्न बनाया तथा नई रचनात्मकता प्रदान की। अपने परंपरित सृजन से अलग का रचनात्मक सुख मैंने पाया। लेकिन इस सबके बावजूद इस यात्रा ने मुझे एक स्थायी पीड़ा भी दी है। अपने बेटे की मार से अपने दोनों लहूलुहान पैर गुमटी से लटकाकर बैठी उस बूढ़ी माता को मैं चाहते हुए भी भूल नहीं पाता हूं...।’ इस पुस्तक में इस तरह के कई अनमोल और संवेदित करने वाले अनुभव हैं। सातवें अध्याय में इसकी विस्तार से कहानी कही गई और इस कहानी में एक पात्रा और है जो छाया की तरह उनके साथ हैं, वह हैं कृष्ण कुमार। 277 पेज के इस रचनात्मक यात्रा में वे अदृश्य नहीं है। सदेह यहां हाजिर हैं। पत्नी रेणु और बेटियां तो है हीं।
 16-17 सालों से मिथिलेश्वर जी को जान, समझ और पढ़ रहा हूं। उनकी सादगी, सज्जनता और सरलता उनकी भाषा में भी दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में भी एक ताजगी मिलती है और उनकी आत्मकथाएं भी किसी रचना की तरह ही आस्वाद देती हैं। इस आत्मकथा का पढ़ते हुए यह नहीं लगता है कि हम किसी रचनाकार को पढ़ रहे हैं, बल्कि एहसास यह तारी होता है कि हम अपने समाज को देख-पढ़-सुन रहे हैं। हमारी आंखों के सामने एक आईना है, जिसमें हम खुद दिखाई दे रहे हैं और हमारा समाज भी। कहीं कोई रंग-रोगन नहीं; जैसा है वैसा ही। लथपथ भी, लहूलुहान भी, लौकिक भी, अलौकिक भी, भौतिक भी, अभौतिक भी, सुंदर भी-असंुदर भी। गंध भी दुर्गंध भी। आप बीती के साथ जग बीती भी।
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लमही से साभार
पुस्तक: ‘जाग चेत कुछ करौ उपाई’ आत्मकथात्मक उपन्यास
लेखक: मिथिलेश्वर
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
कीमत: 295 पेपरबैक। पेज: 277

अकेले पड़ते किसान की त्रासद गाथा

  भारतीय किसानों की व्यथा-कथा किसी से छिपी नहीं है। पिछले तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार को किसानों से जोड़ कर देखा जा रहा है। किसान चाहे उत्तर के हों, पश्चिम के हों, दक्षिण के हों, विदर्भ के हों, बुंदेलखंड के हों, सबकी समस्याएं एक सी हैं। इनके लिए सरकारी योजनाओं, फसल बीमा, सिंचाई के साधन, डोभा निर्माण सबका एक ही उद्देश्य है- नौकरशाही की जेब भरना। इनका किसानों की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं। राजधानियों मंे बैठकर नौकरशाह योजनाएं बनाते हैं। बनाते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनकी जेब में माल कितना जाएगा! बड़ी-बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की पड़ताल करेंगे तो पता चल जाएगा। अपने झारखंड में तो यही हाल है। 1974 से चल रही योजनाएं आज तक पूरी नहीं हुईं। जो योजनाएं उस समय 43 करोड़ की थीं, अब वह एक हजार करोड़ से उ$पर जा पहंुची हैं, लेकिन वह भी पूरी हो जाएं, इसमें कतई संदेह है। आज किसान कई तरह की समस्याओं से घिरा है। इसमें सिंचाई के लिए पानी तो है ही। बीज भी है। बीज कंपनियां इतनी प्रभावी हैं कि सरकार चाहे जिसकी हो, चलती उनकी की है। इसलिए, पिसता किसान की है।
 
  सरकारों का किसानों की चिंता करना कोई नहीं बात नहीं है। हर सरकार इसका दिखावा करती आ रही है। आजादी से पहले भी किसानों के कई आंदोलन हो चुके हैं। अवध का किसान आंदोलन सबको याद है। पंजाब से लेकर अब के झारखंड का इतिहास पलट सकते हैं। नक्सलबाड़ी आंदोलन दरअसल, किसान विद्रोह ही था। अलग-अलग समस्याओं को लेकर किसान हमेशा से आंदोलनरत रहे हैं। इन आंदोलनों पर लिखा भी जाता रहा है। पर, आज अन्नदाता कई तरह के मकड़जाल के साथ विकास का दंश भी झेल रहा है। जमीन सिकुड़ती जा रही है। आबादी बढ़ती जा रही है और नई पीढ़ी किसानी करना नहीं चाहती। गांव शहर की ओर भाग रहा है। शहरों में गांव समा रहा है। मिथिलेश्वरजी का नया उपन्यास ‘तेरा संगी कोई नहीं’ इसी अंतर्द्वंद्व को सामने रखता है। किसानों का दुख, दर्द, संताप और अपनी जमीन के प्रति चाह और लगाव अब चिंता का सबब बनता जा रहा है। जिनका गांव से वास्ता रहा है, वे इसे पढ़ते हुए महसूस कर सकते हैं कि मिथिलेश्वर जी बलहारी गांव की कथा नहीं, उनके अपने गांव की कथा सुना रहे हैं। मिथिलेश्वरजी की लिखने की जो शैली है, वह सुनाने की है। वह सुनाने में सिद्धहस्त हैं। इसलिए, पाठक पढ़ता नहीं, सुनता है और सुनने में उसे समय का ध्यान नहीं रहता, उसमें डूबता चला जाता है। इस डूब में कई बार उसकी आंखें नम होती हैं और उसके सामने गांव का पूरा दृश्य सामने उपस्थित हो जाता है। गांव के टोले, लहलहाते खेत, बाग-बगीचे, सिवान, खलिहान, गांव से बाहर का मंदिर, मंदिर का पुजारी, उसकी लुच्चई, गांव की राजनीति, गांवों की आपसी प्रतिद्वंदिता...। कोई ऐसा पक्ष नहीं, जिसका वर्णन न किया हो, खेत की मेड़ से उठता लोकगीत...खेतवा घूमे रे किसनवा...झूमे खेतवा में धनवा कभी उत्साह जगाता है, कभी दर्द बनकर उभरता है।   यह कथा बलहारी गांव की नहीं है। ‘बत्तीस बिगहवा’ के मालिक बलेसर की नहीं, उनके तीन पुत्रों की भी नहीं, यह उन सबकी कथा है, जो गांव में रहना चाहते हैं, पूर्वजों की जमीन बेचना नहीं, हर हाल में बचाना चाहते हैं, लेकिन नई पीढ़ी चाहती है कि अब गांव में रहा ही क्या, खेती-किसानी में पहले जैसी बात नहीं रही। अब महंगा हो गया है। समस्याएं बढ़ गई हैं। अब बनिहार भी नहीं मिलते। तो फिर क्यों खेती-किसानी की जाए? 
  पिछले 70 सालों में हमने विकास का ऐसा मॉडल विकसित कर लिया है कि नई पीढ़ी अब खेती करना नहीं चाहती। जबकि अन्न सबको चाहिए। अन्न के बिना कोई जीवित नहीं रह सकता। फिर हमारी सरकारों ने ऐसा वातावरण क्यों नहीं बनाया कि शहर का विकास भी हो, हम आधुनिक भी बनें, लेकिन किसानी भी ऐसा हो, कि नई पीढ़ी इससे दूर न भागे, दिल से अपनाएं। पर हमारी सरकारों और नौकरशाहों ने नकलची की तरह विदेशी मॉडल तो अपना लिया, यह सोचे-विचारे बिना कि यह अपने देश के अनुकूल है भी या नहीं। हम जब कहते हैं, भारत गांवों का देश है, जय-जवान-जय किसान का नारा बुलंद करते हैं तो उसमें किसानों के लिए कितनी सम्मानजनक जगह बची है? आज हमारी सरकारें किसानों की चिंता नहीं करतीं, चिंता करने का दिखावा करती हैं। इसलिए, हमारी पीढ़ी किसानी से भाग रही है। आइए, थोड़ा पीछे चलें। एक दो नहीं, चार शताब्दी पहले। देखें कि मुगल काल का एक सितारा अकबर किसानों के बारे में क्या सोचता था?
   अकबर के काल में ‘अमलगुजार’ होता था। यह एक प्रकार का विशेेष अधिकारी था। इसकी पोजीशन आजकल के कलेक्टर या डीसी के समान थी। राष्ट की रीढ़ उस समय किसान ही माने जाते थे। यद्यपि सम्मान का स्थान सबके लिए था। पर, भोजन-वस्त्रा के दाता तो कृषक ही हैं। यह बात अकबर को पता थी। इसलिए उसने किसानों के साथ बड़ी रियायतें की थीं और खेती की उन्नति के लिए सब प्रकार की सुविधाएं दी थीं, इतना ही नहीं, अमलगुजारों को ऐसी हिदायतें दी थीं, जो विशेषकर किसानों के लाभ की थीं। अमलगुजार के कर्तव्य तो बहुत थे, पर प्रमुख था वह यह है- ‘अमलगुजार को चाहिए कि वह कृषक मित्रा हो। सत्य भाषण और परिश्रमशीलता उसके आचरण के नियम हों। वह अपने को सर्वरक्षक सम्राट का प्रतिनिधि माने...वह ऐसी कोशिश करे कि हर जिंस की उत्तम पैदा हो और उसकी वृद्धि के लिए दस्तूर के अनुसार जमा यानी ‘कर’ ली जाती हो, उसमें कुछ कमी कर दे। यदि कृषक अपनी प्रतिज्ञा से कम खेती करे और उसका कारण बाह्यरूप से सत्य दिखे, तो भी उसे स्वीकार करे। किसी गांव में बंजर भूमि न पड़ी रहे। यदि कृषक में अधिक कृषि करने का बल हो तो, तो दूसरे गांव की भूमि उसमें बढ़ा दे।’ इस तरह अकबर ने अपनी एक कृषि नीति तय रखी थी जो किसानों के पक्ष में थी। अकबर को लगता रहा कि किसान खुश रहेंगे तो देश भी खुशहाल रहेगा और देश पर राज करने वाला राजा भी। यह अकबर को बोध था, लेकिन आज के हमारे ‘सम्राटों’ या हुक्मरानों को नहीं।
 
  आज किसान जीवन-मरण से जूझ रहा है। वह आत्महत्या कर रहा है, लेकिन हमारे शासकों के दिल तनिक भी नहीं पसीज रहे। दक्षिण से किसान चलकर दिल्ली राजपथ पर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहे। महिलाएं नदी जल में आंदोलन करती रहीं, पर हुआ क्या? गांधी ने चंपारण के किसानों की लड़ाई लड़ी, वह सफल रहे। हम पिछले साल चंपारण का शताब्दी वर्ष मनाएं। अभी गांधी की 150 वीं जयंती मना रहे हैं लेकिन गांधी के विचार, उनके 26 रचनात्मक कार्यक्रम पर कोई चर्चा नहीं। हम गांधी जयंती के नाम पर ढकोसला कर रहे हैं। गांधीवादी भी इसमें पीछे नहीं। सचमुच, आज गांधी होते तो वे अपने आंदोलन में असफल ही रहते। उन्हें बोध होता कि ये हमारे अपने जो शासक हैं, वह तो अंग्रेजों से ज्यादा क्रूर, अमानवीय, हिंसक और रक्तपिपासु हैं। इनकी चमड़ी इतनी मोटी हो चुकी है कि कुछ फर्क नहीं पड़ता। आज और कल में यही अंतर है। इसलिए, जब किसान आत्महत्या करता है, तो ये तनिक भी संवेदित नहीं होते। 
  यही कारण है कि ‘तेरा संगी कोई नहीं’ का किसान बलेसर भी क्रूर व्यवस्था, अंधविकास और विडंबना का शिकार अपने ही लहलहाते खेत में मृत पाया जाता है। किसान के लिए यह एक त्रासद स्थिति है। बलेसर के तीन बेटे, तीनों पढ़-लिखकर नौकरी पा जाते हैं। वे पिता पर दबाव बनाते हैं कि वह अपना खेत बेच दें और शहर में आकर बस जाएं। गांव में कुछ रहा नहीं। खेती पहले जैसी रही नहीं। पर, बलेसर अपने पूर्वजों की धाती को बेचना नहीं, बचाकर रखना चाहते हैं। यह ऐसी थाती, जो उनके पूर्वजों को पालती आई थी, उन्हें भी पाल रही थी, लेकिन बेटों को लग चुकी शहरी हवा, जिसके पर्याप्त कारण और उनके अपने तर्क थे और उनके तर्कों के आगे बलेसर बेजार नजर आ रहे थे। इन सबके बीच कई तरह की घटनाएं घटती हैं। बलेसर की पत्नी लकवा की शिकार होकर शहर में बेटों के पास चली जाती हैं, बेटे इलाज कराते हैं और पिता को समझाते हैं कि गांव में कुछ रखा नहीं। पिता, शहर से गांव आते हैं, लहलहाती फसल को कटवाने का समय भी हो गया था। घर में वे अकेले रात गुजारते हैं, लेकिन आंखों में नींद आते ही तरह-तरह के भयावह सपने घेर लेते हैं-‘सारे जीवन की कमाई का सौदा इस तरह चुटकियों में कैसे कर दें? बचपन से जिस खेती-किसानी के बीच जीते आये, उसे वार्धक्य में पहुंचकर अपने जीवन से कैसे निकाल दें?...बलेसर देखते हैं कि उनका खेत बिक गया, उनकी जमीन पर किसी दूसरे का टैक्टर चल रहा है....वे चिल्लाते हैं...रोको...रोको टैक्टर...। बलेसर की आंख खुल जाती है। वे घबड़ा उठते हैं। वे सहज नहीं हो पाते। अतीत की यादें सामने भयावह रूप में आकर खड़ी हो जाती हैं...देर तक वे असहज और असामान्य बने रहे। फिर कुछ देर बाद उनकी पलकें पुनः बंद होनी शुरू हुईं...। वे चेतन से कब अचेतन में चले गए, कुछ पता ही नहीं चला...। बलेसर का शहर में मकान बन गया। बेटों ने अपने-अपने हिस्से में रहने लगे और बलेसर और उनकी पत्नी एक कमरे में सिमट गए, न कोई बोलने वाला, न हाल-चाल लेने वाला...गांव की उन्हें बेतरह याद आती है। गांव में उनके बत्तीस बिगहवा में राइस मिल लग गया है, वे पागलों की तरह चिल्लाने लगते हैं, हटाओ इस राइस मिल को, खाली करो मेरी जमीन! बलेसर की आंख खुल गई और वे चिल्लाते हुए हांफते जा रहे थे। वर्तमान का बोध हुआ तो उन्होंने चिल्लाना बंद कर दिया। लेकिन हांफना-कांपना जारी रहा। अतीत की घटनाएं तो थी हीं, लग रहा था कि भविष्य भी घट रहा है। वे बिस्तरे से उतरे, आंगन में आए लेकिन बेचैनी कम नहीं हो रही थी। सांस लेने में भी कठिनाई हो रही थी। अंदर का दरवाजा खोला, वे तेजी से बाहर की ओर निकल भागे....सुबह....। यह हमारे देश के किसान का त्रासद सच है। वह चाहता है, अपने पूर्वजों की खेती बचाकर रखे, लेकिन हमारी व्यवस्था किसान को यह मौका नहीं देना चाहती। यह उपन्यास इसी तरह के सवालों को निरंकुश शासन के सामने रखती है कि आखिर, उस विकास का क्या मतलब कि हमारे गांव बेचिरागी हो जाएं? गांव बचे रहेंगे तो देश भी बचा रहेगा, क्योंकि भारत शहरों का देश नहीं, गांवों का देश है। श्रीअरविंद ने इसे समझा था। सरकार को अपने विकास के मॉडल पर चिंतन करना चाहिए। किसान प्रकृति की धुरी है। धरती का स्वामी है। सृष्टि तभी चलती रहेगी, जब किसान खुशहाल होगा और ब्रह्मांड में हमारी धरती की इतनी खूबसूरत है कि वह हर तरह के जीवों को पाल सकती है, इसलिए, हम धरती को मां कहते हैं और किसान को अन्नदाता। ऐसे विकास की हमें कतई जरूरत नहीं, जिसने हमारी धरती को बर्बाद कर दिया है। आज हमारी नदियां प्रदूषित को चुकी हैं। हवाओं में जहर भर गया है। यह ऐसा विकास है, जो बर्बादी और बीमारी दे रहा है। फिर भी हम ठहकर नहीं सोच पा रहे हैं। आखिर क्यों? इस त्रासद समय में किसानों का कोई साथी क्यों नहीं? 
  मिथिलेश्वरजी एक सार्थक और रचनात्मक हस्तक्षेप करते हुए वे किसानों के साथ खड़े होते हैं। उपन्यास के नायक का ‘अंत’ दरअसल, अंत नहीं आरंभ का संकेत देता है, संभलों, नहीं तो देर हो जाएगी। इस ‘अंत’ से ही ‘आरंभ’ करो। जिनके पास खेत-बघार रहा हो, या है, वे माटी के मोल को समझ सकते हैं। मिट्टी के साथ उनका संबंध क्या होता है, यह वही जान सकते हैं। पर, हम चाहते हैं कि आज की पीढ़ी अपनी जड़ों से उखड़ जाए। तब, हम जैसा चाहे, वैसा उन्हें बना सकते हैं। जड़ से उखड़े हुए लोग ‘बाजार’ के लिए काफी मुफीद होते हैं। बेशक, किसान का अंत दुखद है, लेकिन कहीं से तो आरंभ करनी होगी। गांव-किसान के दुख-दर्द को उपन्यासकार बहुत नजदीक से देखते आ रहा है। उनकी तीन खंड में आत्मकथा में भी गांव-जवार और खेत-खलिहान के प्रमाणिक चित्रा उभरे हैं। इसलिए किसानी समस्या की एक-एक बारीकी यहां उभर पाई है। वैसे तो रेणु की ‘परती परिकथा’ से लेकर संजीव की ‘फांस’ तक किसानों की कथा कही जाती रही है, लेकिन यह कथा दूसरे धरातल पर खड़ी है और कुछ जरूरी समस्याओं की ओर इंगित करती है। यहां अपनी धरती को बचाने की जद्दोजहद है। बाकी तो आप खुद पढ़िए और गुनिए। 

अनहद  में यह समीक्षा छप चुकी है। साभार
 


कृति-तेरा संगी कोई नहीं
लेखक-मिथिलेश्वर
लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद

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दुर्गाबाटी में दी जाती थी बलि, होती तांत्रिक विधि से पूजा

रांची में दुर्गापूजा की शुरुआत रातू राज घराने से हुई। कहा जाता कै कि 1870 में दुर्गा पूजा यहां प्रारंभ हुई। रांची का यह प्रथम दुर्गोत्सव था। रातू किले के मुख्य द्वार से थोड़ा हटकर यहां मां का मंदिर है। किले के भीतर बलि स्थान भी है। यह राजा का उत्सव था। राजा का मंदिर था। लेकिन आम जनों ने इसके 13 साल बाद श्री श्री हरिसभा और दुर्गाबाटी संस्था स्थापित हुई और 1883 में दुर्गापूजा प्रारंभ हुई। इसका आरंभ जिला स्कूल के संस्कृत शिक्षक पंडित गंगा चरण बागीश ने कुछ धर्म परायण व्यक्तियों के साथ मिलकर इसका आयोजन किया। आज जो दुर्गाबाटी का भव्य रूप दिखता है, पहले खपरैल का था और यहीं पूजा शुरू हुई। इस बाटी की कुछ खास परंपरा रहीं। जब से पूजा प्रारंभ हुई, तब से वीरभूम के मूर्तिकार ही एकचाला प्रतिमा बनाते हैं। पं बंगाल के वीरभूम जिले देवेंद्र नाथ सूत्रधार इसके पहले मूर्तिकार थे। आज भी उनके वंशज की प्रतिमा गढ़ते हैं। एक दूसरी खास बात यह है कि यहां प्रतिमा का निर्माण भी पूरे-विधान से शुरू होकर पूर्ण होता है। जन्माष्टमी के दिन प्रतिमा का निर्माण कार्य प्रारंभ होता है। रांची के इतिहास पर रोशनी डालने वाले डॉ रामरंजन सेन बताते हैं कि पहले यहां महिलाओं का प्रवेश केवल नवमी की रात आठ से नौ बजे तक होता था। सिर्फ एक घंटे ही मां का दर्शन कर सकती थीं और उस समय मंदिर से पुरुष बाहर निकल जाते थे। बाद में इसका भी विरोध शुरू हुआ। आखिर मातृशक्ति मां का दर्शन केवल एक घंटे ही क्यों करेगी? इसके बाद 1921 में महिलाओं का अबाध प्रवेश का द्वार खुल गया। अब मां का शृंगार भी महिलाएं ही करती हैं। सिंदूरखेला के साथ मां को विदा करती हैं।

बलि प्रथा का था प्रचलन
बंगाली परंपरा के अनुसार पूरे विधि-विधान के साथ यहां पूजा होती थी। प्रारंभ में यहां तांत्रिक विधि से पूजा होती थी। तंत्र विधान के अनुसार ही यहां बलि प्रदान किया जाता था। बलिदान के बाद बकरे के खून का टीका लगाकर कुछ भक्त नृत्य भी करते थे। बाद में कुछ लोगों ने इस प्रथा का विरोध किया और बंद कर दिया गया। डॉ पूर्ण चंद्र मित्र इस प्रथा के कट्टर विरोधी रहे। डॉ रामरंजन सेन बताते हैं कि ऐसी प्रथा को बंद करवाने के लिए उन्होंने लोगों को अपना अभिमत लिखकर दिया और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित किया कि वे इसका विरोध करें। इसके बाद 1927 में इस कुप्रथा को बंद कर दिया गया। इसी साल मंदिर का निर्माण भी किया गया। इसके बाद यहां एक प्रेक्षागृह भी बना।
 लगता था पांच दिनों का मेला
पहले दुर्गाबाटी के सामने, आज जहां शास्त्री मार्केट है, मेला लगता था। तब खाली मैदान हुआ करता था। 1926 में मेले में आए दुकानदारों से शुल्क भी लिया जाने लगा। पांच दिनों तक मेला चलता था। तरह-तरह के झूले, बाजार। मेले में लोगों की भीड़ उमड़ती थी। छोटा शहर था, लेकिन दुर्गोत्सव में लोग आस-पास के गांवों से भी आते थे। आज भी लोग दूर-दराज के गांवों से लोग आते हैं। बाद में भीड़ बढ़ी तो मेला बंद कर दिया और आगे चलकर यहां एक स्थायी मार्केट बन गया। जो अब शास्त्री मार्केट के नाम से जाना जाता है।
विजया सम्मेलन का आयोजन
सन् 1926 से दुर्गा पूजा के बाद यहां विजया सम्मेलन का भी आयोजन होने लगा।  पूजा के बाद किसी एक तारीख संध्या आयोजन होता है। बंग समाज मिलता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन होता है। यहां महालया से ही से पूजा का माहौल शुरू हो जाता है। महालया पर महिषासुरमर्दिनी नाटक का मंचन किया जाता है। काफी संख्या में लोग इस आयोजन को देखने आते हैं। दुर्गाबाटी का पूरा प्रेक्षागृह दर्शकों से भर जाता है।

रांची की कुछ और दुर्गा पूजा समितियां
एजी आफिस के कर्मचारियों ने 1912 में डोरंडा दुर्गा पूजा की शुरुआत की। इसके अगले साल 1913 में हिनू दुर्गापूजा कमेटी का गठन किया गया। 1936 में लालपुर, बर्धमान कंपाउंड में कमेटी का गठन कर पूजा शुरू की गई। आजादी के बाद 1954 में देशप्रिय क्लब का गठन कर यहां भी दुर्गा पूजा शुरू की गई। आज रांची में सौ से ऊपर दुर्गा पूजा समितियां हैं, जो लाखों खर्च कर पंडाल का निर्माण करती हैं। लोग दूर-दूर से पंडालों को देखने आते हैं। लेकिन दुर्गाबाटी का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। यहां मां की विदाई भी कंधे पर दी जाती है। सभी श्रद्धालु मां को कंधे पर लेकर लाइन टैंक तालाब में विसर्जित करते हैं। मां की विदाई दशमी को ही होती है।

फादर कामिल बुल्के: कुछ यादें कुछ बातें

डा. दिनेश्वर प्रसाद
यूं तो फादर कामिल बुल्के के साथ मिलते रहने के अनेक अवसर आए, लेकिन इनमें से कुछ मेरे स्मृति पटल पर विशेष रूप से अंकित हो गए हैं। मुझे उनसे मिलाने तत्कालीन उडिय़ा विभागाध्यक्ष और मेरे बंधु कृष्णचरण साहु आए थे। मैंने वहां एक शुक्रवार का जो दृश्य देखा वह एक विद्वान के जीवन का न होकर एक परोपकारी मानव सेवी का था। बाद में पता चला कि हर शुक्रवार को वहां यही देखने को मिलता है। शहर और बाहर के अनेकानेक लोग अपनी-अपनी पारिवारिक समस्याएं लेकर आते हैं और उनसे समाधान चाहते हैं। कई समस्याएं तो नितांत गोपनीय होती थीं। यही नहीं रविवार उनके साथ मिलने का सबसे मुक्त दिवस होता था। दोपहर के कुछ देर बाद दो-ढाई बजे के आस-पास उनके परिचित-अपरिचित उनसे मिलने आते थे और फादर बड़ी-बड़ी प्लेटों में मक्खन और पाव रोटी फिर काफी के प्याले उनके जलपान के लिए लाते थे। फादर अक्सर काफी खुद बनाते थे। काफी की मात्रा एक व्यक्ति की काफी पूरे बॉल में उसे दी जाती थी और वह बहुत रुचिपूर्वक उनके साथ बातचीत करते हुए उसका आनंद उठाता था। फादर से बातचीत करने के अनेक विषय होते थे। समान्यत: पारिवारिक, वैदुषिक और सामाजिक। लेकिन किसी-किसी दिन जब अतिथि शीघ्र चले जाते और सांझ होने लगती तो फादर संस्मरणशील हो जाते। उन्हें अपना अतीत याद होने लगता और वे कभी बचपन के दिनों की घटनाएं, माता की परोपकारिता, पिता का चारित्रिक दृढ़ता, मित्र बंधुओं के साथ उल्लासपूर्ण बातचीत आदि के प्रसंग सुनाते। एक-दो अवसर ऐसे भी आए जब वह मां के स्नेह के प्रसंग सुनाते-सुनाते रोने लगते थे।
किंतु सप्ताह शुक्रवार से ही नहीं बनता। रविवार के दिन और कभी-कभी शुक्रवार को काफी लेने के बाद वे अपनी साइकिल से भ्रमण के लिए निकल पड़ते ओर तीस-चालीस किमी की यात्रा कर अंधेरा होते-होते मनरेसा हाउस लौट जाते। एक समय था जब रविवार को उन्हें प्रार्थनालय में प्रवचन देने को कहा जाता। बाहरी तौर पर जो व्यक्ति प्रसन्न भाव और अनौपचारिक दिखाई देता था, वह कितना परिश्रमी और अनुशासनप्रिय है, इसका बोध भी मुझे कई बार हुआ। कई दिन उन्होंने मुझे कहा, आज अमुक कार्य पूरा करना है। हमलोग फिर मिलेंगे। बाद के दिनों में जब मैंने उनके सहयोगी के रूप में कई प्रकार के कार्य किए तो मैंने पाया कि वह कितना कठोर परिश्रम करते हैं। उनका योरोपीय मानस सुनिश्चितता से घटकर कुछ भी नहीं स्वीकार करता। बाइबिल के अनुवाद के रूप में सुनिश्चित अभिव्यक्ति, कोश निर्माण की अवधि में सुनिश्चित पर्याय के संधान की उनकी साधना उन सब लोगों के लिए अनुकरणीय है, जो वैदुषिक क्षेत्र में टिकने योग्य कुछ करना चाहते हैं।
फादर कामिल बुल्के के साथ जुड़े हुए ढेर सारे प्रसंग हैं। उनके स्वभाव की उदारता और विनोदप्रियता के ढेर सारे अवसर ...मैं यह जानता हूं कि जो यह कर रहा हूं वह अतीत-व्यतीत हो चुका है। आज भी मेरी आंखों की राह पर कभी-कभी वे चलते हुए दिखाई देते हैं। मैं देख रहा हूं-फादर साइकिल लेकर नगर के अपने मित्रों के यहां चल पड़े हैं। कहां चल पड़े हैं-क्या राधाकृष्ण जी के यहां? क्या अपने किसी शिष्य से मिलने, जो अचानक बीमार पड़ गया है?
-डा. प्रसाद फादर कामिल बुल्के के निकट सहयोगी रहे हैं। फादर के निधन के बाद उनके कई अधूरे कामों को पूरा किया। अब दिवंगत।

मंचीय कविता कभी खत्म नहीं होगी

सवाल: अशोक जी, बहुत से लोगों की शिकायत है कि साहित्य हाशिए पर जा रहा है। इस दूसरा पहलू यह भी देखने को मिल रहा है कि अखबारों के पाठक बढ़ रहे हैं। ऐसे में इन दोनों स्थितियों के बीच कविता के लिए कहां जगह बनती है?
जवाब :  कविता के लिए जगह अपने आप बनती है। इसे बनाया नहीं जाता है। साहित्य की अन्य विधाओं की जगह संकीर्ण हो सकती है, कविता के लिए नहीं। इस बात का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि कविता हर युुग में समाज का भला करती रही है। इसलिए ऐसी कविता आनी चाहिए, जिसकी सोच व्यापक हो, जिसके पास भविष्य का नक्शा हो। समय पर ठोस प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की जाए तो लोग कायर समझने लगते हैं। अब परिदृश्य बदल चुका है। कविता निम्न वर्ग के लोगों के प्रति सहानुभूति खो रही है। यह कविता के लिए चिंता की बात है।
-इधर, हिंदी साहित्य में भूमंडलीकरण की चर्चा खूब चल रही है। कई लेखक इसे देश के लिए अच्छा नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि इससे अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ेगा। आप इससे कहां तक सहमत हैं?
अशोक : भाषा किसी सड़े तालाब का जल नहीं है। यह निरंतर बहती रहती है। जब हिंदी में उर्दू के शब्द मिश्रित हो गए तब आप इसे हिंदी उर्दू तो नहीं कहते। अंग्रेजी भी हमारे व्यवहारिक जीवन में आ रही है। यह रोजगार दिला रही है। भाषा से नफरत करना छोड़ देना चाहिए। अंग्रेजी से नफरत करने के दिन लद गए।
सवाल:  एक चर्चा चलती है कि साहित्य में मंचीय कविता ने हिंदी का स्तर गिराया आपका क्या विचार है?
जवाब:  कविता मंचीय और वाचिक होती है। यह पठनीय कम होती है। आप पढ़कर उसके  प्रतिबिंब पर मुग्ध भले हो सक ते हैं। तन्मय होकर झूमना और  झूमाना जो कविता का मूल धर्म है, उससे अलग हो जाते हैं। यही कारण है कि जब नई कविता आंदोलन हुआ तो शताब्दियों से चले आ रहे उन सिद्धांतों को खत्म कर दिया गया, जो कविता को श्रवणीय और मंचीय बनाते थे। बीसवीं शताब्दी में यह कविता लोगों से अलग होने लगी। कविता में आधुनिकता के नाम पर शिल्प की बंदिशें खत्म हो गईं। एक नई राहों के अन्वेषी कहकर अज्ञेय ने जो पथ चला दिया उससे मंचीय कविता का बड़ा नुकसान हुआ। बच्चन, गुप्त, निराला, अंचल, जिन्होंने कविता में जनतत्व के प्राण रखे, वही धारा अब मंच की धारा बन गई है। इन लोगों ने उसमें हास्य को जोड़ा जो जनता को अच्छा लगा। आज की तारीख में वहां निर्मल सहज हास्य के स्थान पर चुहलबाजी आ गई है। हास्य करो तो निर्मल हास्य करो, व्यंग्य करो तो करुणा से उत्पन्न व्यंग्य करो। मंच की कविता कुछ और उम्मीद करती है। आप गाकर सुना रहे हैं तो श्रेष्ठ गायन होना चाहिए। छंद का बेहतर प्रयोग होना चाहिए।
सवाल: नई पीढ़ी छंदबद्ध कविता से भाग रही है। इसके क्या कारण हो सकते  हैं?
जवाब : इसका कारण है कि उन्हें वास्तविक शिक्षा नहीं मिली। उन्हें मात्रा, छंद एवं अन्य चीजों का ज्ञान नहीं है। मंचीय कविता कभी भी खत्म नहीं होगी। यह मैं भविष्यवाणी कर रहा हूं। कविता संक्षेप में वही बात कहती है जो आम जन सोचते हैं। सामाजिक सोच में कहीं खोट हो तो कवि आगाह करता है। वह परिवर्तन चाहता है, इसीलिए उसे समाज का दर्पण या दीपक  भी कहा जाता है। इन दिनों कविता के दर्पण चटके हुए हैं और दीपक बुझे हुए।

आज की कविता और मंच की कविता के बारे में क्या कहना है?
चक्रधर : आज भी कविता लिखी जा रही है। ब्लाग, फेसबुक आदि पर भी कविताएं लिखी जा रही हैं। पत्र-पत्रिकाओं में भी कविताएं लिखी जा रही हैं। बदलते समय में कविता भी बदली है और उसकी भूमिका भी। मंच पर कविताएं कम, लतीफे ज्यादा सुनाए जा रहे हैं। पहले लतीफा संचालक सुनाया करता था। अब कवि सुनाने लगे हैं। इससे गंभीर व व्यंग्यपरक कविताओं के लिए मंच पर जगह कम हुई है।
सवाल: कौन सी किताबें आने वाली हैं?
चक्रधर : नारी के सवाल-अनाड़ी के जवाब आने वाला है। कपिल सिब्बल की कविताओं का हिंदी में अनुवाद पेंग्विन से आ रहा है। इसके अलावे भी एक और संग्रह जल्द ही पाठकों को मिलेगा।
कवि अशोक चक्रधर से संजय कृष्ण की एक पुरानी बातचीत

16 वीं शताब्दी का नवरतन गढ़ किला

 रांची से दक्षिण-पश्चिम में 40 मील दूर डोयसा नगर अब एक गांव की शक्ल ले चुका है। गुमला जिले के सिसई थाने का यह गांव कभी नागवंशियों की राजधानी थी। पर, आज उपेक्षा का दंश झेलते-झेलते खंडहर में तब्दील हो चुका है। यह सिर्फ नवरतन गढ़ किले की मार्मिक कहानी नहीं है। राज्य में फैले अनेक किले अपनी इस दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। पलामू के चेरो राजाओं का किला हो या फिर कोई ऐतिहासिक मंदिर। राज्य न इनके रख-रखाव को लेकर गंभीर रहा है न इन स्थलों को पर्यटन स्थल विकसित करने को ले गंभीर। यह अलग बात है कि सैकड़ों सालों से ये प्रकृति के थपेड़ों को सहते आज भी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
नवरतन गढ़ का किला भी इनमें से एक है। करीब एक सौ एकड़ में फैला यह किला नागवंशियों द्वारा मुगल स्थापत्य का पहला राजमहल माना जाता है। अपने अनूठे मौलिक सौंदर्य व स्थापत्य कला के कारण खास पहचान बनाने वाले इस राजमहल का निर्माण 16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजा दुर्जन शाल ने कराया था। दुर्जन शाल ग्वालियर के किले में 12 साल तक बंद था। बंदी का कारण लगान नहीं देना था। इब्राहिम खान 1615 में बंदी बनाया था। बाद में हीरे का पारखी होने के कारण तत्कालीन इब्राहिम खान ने दुर्जन को 1627 में आजाद कर दिया। तब नागवंशी राजा की राजधानी खुखरा में थी। इब्राहिम खान ने दुर्जन के साथ एक ऐसे व्यक्ति को भी लगा दिया, जो आर्किटेक था। इसके पहले नागवंशी राजा अपनी प्रजा के साथ घुल-मिलकर रहते थे। प्रजा से थोड़ा बड़ा इनका आवास होता था। महलों की कल्पना झारखंड में नहीं थी। दुर्जन शाल को उस आर्टिटेक ने ही मुगल सम्राटों के महलों के जैसे एक महल निर्माण का सुझाव दिया। दुर्जन ग्वालियर में महलों की शानोशौकत देख चुके थे। सो, वह मान गए। महल निर्माण के लिए उन्होंने एक नए स्थान का चयन किया। डोयसा नामक गांव में किले की नींव रखी गई। इस तरह वहां नवरतन गढ़ नामक किले का निर्माण किया गया। सौ एकड़ से ऊपर फैले इस किले को झारखंड का हंपी कहा जाता है।
बदलती रही है राजधानी
नागवंशियों की राजधानी हमेशा बदलती रही है। नागवंशी देश का एकमात्र ऐसा राजवंश है, जिसकी पीढिय़ां आज भी जीवित हैं। इनका इतिहास प्रथम शताब्दी से शुरू होता है। इनके पहले राजा थे फणिमुकुट राय। चौथे राजा मदन राय तक राजधानी सुतियांबे में रही, किंतु पांचवें राजा प्रताप राय ने अपनी राजधानी सन् 307 में चुटिया ले गए। 29 वें राजा भीमकर्ण ने 1079 में खुखरा को राजधानी बनाया। 45 वें राजा दुर्जनशाल ने अपनी राजधानी डोयसागढ़ में बनाई। 1514 में यहां महाराज देवशाह, जो 48 वें राजा थे, ने एक गढ़ का निर्माण कराया, जिसे नवरतन गढ़ कहा गया। इसका निर्माण 1585 में हुआ। पुन: नवरतन गढ़ को छोड़कर 51 वें राजा यदुनाथ शाह को 1707 में पालकोट आना पड़ा। रातू उनकी अंतिम राजधानी है। यह गढ़ पांच मंजिला है। और प्रत्येक मंजिल पर नौ कमरे हैं। गढ़ के चारों ओर मंदिर थे। एक मंदिर में सुरंग थी जो गढ़ तक जाती थी। राज्य म्यूजियम के अध्यक्ष डा. सरफुद्दीन कहते हैं कि पांच मंजिल इस किले का एक मंजिल अंदर धंस गया है। इसलिए ऊपर चार मंजिल की दिखाई पड़ता है। किले के चारो ओर सुरक्षाकर्मियों के कोटर बने हुए हैं। रानी के रहने के लिए अलग किला है। उनके नहाने के लिए तालाब भी है। किले से तालाब तक एक सुरंग भी है। वे कहते हैं, इस किले को वल्र्ड हेरिटेज में शामिल करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। वहीं रांची विवि के मानवविज्ञानी डा. बीएन सहाय गांव में इस किले को देख अचंभित हैं। कहते हैं, इसकी देखभाल ही नहीं, इसका पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए। यह राज्य ही नहीं, देश की धरोहर है। चूना-सुर्खी और लाहौरी ईंटों से बना यह किला मुगल काल के स्थापत्य को भी दर्शाता है। 

सच से रूबरू कराती 'कैसा सचÓ

नारी मुक्ति का सवाल पिछले दो दशकों से साहित्य के केंद्र में है। स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व को लेकर संघर्ष बहुत पुराना है। स्त्री की पराधीनता की बातें बहुत पहले से होती आई हैं। पहले जो दबी-दबी सी आवाज सुनाई देती थीं, उसने अब मुखरता हासिल कर ली है। कभी-कभी स्त्री मुक्ति की बातों के पीछे देह मुक्ति का सवाल छिपा रहता है। देह मुक्ति ही नारी मुक्ति का पर्याय भी बन जाता है। तमाम शोर-शराबे के बावजूद इस विज्ञापनी दुनियां में नारी मुक्ति के नाम पर वह और जकड़ती जा रही है। कुछ नारीवादी लेखिकाएं नारी मुक्ति के नाम पर शोर ज्यादा मचाती हैं तो कुछ अपने को स्थापित करने के लिए काफी अपने को खोलकर और खुलकर लिखने में विश्वास करती हैं। पर, आशा प्रभात का पहला कहानी संग्रह इस तरह के आग्रहों (दुराग्रहों) से सर्वथा मुक्त है। यहां नारी मुक्ति के सवाल तीखे ढंग से उठाए गए हैं, लेकिन कबीर की भाषा में नहीं, तुलसी की भाषा में। पढ़ते समय दिखाई तो चिंगारी की तरह पड़ता है पर मन के भीतर शोले का एहसास पैदा करता है। कुल नौ कहानियों के इस संग्रह में आखिरकार नारी ही केंद्र में है। उसके सपने और उसकी आकांक्षा है। मुक्ति की छटपटाहट है तो दहलीज के दलदल से निकल अपना रास्ता तलाशने का सुकून भी। बाढ़ की विभिषिका में भी स्त्री का संघर्ष बहुत सादगी और संजीदगी से एक सर्वथा नए दृष्टिकोण के साथ उभरता है।  
संग्रह की पहली कहानी 'एक्वैरियमÓ हमारे समाज की पतनशीलता पर टिप्पणी करती है, जहां पुरुष के लिए स्त्री महज देह होती है। लेखिका की मान्यता है कि 'महान से महान पुरुष पहले मात्र एक पुरुष होता है बाकी सब भ्रम?Ó आधुनिक समाज की आधुनिकता में पुरुष वहीं खड़ा हैं, जहां हजारों साल पहले था। उसके लिए रिश्ते बेमानी हो जाते हैं। कहानी की नायिका श्वेता अपने पिता के दोस्त के यहां छुट्टियां मनाने गई है, लेकिन एक दिन '...बिस्तर पर वे थे, पापा के विश्वास...मेरी आस्था और उनकी इमेज की धज्जियां उड़ रही थीं। लगा, इस पल वे मात्र पुरुष थे और उनके लिए मैं एक स्त्री...। देवदूत के चेहरे पर शैतान का चेहरा उग आया था।Ó
'पेट प्रलयÓ बागमती नदी के बाढ़ की विभीषिका के साथ हमारे विकास की अवधारणा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कहानी, रेणु के रिपोर्ताज कुत्ते की आवाज की याद दिलाती है। बिहार के कई इलाके बाढ़ के विनाश से हलकान होते रहे हैं। बागमती अपने साथ प्रलय लेकर आती है। एक ओर बाढ़ का भीषण बहाव तो दूसरी ओर भूख से आकुल पेट। भैरोकाका भूख को बर्दाश्त नहीं कर पाते और भरी जवानी में अपने बच्चों को छोड़ चले जाते हैं। किस्मत ऐसी कि उन्हें उस बाढ़ में उन्हीं की धोती में बांधकर प्रवाहित कर दिया जाता है। कफन, लकड़ी और चिता भी नसीब नहीं। अत्यंत कारुणिक दृश्य। निहारती हुई पत्नी की पथराई आंखें...बहुत कुछ कह जाती हैं।
'इसे भ्रम ही रहने दोÓ कहानी एक ही समय के दो चेहरे को रेखांकित करती है। दो रिक्शा दो चरित्र। एक का वसूल सही भाड़ा लेने में तो दूसरे का विश्वास अधिक से अधिक भाड़ा वसूल करने में। ऐसे चरित्र हम अपने आस-पास फैले समाज में देख सकते हैं। ऐसे लोगों पर प्राय: कहानियां नहीं लिखी जातीं। लेखिका ने इस उपेक्षित प्राणी पर कलम चलाकर अपनी संवेदना का विस्तार किया है।
'सलाखों के पीछेÓ में हम देखते हैं कि परिवर्तन और क्रांति बहुत आहिस्ता-आहिस्ता भी होते हंै। बिना किसी शोर-शराबे के। बदलाव की यह आहट सुनाई नहीं देती, लेकिन इसका चुप्पा शोर बहुत परेशान करता है। बारह वर्ष के दांपत्य, घर-गृहस्थी, समाज और संस्कारों में सिमटे, सांस लेते, व्यस्तताओं को चक्के की तरह पैरों में बांध घूमती रहने वाली पति की बेवफाई बर्दाश्त नहीं कर पाती। पति डा. महेश बत्रा का जब कामुकता और अपने पंद्रह साल छोटी लड़की के दैहिक आकर्षण में फंसते हैं तो वह बर्दाश्त कर लेती है। लेकिन जब वह मातृत्व पर भी डाका डालती है तो अचला बर्दाश्त नहीं कर पाती। तीन-तीन बच्चों की मां अचला अपने पति को उसी की भाषा में जवाब देती है। जब वह अपने पति से कहती है, बधाई हो, मैं मां बनने वाली हूं। डा. बत्रा का कर्ज वह ब्याज समेत लौटा देती है। सचमुच 'क्या इतना अपरिपक्व होता है मनुष्य, जो हमेशा अपने से छोटी, अपरिपक्व, कच्ची उम्र की औरत की कामना करता है।Ó प्रश्न फिर वही। क्या मनुष्य के लिए स्त्री मात्र देह है?  
हालांकि इन कहानियों में स्त्री मात्र देह नहीं है। उसका हर रूप यहां दर्ज है। 'हौसलाÓ कहानी भले ही एक बेरोजगार युवक की कहानी है, जो बाद में एक मंदिर के सामने पूजा-मिष्ठान की दुकान खोल लेता है। पर, कहानी में एक स्त्री की संवेदना को बखूबी उभारा गया है। प्रतियोगिता की तैयारी के समय एक परिवार से उसकी निकटता बढ़ती है। उसे नौकरी नहीं मिलती तो वह एक तीर्थ स्थल पर जाकर दुकान खोल लेता है। अचानक वह दंपति दर्शन करने जाता है तो उसकी मुलाकात वहां होती है। '...नाहक परेशान रहे आप लोग। मैं इतना बुजदिल हीं कि संघर्षों से हार कर खुदकुशी कर लेता।Ó
अत्यंत रोचक व नाटकीय कहानी है 'वह दिन।Ó छोटी है पर मजेदार। पटना पुस्तक मेले से शाम को लौटते हुए एक महिला को नाहक एक आदमी मिल जाता है। कि मैं सचिवालय में काम करता हूं, कि मैं आपको जानता हूं, कि आइए चाय पी लीजिए न कि मुझे भी उधर ही चलना है? कि रिक्शे पर साथ बैठ जाता है। किसी महिला को कोई अपरिचित आदमी मिल जाए तो क्या कर सकती है? नायिका उस दिन को वह नहीं भूल पाती। 
'आदम और हव्वाÓ। सिद्धार्थ और शिप्रा। प्रेम की चाहत। पर, सिद्धार्थ, जीनियस नहीं खोखला साबित होता है। प्रेम विश्वास की मांग करता है। सिद्धार्थ के पास यही नहीं था। इस कहानी में आज का सच व्यंजित है।
'अपने-पराएÓ की पहचान मुसीबत में होती है। यह कहानी घर-घर की है। मां को जब फाजिल मार देते है तो बेटी भागी-भागी अपनी मां को देखने पहुंचती है लेकिन बेटे और बहू के लिए बीमारी बोझ बन जाती है। ऐसे चरित्र हमारे समाज में अब बढ़ते जा रहे हैं। परिवार का मतलब पत्नी तक सीमित हो गया है। जहां मां-बाप के लिए वृद्धाश्रमों में ही जगह बचा है। जहां वे घर पर हैं, उनकी फिक्र किसे? पर, कहानी एकतरफा निर्णय नहीं सुनाती। यह विषय 'कैसा सचÓ में और विस्तार पाती है।
इस कहानी में भी लेखिका ने एक मां के संघर्ष को दिखाया है। पति की बीमारी में जमीन का बिकना। फिर, मृत्यु। जवान होती बेटी के ब्याह की चिंता अलग से। ऐसे में मां के सामने क्या विकल्प? कहां से लड़का ढूंढे? पेट की विकलता यह सोचने पर मजबूर करती कि, '...पैसा वाला, भले ही लड़का दुहाजू या दो तीन बच्चे का बाप की क्यों न हो?Ó क्या कोई मां इस स्तर पर जा सकती है कि वह अपने बेटी की ब्याह दो-तीन बच्चे के पिता से कर दे? गरीबी को वह बर्दाश्त नहीं कर पाती। ऐसे में तो और नहीं, जहां नवेली बहुओं को आधा पेट खाना दिया जाता हो, ताकि वह दिन में दिशा के लिए न जा सके। पर, एक रिश्ता आ जाता है और बेटी अपनी मां को मना ही लेती है। बेटी कहती है 'शहर के घर में पैखाना तो होता है मां!Ó शादी तो हो जाती है। दामाद दिल्ली में कमाता है। एक दिन सूचना मिलती है कि मां आ रही है। अब बेटी कैसे बताए कि शौचालच के लिए बाहर जाना पड़ता है। आखिर, यह कैसा सच था?
'परदादारीÓ कहानी में रेड लाइट एरिया के जरिए स्त्रियों के विभिन्न चरित्रों को संजोया गया है। एक ओर खाते-पीते घरों की महिलाएं एनजीओ के जरिए समाज सेवा का काम करती हैं। तो दूसरी ओर ऐसी भी स्त्रियां हैं जो भूख के लिए जिस्म का सौदा करती है। पर परदादारी वहां भी है।
अंतिम कहानी 'ठेसÓ में स्त्री के विद्रोही तेवर को सशक्त ढंग से उठाया गया है। शादी के एक माह बाद ही ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं कि सोमा तलाक लेने का मन बना लेती है क्योंकि उसका पति सैडिस्ट है, पर उत्पीड़क है, सेक्स के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। सोमा तलाक लेकर एक नई जिंदगी शुरू करती है।
इन कहानियों से गुजरते हुए यह अहसास होता है कि क्रांति आहिस्ते-आहिस्ते भी हो सकता है। शोर-शराबे के बिना। ये कहानियां ऐसी हैं, जैसे हम दूर से समुद्र का सपाटपन देखते हैं, पर नजदीक जाने पर उसकी लहरे दिखाई पड़ती हैं। आशा प्रभात ने ग्रामीण समाज की विसंगतियों, आत्महंता लोक परंपराओं के साथ आदमी की संवेदनहीनता को भी लक्षित किया है। कहीं कहीं गंवई भाषा के जरिए उस समाज से पाठक को जोडऩे की कोशिश करती हैं, पर अधिकांश कहानियां शहरी मध्यवर्ग से जुड़ी हैं। कहानियों की अधिकतर नायिकाएं कुंभ राशि की हैं। लेखिका को ज्योतिष का अच्छा ज्ञान है। यह ठेस कहानी से भी बोध होता है। 
हंस में प्रकाशित

पलामू का ऐतिहासिक किला

बेतला के घने जंगलों के बीच पलामू का ऐतिहासिक किला अपनी बेबसी और उपेक्षा के दंश को झेलता आज भी पूरी शानौ शौकत से खड़ा है। उपेक्षा के बावजूद उसमें एक स्वाभिमान है, जिसे उसके पास जाकर ही महसूस किया जा सकता है। निर्जीव पत्थर भी अपनी कहानी बयां करते हैं, अपने सुख-दुख आने-जाने वालों से साझा करते हैं, इतिहास के बीते तारीखों को वर्तमान में खींच कर ले आते हैं। इसलिए, ये पत्थर महज पत्थर नहीं होते, इनमें भी दर्द होता है। एहसास होता है। पलामू का यह पुराना किला बहुत कुछ कहता है, पर अपने बारे में बहुत कुछ नहीं कहता। इसलिए, इस किले का निर्माण कब हुआ था, किसने कराया था आदि प्रश्न इतिहास के गह्वïर में ही कैद हैं। जिन लोगों ने इस पर से पर्दा उठाने की कोशिश की, वह इतना ही बता सके कि इसका निर्माण 15 वीं शताब्दी के आस-पास हुआ होगा। किसने कराया-ठीक-ठीक पता नहीं।  लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज तथ्यों से कुछ अनुमान लगाया जा सकता है।
पलामू के बारे में ठीक-ठीक इतिहास कुछ नहीं बताता। लेकिन किंवदंतियों और पुराने लोगों की स्मृतियों और यहां के खंडहरों से तथ्य की जो रोशनी छनकर आती है वह यही बताती है कि यहां सबसे पहले कोल जातियों का निवास था। इसके बाद द्रविड़ आए। फिर रकशेल-चेरों का आगमन हुआ। इसी समय मुगलों का भी प्रवेश और इसके बाद अंग्रेज आए। वैसे, यहां का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से होते हुए रामायण और महाभारत से भी जुड़ता है। रामायण काल को लेकर यहां एक कथा प्रचलित है कि यह राजा दशरथ के अधीन था और रामजी के विवाह के अवसर पर उन्होंने से यहां के बजनियों (बाजा बजाने वाले) को बक्सीस में दे दिया था। महाभारत काल के अवशेष तो नहीं मिलते, लेकिन डालटनगंज के उत्तर-पश्चिम में करीब 40 मील पर कोयल नदी के किनारे एक पहाड़ी पर भीम चूल्हा नाम की जगह है। कहते हैं कि पांडवों ने अज्ञातवास में कुछ समय यहां व्यतीत किया था। भीम ने ही उस पहाड़ी पर चूल्हे का निर्माण किया था, इसलिए उसे भीम चूल्हा कहा जाता है। इसके अलावा और कुछ नहीं मिलता, जिससे महाभारत काल पर व्यापक प्रकाश पड़ सके।
पर, कुछ प्राचीन जातियों के बारे में अवश्य जानकारी हासिल होती है। उनमें द्रविड़ कुल के मार्ह और उरांव हैं। उरांवों का संबंध मोहनजोदड़ो सभ्यता से भी है। यहां कर्नाटक की ओर होते हुए इन जातियों ने बिहार के रोहतास में आकर बसे। यहां इनके आगमन की तिथि अज्ञात है। चौदहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पठानों ने रोहतास पर जब वर्चस्व स्थापित कर लिया तो ये पलामू की ओर खिसक आईं। उरांवों के लोकगीतों में इनका पूरा इतिहास दर्ज है। यहां से भी बाद में रांची की ओर प्रस्थान कर गईं और आज उसके समीपवर्ती जिलों में, जंगलों में इनका निवास है।  
मार्ह भी द्रविड़ कुल की ही एक शाखा है। इन लोगों ने जंगलों को काटकर उन्हें कृषि योग्य बनाया, बस्तियां बसाईं, घर और गढ़ों का निर्माण किया। इस तरह वे सारे पलामू में छा गए। उरावों ने रोहतासगढ़ किले का निर्माण किया था। उनके लोकगीतों में 'गढ़रूइदासÓ का बार-बार जिक्र आता है। इनका निवास उरांवों से पुराना है। माना जाता है कि पलामू में इनका प्रवेश दो हजार साल पहले हुआ था। मार्ह आगे चलकर अंग्रेजों के गजेटियरों में 'मारÓ और 'मालÓ हो गया। इनके बनाए गए मकानों, गढ़ों, बस्तियों के खंडहर पलामू में बिखरे हुए हैं। बेतला में घने जंगलों में ओरंगा नदी के निकट बना पलामू किला इन्हीं का निर्माण कहा जाता है। ओरंगा शब्द भी द्रविड़ कुल का ही है। इसके बाद यहां रकेशेल राजपूतों का वर्चस्व स्थापित हुआ और मर्हा भगा दिए गए। रकशेलों का इतिहास बताता है कि इनका दल गया जिले के कुटुंबा-मटपा की राह से, छपरा की ओर गया और कुछ पलामू की उत्तरी-पूरबी सीमा महाराजगंज-हरिहरगंज के मार्ग से होकर पलामू के देवगन और उसके आस-पास फैल गए।
रकशेलों के बारे में रायबहादुर डा. हीरालाल ने 'मध्यप्रदेश का इतिहासÓ में कवि रामचरण भाट की हवाले से बताया है कि रकशेल वंश का आरंभ सन 196 से होता है और इस वंश के वर्तमान राजा रामानुजशरण सिंह तक 114 पीढिय़ों ने राज किया। यह भी कहा गया है कि इस वंश का मूल पुरुष पलामू के कुंडलिया से सन 194 में सरगुजा आया था सने यहां के द्रविड़ मुखिया (राजा) को भगाकर अपना राज्य स्थापित कर लिया। रकशेल राजपूतों की एक शाखा था। यह अर्कशेल का अपभ्रंश है। अर्क यानी सूर्य। इन्हें सूर्यवंशी राजपूत भी कहा जाता है। पलामू में इनका आगमन 13 वीं शताब्दी के आस-पास हुआ माना जाता है। इन्होंने भी गढ़, किले, तालाब, कोट का निर्माण किया। पलामू किले का सुधार और निर्माण रकशेलों ने भी किया। पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में मानसिंह पलामू की गद्दी पर बैठे। उस समय रकशेलों की दो राजधानियां थीं-एक बेतला की ओरंगा नदी का तट पलामू गढ़, मानगढ़, तमोलगढ़, दूसरा पलामू की उत्तरी सीमा के छोर पर चकले देवगन में देवगढ़। पलामू में रकशेलों ने कब तक राज किया, कौन-कौन राजा हुए, इसकी प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। इस वंश के अंतिम राजा मानसिंह का पता इसलिए चलता है कि इन्हीं से चेरो राजा ने पलामू को अपने अधिकार में लिया था।  
चेरो का काल पलामू के लिए स्वर्णकाल था। इनकी उत्पत्ति च्यवन ऋषि से बताई जाती है। इस जाति से सबसे पहले नेपाल की तराई कमाऊं प्रांत में अपना राज्य स्थापित किया। इसके बाद इस वंश ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने राज्य कायम किए। कालांतर में इनके वंश के भगवंत राय और पूरनमल पलामू पहुंचे। जिस समय ये पलामू पहुंचे, उस समय पलामू किले पर राजा मानसिंह का अधिकार था। दोनों ने मानसिंह के दरबार में नौकरी कर ली। दोनों की सूझ-बूझ और बहादुरी से प्रसन्न होकर इन्हें सेना की कमान सौंप दी गई। लेकिन एक विश्वासघात ने पलामू का तकदीर ही नहीं, इतिहास भी बदल गया। हुआ यह कि राजा मान सिंह के पुत्र का विवाह सरगुजा में तय हुआ। वे बारात लेकर सरगुजा चले गए और किले का भार अपने सरदार भगवंत राय पर छोड़ गए। मौका पाक भगवंत राय ने मानसिंह के पूरे परिवार को मार डाला और खुद राजा बन बैठा। सेना लेकर वह आगे बढ़ा और बारात वापस लेकर लौट रहे मान सिंह का मुकाबला किया। मानसिंह हार गए और सरगुजा लौट गए। वहां मान सिंह ने वही किया जो भगवंत ने उनके परिवार के साथ किया। उन्होंने सरगुजा के राजा की हत्या कर राज्य अपने अधीन कर लिया और पूरनमल को अपना मंत्री बना लिया। यहीं से रकशेल राजा का अंत और चेरो राजवंश का उदय होता हैं।
कहा जाता है कि चेरो राजाओं की सात पीढिय़ों (1613 से 1821 तक)ने पलामू पर राज किया। इसके संंंस्थापक थे भगवंत राय और अंतिम राजा हुए चुरामन राय। ये नि:संतान थे। इस कुल में सबसे प्रतापी राजा मेदिनी राय हुए। इन्हीं के नाम पर डालटनगंज का नाम बदलकर मेदिनीनगर किया गया है। इन्हें पलामू के इतिहास पुरुष का गौरव प्राप्त है। इनकी लोकप्रियता इस लोकगीत से पता चलती है-
धन्न-धन्न राजा मेदनियां, घर-घर बजले मथनियां।
अन्नवा से भर गइले खेत-खलिहनवां,

  सांच भइले सबके सपनवां, घर-घर बजले मथनियां।
गइया-भइंसिया से भरले बथनवांइनके कार्यकाल में गाय, बैल और प्रजा सभी खुशहाल थे। 'राजा मेदनियां के राज, न गउए छान, न प्रजा डांड़।Ó मेदिनी राय वीर और साहसी थे। इनके पराक्रम और न्यायप्रियता की दुहाई आज भी दी जाती है। इन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। रांची के निकट छोटानागपुर के नागवंशी राजा के डोइसागढ़ (नवरतनगढ़) पर भी कब्जा किया और उसके किले का नागपुरी दरवाजा निकलवाकर पलामू किले के प्रवेशद्वार पर लगवाया। यह दरवाजा देखभाल के अभाव में अब जीर्ण हो चुका है। इन्होंने ही पुराने पलामू किले की मरम्मत करवाई और उसी से थोड़ी दूर कमलदह नामक झील का निर्माण कराया। इस झील में किले के सुरंग मार्ग से रानी नहाने जाती थीं। यह झील तीन ओर पहाड़ों और एक ओर ओरंगा नदी की तलहटी के बीच है। अब तो यह सिकुड़ गई है। अपने पुत्र के लिए मेदिनी राय ने पुराने किले के पास पहाड़ी पर नए किले का निर्माण कराया। इसकी नींव संवत 1680 माघ कृष्ण पंचमी, बुधवार को रखी गई थी। यह किला रोहतासगढ़ से भी ऊंचा बनाया गया था-ऊंचतिगढ़ पलमुआं हो, नीचहिं गढ़ रूईदास(रोहतास)। पुराने किले के दक्षिण में दस हजारी छावनी थी। इसमें अनेक गुफाएं हैं। यहां चेरो के साथ खरवार भी महत्वपूर्ण जाति थी। इन दोनों के बीच अच्छे संबंध थे।
चेरो राज के संस्थापक भगवंत राय के पोते अनंत राय के शासन काल में औरंगजेब का तत्कालीन बिहार सूबेदार दाऊद खां ने पलामू पर कब्जा कर लिया। लेकिन उसके वापस लौटते ही चेरो राजा ने पुन: अधिकार कर लिया। इस बीच और घटनाएं हुईं। दाऊद खां ने पुन: 3 अप्रैल 1660 को पराजित किया। इस बार उसने किले को ही नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि किले के अंदर मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनवाई। उसी तरह किले के सिंहद्वार पर स्थित मंदिर को भी तोड़कर मस्जिद बनवाई। इसके ध्वंसाशेष आज भी किले के अंदर और बाहर मौजूद हैं। गुंबदों की आकृति को देखकर कोई भी सहज अनुमान ला सकता है। इसके बाद दाऊद ने पलामू का शासन फौजदार खां को सौंप दिया। लेकिन चेरो भी मानने वाले नहीं थे। किले पर पुन: कब्जा कर लिया। राजा भूपल राय (1661-1662) के बाद राजा मेदिनी राय राजा बने। ये चेरोवंश की पांचवीं पीढ़ी में थे। इनके शासन काल में राज्य स्थिर हुआ। विकास की गति तेज हुई। प्रजा खुशहाली के गीत गाने लगी। इन्होंने 13 साल तक राज किया। इसके बाद राज चलता रहा। दसवें राजा थे जयकिशुन राय (1722-1770)। इन्होंने 48 साल तक राज किया। चेरो वंश में सर्वाधिक राज करने वाले यही थे। उनके बाद चित्रजीत राय गद्दी पर बैठे पर, एक साल ही शासन कर पाए। गोपाल राय के भतीजे ने कोयल नदी के किनारे शाहपुर में एक किला बनवाया, जहां वे पलामू को छोड़कर रहने लगा। यहां 12 साल तक शासन किया। 14 वें राजा हुए चुरामन राय। ये नि: संतान थे। इन्होंने 38 साल तक शासन किया, लेकिन वे बिल्कुल अयोग्य थे। शासन की बागडोर दरबारियों के हाथ में ही रहा। यहीं से चेरो वंश अस्त होता है और अंगरेजों का प्रादुर्भाव। 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल-बिहार की दीवानी हासिल की। चेरो परिवार अपने गृह कलह के कारण अपने में ही उलझ गया। कंपनी को हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया। इस तरह पलामू अंगरेजों के अधीन हो गया। इसके एक साल बाद यानी 1766 में पलामू वायसराय के सीधे नियंत्रण में आ गया। इसके बाद 38 सालों तक पलामू उथल-पुथल से मुक्त रहा। लेकिन 1857 आते-आते अंगरेजों के खिलाफ जंगल धधकने लगे। इसकी कहानी फिर कभी। 1 जनवरी 1892 को इसे जिला बनाया गया। इसके सौ साल बाद यानी 3 मई 1992 को इसे प्रमंडल बनाया गया। लेकिन, आज भी पलामू उपेक्षा का दंश झेल रहा है। किले का जीर्णोद्धार आज तक नहीं हुआ, न खुदाई की गई। उपेक्षा के कारण जंगलों ने अपने आगोश में ले लिया। घने जंगलों के बीच किले के बुर्ज से ओरंगा नदी का खूबसूरत नजारा दिखता है। पर, भारतीय पुरातत्व विभाग ने वहां आज तक कोई शिलापट्टï नहीं लगाया, ताकि पर्यटकों को इस ऐतिहासिक किले के बारे में जानकारी मिल सके।