शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2019

फादर कामिल बुल्के: कुछ यादें कुछ बातें

डा. दिनेश्वर प्रसाद
यूं तो फादर कामिल बुल्के के साथ मिलते रहने के अनेक अवसर आए, लेकिन इनमें से कुछ मेरे स्मृति पटल पर विशेष रूप से अंकित हो गए हैं। मुझे उनसे मिलाने तत्कालीन उडिय़ा विभागाध्यक्ष और मेरे बंधु कृष्णचरण साहु आए थे। मैंने वहां एक शुक्रवार का जो दृश्य देखा वह एक विद्वान के जीवन का न होकर एक परोपकारी मानव सेवी का था। बाद में पता चला कि हर शुक्रवार को वहां यही देखने को मिलता है। शहर और बाहर के अनेकानेक लोग अपनी-अपनी पारिवारिक समस्याएं लेकर आते हैं और उनसे समाधान चाहते हैं। कई समस्याएं तो नितांत गोपनीय होती थीं। यही नहीं रविवार उनके साथ मिलने का सबसे मुक्त दिवस होता था। दोपहर के कुछ देर बाद दो-ढाई बजे के आस-पास उनके परिचित-अपरिचित उनसे मिलने आते थे और फादर बड़ी-बड़ी प्लेटों में मक्खन और पाव रोटी फिर काफी के प्याले उनके जलपान के लिए लाते थे। फादर अक्सर काफी खुद बनाते थे। काफी की मात्रा एक व्यक्ति की काफी पूरे बॉल में उसे दी जाती थी और वह बहुत रुचिपूर्वक उनके साथ बातचीत करते हुए उसका आनंद उठाता था। फादर से बातचीत करने के अनेक विषय होते थे। समान्यत: पारिवारिक, वैदुषिक और सामाजिक। लेकिन किसी-किसी दिन जब अतिथि शीघ्र चले जाते और सांझ होने लगती तो फादर संस्मरणशील हो जाते। उन्हें अपना अतीत याद होने लगता और वे कभी बचपन के दिनों की घटनाएं, माता की परोपकारिता, पिता का चारित्रिक दृढ़ता, मित्र बंधुओं के साथ उल्लासपूर्ण बातचीत आदि के प्रसंग सुनाते। एक-दो अवसर ऐसे भी आए जब वह मां के स्नेह के प्रसंग सुनाते-सुनाते रोने लगते थे।
किंतु सप्ताह शुक्रवार से ही नहीं बनता। रविवार के दिन और कभी-कभी शुक्रवार को काफी लेने के बाद वे अपनी साइकिल से भ्रमण के लिए निकल पड़ते ओर तीस-चालीस किमी की यात्रा कर अंधेरा होते-होते मनरेसा हाउस लौट जाते। एक समय था जब रविवार को उन्हें प्रार्थनालय में प्रवचन देने को कहा जाता। बाहरी तौर पर जो व्यक्ति प्रसन्न भाव और अनौपचारिक दिखाई देता था, वह कितना परिश्रमी और अनुशासनप्रिय है, इसका बोध भी मुझे कई बार हुआ। कई दिन उन्होंने मुझे कहा, आज अमुक कार्य पूरा करना है। हमलोग फिर मिलेंगे। बाद के दिनों में जब मैंने उनके सहयोगी के रूप में कई प्रकार के कार्य किए तो मैंने पाया कि वह कितना कठोर परिश्रम करते हैं। उनका योरोपीय मानस सुनिश्चितता से घटकर कुछ भी नहीं स्वीकार करता। बाइबिल के अनुवाद के रूप में सुनिश्चित अभिव्यक्ति, कोश निर्माण की अवधि में सुनिश्चित पर्याय के संधान की उनकी साधना उन सब लोगों के लिए अनुकरणीय है, जो वैदुषिक क्षेत्र में टिकने योग्य कुछ करना चाहते हैं।
फादर कामिल बुल्के के साथ जुड़े हुए ढेर सारे प्रसंग हैं। उनके स्वभाव की उदारता और विनोदप्रियता के ढेर सारे अवसर ...मैं यह जानता हूं कि जो यह कर रहा हूं वह अतीत-व्यतीत हो चुका है। आज भी मेरी आंखों की राह पर कभी-कभी वे चलते हुए दिखाई देते हैं। मैं देख रहा हूं-फादर साइकिल लेकर नगर के अपने मित्रों के यहां चल पड़े हैं। कहां चल पड़े हैं-क्या राधाकृष्ण जी के यहां? क्या अपने किसी शिष्य से मिलने, जो अचानक बीमार पड़ गया है?
-डा. प्रसाद फादर कामिल बुल्के के निकट सहयोगी रहे हैं। फादर के निधन के बाद उनके कई अधूरे कामों को पूरा किया। अब दिवंगत।

मंचीय कविता कभी खत्म नहीं होगी

सवाल: अशोक जी, बहुत से लोगों की शिकायत है कि साहित्य हाशिए पर जा रहा है। इस दूसरा पहलू यह भी देखने को मिल रहा है कि अखबारों के पाठक बढ़ रहे हैं। ऐसे में इन दोनों स्थितियों के बीच कविता के लिए कहां जगह बनती है?
जवाब :  कविता के लिए जगह अपने आप बनती है। इसे बनाया नहीं जाता है। साहित्य की अन्य विधाओं की जगह संकीर्ण हो सकती है, कविता के लिए नहीं। इस बात का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि कविता हर युुग में समाज का भला करती रही है। इसलिए ऐसी कविता आनी चाहिए, जिसकी सोच व्यापक हो, जिसके पास भविष्य का नक्शा हो। समय पर ठोस प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की जाए तो लोग कायर समझने लगते हैं। अब परिदृश्य बदल चुका है। कविता निम्न वर्ग के लोगों के प्रति सहानुभूति खो रही है। यह कविता के लिए चिंता की बात है।
-इधर, हिंदी साहित्य में भूमंडलीकरण की चर्चा खूब चल रही है। कई लेखक इसे देश के लिए अच्छा नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि इससे अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ेगा। आप इससे कहां तक सहमत हैं?
अशोक : भाषा किसी सड़े तालाब का जल नहीं है। यह निरंतर बहती रहती है। जब हिंदी में उर्दू के शब्द मिश्रित हो गए तब आप इसे हिंदी उर्दू तो नहीं कहते। अंग्रेजी भी हमारे व्यवहारिक जीवन में आ रही है। यह रोजगार दिला रही है। भाषा से नफरत करना छोड़ देना चाहिए। अंग्रेजी से नफरत करने के दिन लद गए।
सवाल:  एक चर्चा चलती है कि साहित्य में मंचीय कविता ने हिंदी का स्तर गिराया आपका क्या विचार है?
जवाब:  कविता मंचीय और वाचिक होती है। यह पठनीय कम होती है। आप पढ़कर उसके  प्रतिबिंब पर मुग्ध भले हो सक ते हैं। तन्मय होकर झूमना और  झूमाना जो कविता का मूल धर्म है, उससे अलग हो जाते हैं। यही कारण है कि जब नई कविता आंदोलन हुआ तो शताब्दियों से चले आ रहे उन सिद्धांतों को खत्म कर दिया गया, जो कविता को श्रवणीय और मंचीय बनाते थे। बीसवीं शताब्दी में यह कविता लोगों से अलग होने लगी। कविता में आधुनिकता के नाम पर शिल्प की बंदिशें खत्म हो गईं। एक नई राहों के अन्वेषी कहकर अज्ञेय ने जो पथ चला दिया उससे मंचीय कविता का बड़ा नुकसान हुआ। बच्चन, गुप्त, निराला, अंचल, जिन्होंने कविता में जनतत्व के प्राण रखे, वही धारा अब मंच की धारा बन गई है। इन लोगों ने उसमें हास्य को जोड़ा जो जनता को अच्छा लगा। आज की तारीख में वहां निर्मल सहज हास्य के स्थान पर चुहलबाजी आ गई है। हास्य करो तो निर्मल हास्य करो, व्यंग्य करो तो करुणा से उत्पन्न व्यंग्य करो। मंच की कविता कुछ और उम्मीद करती है। आप गाकर सुना रहे हैं तो श्रेष्ठ गायन होना चाहिए। छंद का बेहतर प्रयोग होना चाहिए।
सवाल: नई पीढ़ी छंदबद्ध कविता से भाग रही है। इसके क्या कारण हो सकते  हैं?
जवाब : इसका कारण है कि उन्हें वास्तविक शिक्षा नहीं मिली। उन्हें मात्रा, छंद एवं अन्य चीजों का ज्ञान नहीं है। मंचीय कविता कभी भी खत्म नहीं होगी। यह मैं भविष्यवाणी कर रहा हूं। कविता संक्षेप में वही बात कहती है जो आम जन सोचते हैं। सामाजिक सोच में कहीं खोट हो तो कवि आगाह करता है। वह परिवर्तन चाहता है, इसीलिए उसे समाज का दर्पण या दीपक  भी कहा जाता है। इन दिनों कविता के दर्पण चटके हुए हैं और दीपक बुझे हुए।

आज की कविता और मंच की कविता के बारे में क्या कहना है?
चक्रधर : आज भी कविता लिखी जा रही है। ब्लाग, फेसबुक आदि पर भी कविताएं लिखी जा रही हैं। पत्र-पत्रिकाओं में भी कविताएं लिखी जा रही हैं। बदलते समय में कविता भी बदली है और उसकी भूमिका भी। मंच पर कविताएं कम, लतीफे ज्यादा सुनाए जा रहे हैं। पहले लतीफा संचालक सुनाया करता था। अब कवि सुनाने लगे हैं। इससे गंभीर व व्यंग्यपरक कविताओं के लिए मंच पर जगह कम हुई है।
सवाल: कौन सी किताबें आने वाली हैं?
चक्रधर : नारी के सवाल-अनाड़ी के जवाब आने वाला है। कपिल सिब्बल की कविताओं का हिंदी में अनुवाद पेंग्विन से आ रहा है। इसके अलावे भी एक और संग्रह जल्द ही पाठकों को मिलेगा।
कवि अशोक चक्रधर से संजय कृष्ण की एक पुरानी बातचीत

16 वीं शताब्दी का नवरतन गढ़ किला

 रांची से दक्षिण-पश्चिम में 40 मील दूर डोयसा नगर अब एक गांव की शक्ल ले चुका है। गुमला जिले के सिसई थाने का यह गांव कभी नागवंशियों की राजधानी थी। पर, आज उपेक्षा का दंश झेलते-झेलते खंडहर में तब्दील हो चुका है। यह सिर्फ नवरतन गढ़ किले की मार्मिक कहानी नहीं है। राज्य में फैले अनेक किले अपनी इस दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। पलामू के चेरो राजाओं का किला हो या फिर कोई ऐतिहासिक मंदिर। राज्य न इनके रख-रखाव को लेकर गंभीर रहा है न इन स्थलों को पर्यटन स्थल विकसित करने को ले गंभीर। यह अलग बात है कि सैकड़ों सालों से ये प्रकृति के थपेड़ों को सहते आज भी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
नवरतन गढ़ का किला भी इनमें से एक है। करीब एक सौ एकड़ में फैला यह किला नागवंशियों द्वारा मुगल स्थापत्य का पहला राजमहल माना जाता है। अपने अनूठे मौलिक सौंदर्य व स्थापत्य कला के कारण खास पहचान बनाने वाले इस राजमहल का निर्माण 16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजा दुर्जन शाल ने कराया था। दुर्जन शाल ग्वालियर के किले में 12 साल तक बंद था। बंदी का कारण लगान नहीं देना था। इब्राहिम खान 1615 में बंदी बनाया था। बाद में हीरे का पारखी होने के कारण तत्कालीन इब्राहिम खान ने दुर्जन को 1627 में आजाद कर दिया। तब नागवंशी राजा की राजधानी खुखरा में थी। इब्राहिम खान ने दुर्जन के साथ एक ऐसे व्यक्ति को भी लगा दिया, जो आर्किटेक था। इसके पहले नागवंशी राजा अपनी प्रजा के साथ घुल-मिलकर रहते थे। प्रजा से थोड़ा बड़ा इनका आवास होता था। महलों की कल्पना झारखंड में नहीं थी। दुर्जन शाल को उस आर्टिटेक ने ही मुगल सम्राटों के महलों के जैसे एक महल निर्माण का सुझाव दिया। दुर्जन ग्वालियर में महलों की शानोशौकत देख चुके थे। सो, वह मान गए। महल निर्माण के लिए उन्होंने एक नए स्थान का चयन किया। डोयसा नामक गांव में किले की नींव रखी गई। इस तरह वहां नवरतन गढ़ नामक किले का निर्माण किया गया। सौ एकड़ से ऊपर फैले इस किले को झारखंड का हंपी कहा जाता है।
बदलती रही है राजधानी
नागवंशियों की राजधानी हमेशा बदलती रही है। नागवंशी देश का एकमात्र ऐसा राजवंश है, जिसकी पीढिय़ां आज भी जीवित हैं। इनका इतिहास प्रथम शताब्दी से शुरू होता है। इनके पहले राजा थे फणिमुकुट राय। चौथे राजा मदन राय तक राजधानी सुतियांबे में रही, किंतु पांचवें राजा प्रताप राय ने अपनी राजधानी सन् 307 में चुटिया ले गए। 29 वें राजा भीमकर्ण ने 1079 में खुखरा को राजधानी बनाया। 45 वें राजा दुर्जनशाल ने अपनी राजधानी डोयसागढ़ में बनाई। 1514 में यहां महाराज देवशाह, जो 48 वें राजा थे, ने एक गढ़ का निर्माण कराया, जिसे नवरतन गढ़ कहा गया। इसका निर्माण 1585 में हुआ। पुन: नवरतन गढ़ को छोड़कर 51 वें राजा यदुनाथ शाह को 1707 में पालकोट आना पड़ा। रातू उनकी अंतिम राजधानी है। यह गढ़ पांच मंजिला है। और प्रत्येक मंजिल पर नौ कमरे हैं। गढ़ के चारों ओर मंदिर थे। एक मंदिर में सुरंग थी जो गढ़ तक जाती थी। राज्य म्यूजियम के अध्यक्ष डा. सरफुद्दीन कहते हैं कि पांच मंजिल इस किले का एक मंजिल अंदर धंस गया है। इसलिए ऊपर चार मंजिल की दिखाई पड़ता है। किले के चारो ओर सुरक्षाकर्मियों के कोटर बने हुए हैं। रानी के रहने के लिए अलग किला है। उनके नहाने के लिए तालाब भी है। किले से तालाब तक एक सुरंग भी है। वे कहते हैं, इस किले को वल्र्ड हेरिटेज में शामिल करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। वहीं रांची विवि के मानवविज्ञानी डा. बीएन सहाय गांव में इस किले को देख अचंभित हैं। कहते हैं, इसकी देखभाल ही नहीं, इसका पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए। यह राज्य ही नहीं, देश की धरोहर है। चूना-सुर्खी और लाहौरी ईंटों से बना यह किला मुगल काल के स्थापत्य को भी दर्शाता है। 

सच से रूबरू कराती 'कैसा सचÓ

नारी मुक्ति का सवाल पिछले दो दशकों से साहित्य के केंद्र में है। स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व को लेकर संघर्ष बहुत पुराना है। स्त्री की पराधीनता की बातें बहुत पहले से होती आई हैं। पहले जो दबी-दबी सी आवाज सुनाई देती थीं, उसने अब मुखरता हासिल कर ली है। कभी-कभी स्त्री मुक्ति की बातों के पीछे देह मुक्ति का सवाल छिपा रहता है। देह मुक्ति ही नारी मुक्ति का पर्याय भी बन जाता है। तमाम शोर-शराबे के बावजूद इस विज्ञापनी दुनियां में नारी मुक्ति के नाम पर वह और जकड़ती जा रही है। कुछ नारीवादी लेखिकाएं नारी मुक्ति के नाम पर शोर ज्यादा मचाती हैं तो कुछ अपने को स्थापित करने के लिए काफी अपने को खोलकर और खुलकर लिखने में विश्वास करती हैं। पर, आशा प्रभात का पहला कहानी संग्रह इस तरह के आग्रहों (दुराग्रहों) से सर्वथा मुक्त है। यहां नारी मुक्ति के सवाल तीखे ढंग से उठाए गए हैं, लेकिन कबीर की भाषा में नहीं, तुलसी की भाषा में। पढ़ते समय दिखाई तो चिंगारी की तरह पड़ता है पर मन के भीतर शोले का एहसास पैदा करता है। कुल नौ कहानियों के इस संग्रह में आखिरकार नारी ही केंद्र में है। उसके सपने और उसकी आकांक्षा है। मुक्ति की छटपटाहट है तो दहलीज के दलदल से निकल अपना रास्ता तलाशने का सुकून भी। बाढ़ की विभिषिका में भी स्त्री का संघर्ष बहुत सादगी और संजीदगी से एक सर्वथा नए दृष्टिकोण के साथ उभरता है।  
संग्रह की पहली कहानी 'एक्वैरियमÓ हमारे समाज की पतनशीलता पर टिप्पणी करती है, जहां पुरुष के लिए स्त्री महज देह होती है। लेखिका की मान्यता है कि 'महान से महान पुरुष पहले मात्र एक पुरुष होता है बाकी सब भ्रम?Ó आधुनिक समाज की आधुनिकता में पुरुष वहीं खड़ा हैं, जहां हजारों साल पहले था। उसके लिए रिश्ते बेमानी हो जाते हैं। कहानी की नायिका श्वेता अपने पिता के दोस्त के यहां छुट्टियां मनाने गई है, लेकिन एक दिन '...बिस्तर पर वे थे, पापा के विश्वास...मेरी आस्था और उनकी इमेज की धज्जियां उड़ रही थीं। लगा, इस पल वे मात्र पुरुष थे और उनके लिए मैं एक स्त्री...। देवदूत के चेहरे पर शैतान का चेहरा उग आया था।Ó
'पेट प्रलयÓ बागमती नदी के बाढ़ की विभीषिका के साथ हमारे विकास की अवधारणा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कहानी, रेणु के रिपोर्ताज कुत्ते की आवाज की याद दिलाती है। बिहार के कई इलाके बाढ़ के विनाश से हलकान होते रहे हैं। बागमती अपने साथ प्रलय लेकर आती है। एक ओर बाढ़ का भीषण बहाव तो दूसरी ओर भूख से आकुल पेट। भैरोकाका भूख को बर्दाश्त नहीं कर पाते और भरी जवानी में अपने बच्चों को छोड़ चले जाते हैं। किस्मत ऐसी कि उन्हें उस बाढ़ में उन्हीं की धोती में बांधकर प्रवाहित कर दिया जाता है। कफन, लकड़ी और चिता भी नसीब नहीं। अत्यंत कारुणिक दृश्य। निहारती हुई पत्नी की पथराई आंखें...बहुत कुछ कह जाती हैं।
'इसे भ्रम ही रहने दोÓ कहानी एक ही समय के दो चेहरे को रेखांकित करती है। दो रिक्शा दो चरित्र। एक का वसूल सही भाड़ा लेने में तो दूसरे का विश्वास अधिक से अधिक भाड़ा वसूल करने में। ऐसे चरित्र हम अपने आस-पास फैले समाज में देख सकते हैं। ऐसे लोगों पर प्राय: कहानियां नहीं लिखी जातीं। लेखिका ने इस उपेक्षित प्राणी पर कलम चलाकर अपनी संवेदना का विस्तार किया है।
'सलाखों के पीछेÓ में हम देखते हैं कि परिवर्तन और क्रांति बहुत आहिस्ता-आहिस्ता भी होते हंै। बिना किसी शोर-शराबे के। बदलाव की यह आहट सुनाई नहीं देती, लेकिन इसका चुप्पा शोर बहुत परेशान करता है। बारह वर्ष के दांपत्य, घर-गृहस्थी, समाज और संस्कारों में सिमटे, सांस लेते, व्यस्तताओं को चक्के की तरह पैरों में बांध घूमती रहने वाली पति की बेवफाई बर्दाश्त नहीं कर पाती। पति डा. महेश बत्रा का जब कामुकता और अपने पंद्रह साल छोटी लड़की के दैहिक आकर्षण में फंसते हैं तो वह बर्दाश्त कर लेती है। लेकिन जब वह मातृत्व पर भी डाका डालती है तो अचला बर्दाश्त नहीं कर पाती। तीन-तीन बच्चों की मां अचला अपने पति को उसी की भाषा में जवाब देती है। जब वह अपने पति से कहती है, बधाई हो, मैं मां बनने वाली हूं। डा. बत्रा का कर्ज वह ब्याज समेत लौटा देती है। सचमुच 'क्या इतना अपरिपक्व होता है मनुष्य, जो हमेशा अपने से छोटी, अपरिपक्व, कच्ची उम्र की औरत की कामना करता है।Ó प्रश्न फिर वही। क्या मनुष्य के लिए स्त्री मात्र देह है?  
हालांकि इन कहानियों में स्त्री मात्र देह नहीं है। उसका हर रूप यहां दर्ज है। 'हौसलाÓ कहानी भले ही एक बेरोजगार युवक की कहानी है, जो बाद में एक मंदिर के सामने पूजा-मिष्ठान की दुकान खोल लेता है। पर, कहानी में एक स्त्री की संवेदना को बखूबी उभारा गया है। प्रतियोगिता की तैयारी के समय एक परिवार से उसकी निकटता बढ़ती है। उसे नौकरी नहीं मिलती तो वह एक तीर्थ स्थल पर जाकर दुकान खोल लेता है। अचानक वह दंपति दर्शन करने जाता है तो उसकी मुलाकात वहां होती है। '...नाहक परेशान रहे आप लोग। मैं इतना बुजदिल हीं कि संघर्षों से हार कर खुदकुशी कर लेता।Ó
अत्यंत रोचक व नाटकीय कहानी है 'वह दिन।Ó छोटी है पर मजेदार। पटना पुस्तक मेले से शाम को लौटते हुए एक महिला को नाहक एक आदमी मिल जाता है। कि मैं सचिवालय में काम करता हूं, कि मैं आपको जानता हूं, कि आइए चाय पी लीजिए न कि मुझे भी उधर ही चलना है? कि रिक्शे पर साथ बैठ जाता है। किसी महिला को कोई अपरिचित आदमी मिल जाए तो क्या कर सकती है? नायिका उस दिन को वह नहीं भूल पाती। 
'आदम और हव्वाÓ। सिद्धार्थ और शिप्रा। प्रेम की चाहत। पर, सिद्धार्थ, जीनियस नहीं खोखला साबित होता है। प्रेम विश्वास की मांग करता है। सिद्धार्थ के पास यही नहीं था। इस कहानी में आज का सच व्यंजित है।
'अपने-पराएÓ की पहचान मुसीबत में होती है। यह कहानी घर-घर की है। मां को जब फाजिल मार देते है तो बेटी भागी-भागी अपनी मां को देखने पहुंचती है लेकिन बेटे और बहू के लिए बीमारी बोझ बन जाती है। ऐसे चरित्र हमारे समाज में अब बढ़ते जा रहे हैं। परिवार का मतलब पत्नी तक सीमित हो गया है। जहां मां-बाप के लिए वृद्धाश्रमों में ही जगह बचा है। जहां वे घर पर हैं, उनकी फिक्र किसे? पर, कहानी एकतरफा निर्णय नहीं सुनाती। यह विषय 'कैसा सचÓ में और विस्तार पाती है।
इस कहानी में भी लेखिका ने एक मां के संघर्ष को दिखाया है। पति की बीमारी में जमीन का बिकना। फिर, मृत्यु। जवान होती बेटी के ब्याह की चिंता अलग से। ऐसे में मां के सामने क्या विकल्प? कहां से लड़का ढूंढे? पेट की विकलता यह सोचने पर मजबूर करती कि, '...पैसा वाला, भले ही लड़का दुहाजू या दो तीन बच्चे का बाप की क्यों न हो?Ó क्या कोई मां इस स्तर पर जा सकती है कि वह अपने बेटी की ब्याह दो-तीन बच्चे के पिता से कर दे? गरीबी को वह बर्दाश्त नहीं कर पाती। ऐसे में तो और नहीं, जहां नवेली बहुओं को आधा पेट खाना दिया जाता हो, ताकि वह दिन में दिशा के लिए न जा सके। पर, एक रिश्ता आ जाता है और बेटी अपनी मां को मना ही लेती है। बेटी कहती है 'शहर के घर में पैखाना तो होता है मां!Ó शादी तो हो जाती है। दामाद दिल्ली में कमाता है। एक दिन सूचना मिलती है कि मां आ रही है। अब बेटी कैसे बताए कि शौचालच के लिए बाहर जाना पड़ता है। आखिर, यह कैसा सच था?
'परदादारीÓ कहानी में रेड लाइट एरिया के जरिए स्त्रियों के विभिन्न चरित्रों को संजोया गया है। एक ओर खाते-पीते घरों की महिलाएं एनजीओ के जरिए समाज सेवा का काम करती हैं। तो दूसरी ओर ऐसी भी स्त्रियां हैं जो भूख के लिए जिस्म का सौदा करती है। पर परदादारी वहां भी है।
अंतिम कहानी 'ठेसÓ में स्त्री के विद्रोही तेवर को सशक्त ढंग से उठाया गया है। शादी के एक माह बाद ही ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं कि सोमा तलाक लेने का मन बना लेती है क्योंकि उसका पति सैडिस्ट है, पर उत्पीड़क है, सेक्स के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। सोमा तलाक लेकर एक नई जिंदगी शुरू करती है।
इन कहानियों से गुजरते हुए यह अहसास होता है कि क्रांति आहिस्ते-आहिस्ते भी हो सकता है। शोर-शराबे के बिना। ये कहानियां ऐसी हैं, जैसे हम दूर से समुद्र का सपाटपन देखते हैं, पर नजदीक जाने पर उसकी लहरे दिखाई पड़ती हैं। आशा प्रभात ने ग्रामीण समाज की विसंगतियों, आत्महंता लोक परंपराओं के साथ आदमी की संवेदनहीनता को भी लक्षित किया है। कहीं कहीं गंवई भाषा के जरिए उस समाज से पाठक को जोडऩे की कोशिश करती हैं, पर अधिकांश कहानियां शहरी मध्यवर्ग से जुड़ी हैं। कहानियों की अधिकतर नायिकाएं कुंभ राशि की हैं। लेखिका को ज्योतिष का अच्छा ज्ञान है। यह ठेस कहानी से भी बोध होता है। 
हंस में प्रकाशित

पलामू का ऐतिहासिक किला

बेतला के घने जंगलों के बीच पलामू का ऐतिहासिक किला अपनी बेबसी और उपेक्षा के दंश को झेलता आज भी पूरी शानौ शौकत से खड़ा है। उपेक्षा के बावजूद उसमें एक स्वाभिमान है, जिसे उसके पास जाकर ही महसूस किया जा सकता है। निर्जीव पत्थर भी अपनी कहानी बयां करते हैं, अपने सुख-दुख आने-जाने वालों से साझा करते हैं, इतिहास के बीते तारीखों को वर्तमान में खींच कर ले आते हैं। इसलिए, ये पत्थर महज पत्थर नहीं होते, इनमें भी दर्द होता है। एहसास होता है। पलामू का यह पुराना किला बहुत कुछ कहता है, पर अपने बारे में बहुत कुछ नहीं कहता। इसलिए, इस किले का निर्माण कब हुआ था, किसने कराया था आदि प्रश्न इतिहास के गह्वïर में ही कैद हैं। जिन लोगों ने इस पर से पर्दा उठाने की कोशिश की, वह इतना ही बता सके कि इसका निर्माण 15 वीं शताब्दी के आस-पास हुआ होगा। किसने कराया-ठीक-ठीक पता नहीं।  लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज तथ्यों से कुछ अनुमान लगाया जा सकता है।
पलामू के बारे में ठीक-ठीक इतिहास कुछ नहीं बताता। लेकिन किंवदंतियों और पुराने लोगों की स्मृतियों और यहां के खंडहरों से तथ्य की जो रोशनी छनकर आती है वह यही बताती है कि यहां सबसे पहले कोल जातियों का निवास था। इसके बाद द्रविड़ आए। फिर रकशेल-चेरों का आगमन हुआ। इसी समय मुगलों का भी प्रवेश और इसके बाद अंग्रेज आए। वैसे, यहां का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से होते हुए रामायण और महाभारत से भी जुड़ता है। रामायण काल को लेकर यहां एक कथा प्रचलित है कि यह राजा दशरथ के अधीन था और रामजी के विवाह के अवसर पर उन्होंने से यहां के बजनियों (बाजा बजाने वाले) को बक्सीस में दे दिया था। महाभारत काल के अवशेष तो नहीं मिलते, लेकिन डालटनगंज के उत्तर-पश्चिम में करीब 40 मील पर कोयल नदी के किनारे एक पहाड़ी पर भीम चूल्हा नाम की जगह है। कहते हैं कि पांडवों ने अज्ञातवास में कुछ समय यहां व्यतीत किया था। भीम ने ही उस पहाड़ी पर चूल्हे का निर्माण किया था, इसलिए उसे भीम चूल्हा कहा जाता है। इसके अलावा और कुछ नहीं मिलता, जिससे महाभारत काल पर व्यापक प्रकाश पड़ सके।
पर, कुछ प्राचीन जातियों के बारे में अवश्य जानकारी हासिल होती है। उनमें द्रविड़ कुल के मार्ह और उरांव हैं। उरांवों का संबंध मोहनजोदड़ो सभ्यता से भी है। यहां कर्नाटक की ओर होते हुए इन जातियों ने बिहार के रोहतास में आकर बसे। यहां इनके आगमन की तिथि अज्ञात है। चौदहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पठानों ने रोहतास पर जब वर्चस्व स्थापित कर लिया तो ये पलामू की ओर खिसक आईं। उरांवों के लोकगीतों में इनका पूरा इतिहास दर्ज है। यहां से भी बाद में रांची की ओर प्रस्थान कर गईं और आज उसके समीपवर्ती जिलों में, जंगलों में इनका निवास है।  
मार्ह भी द्रविड़ कुल की ही एक शाखा है। इन लोगों ने जंगलों को काटकर उन्हें कृषि योग्य बनाया, बस्तियां बसाईं, घर और गढ़ों का निर्माण किया। इस तरह वे सारे पलामू में छा गए। उरावों ने रोहतासगढ़ किले का निर्माण किया था। उनके लोकगीतों में 'गढ़रूइदासÓ का बार-बार जिक्र आता है। इनका निवास उरांवों से पुराना है। माना जाता है कि पलामू में इनका प्रवेश दो हजार साल पहले हुआ था। मार्ह आगे चलकर अंग्रेजों के गजेटियरों में 'मारÓ और 'मालÓ हो गया। इनके बनाए गए मकानों, गढ़ों, बस्तियों के खंडहर पलामू में बिखरे हुए हैं। बेतला में घने जंगलों में ओरंगा नदी के निकट बना पलामू किला इन्हीं का निर्माण कहा जाता है। ओरंगा शब्द भी द्रविड़ कुल का ही है। इसके बाद यहां रकेशेल राजपूतों का वर्चस्व स्थापित हुआ और मर्हा भगा दिए गए। रकशेलों का इतिहास बताता है कि इनका दल गया जिले के कुटुंबा-मटपा की राह से, छपरा की ओर गया और कुछ पलामू की उत्तरी-पूरबी सीमा महाराजगंज-हरिहरगंज के मार्ग से होकर पलामू के देवगन और उसके आस-पास फैल गए।
रकशेलों के बारे में रायबहादुर डा. हीरालाल ने 'मध्यप्रदेश का इतिहासÓ में कवि रामचरण भाट की हवाले से बताया है कि रकशेल वंश का आरंभ सन 196 से होता है और इस वंश के वर्तमान राजा रामानुजशरण सिंह तक 114 पीढिय़ों ने राज किया। यह भी कहा गया है कि इस वंश का मूल पुरुष पलामू के कुंडलिया से सन 194 में सरगुजा आया था सने यहां के द्रविड़ मुखिया (राजा) को भगाकर अपना राज्य स्थापित कर लिया। रकशेल राजपूतों की एक शाखा था। यह अर्कशेल का अपभ्रंश है। अर्क यानी सूर्य। इन्हें सूर्यवंशी राजपूत भी कहा जाता है। पलामू में इनका आगमन 13 वीं शताब्दी के आस-पास हुआ माना जाता है। इन्होंने भी गढ़, किले, तालाब, कोट का निर्माण किया। पलामू किले का सुधार और निर्माण रकशेलों ने भी किया। पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में मानसिंह पलामू की गद्दी पर बैठे। उस समय रकशेलों की दो राजधानियां थीं-एक बेतला की ओरंगा नदी का तट पलामू गढ़, मानगढ़, तमोलगढ़, दूसरा पलामू की उत्तरी सीमा के छोर पर चकले देवगन में देवगढ़। पलामू में रकशेलों ने कब तक राज किया, कौन-कौन राजा हुए, इसकी प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। इस वंश के अंतिम राजा मानसिंह का पता इसलिए चलता है कि इन्हीं से चेरो राजा ने पलामू को अपने अधिकार में लिया था।  
चेरो का काल पलामू के लिए स्वर्णकाल था। इनकी उत्पत्ति च्यवन ऋषि से बताई जाती है। इस जाति से सबसे पहले नेपाल की तराई कमाऊं प्रांत में अपना राज्य स्थापित किया। इसके बाद इस वंश ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने राज्य कायम किए। कालांतर में इनके वंश के भगवंत राय और पूरनमल पलामू पहुंचे। जिस समय ये पलामू पहुंचे, उस समय पलामू किले पर राजा मानसिंह का अधिकार था। दोनों ने मानसिंह के दरबार में नौकरी कर ली। दोनों की सूझ-बूझ और बहादुरी से प्रसन्न होकर इन्हें सेना की कमान सौंप दी गई। लेकिन एक विश्वासघात ने पलामू का तकदीर ही नहीं, इतिहास भी बदल गया। हुआ यह कि राजा मान सिंह के पुत्र का विवाह सरगुजा में तय हुआ। वे बारात लेकर सरगुजा चले गए और किले का भार अपने सरदार भगवंत राय पर छोड़ गए। मौका पाक भगवंत राय ने मानसिंह के पूरे परिवार को मार डाला और खुद राजा बन बैठा। सेना लेकर वह आगे बढ़ा और बारात वापस लेकर लौट रहे मान सिंह का मुकाबला किया। मानसिंह हार गए और सरगुजा लौट गए। वहां मान सिंह ने वही किया जो भगवंत ने उनके परिवार के साथ किया। उन्होंने सरगुजा के राजा की हत्या कर राज्य अपने अधीन कर लिया और पूरनमल को अपना मंत्री बना लिया। यहीं से रकशेल राजा का अंत और चेरो राजवंश का उदय होता हैं।
कहा जाता है कि चेरो राजाओं की सात पीढिय़ों (1613 से 1821 तक)ने पलामू पर राज किया। इसके संंंस्थापक थे भगवंत राय और अंतिम राजा हुए चुरामन राय। ये नि:संतान थे। इस कुल में सबसे प्रतापी राजा मेदिनी राय हुए। इन्हीं के नाम पर डालटनगंज का नाम बदलकर मेदिनीनगर किया गया है। इन्हें पलामू के इतिहास पुरुष का गौरव प्राप्त है। इनकी लोकप्रियता इस लोकगीत से पता चलती है-
धन्न-धन्न राजा मेदनियां, घर-घर बजले मथनियां।
अन्नवा से भर गइले खेत-खलिहनवां,

  सांच भइले सबके सपनवां, घर-घर बजले मथनियां।
गइया-भइंसिया से भरले बथनवांइनके कार्यकाल में गाय, बैल और प्रजा सभी खुशहाल थे। 'राजा मेदनियां के राज, न गउए छान, न प्रजा डांड़।Ó मेदिनी राय वीर और साहसी थे। इनके पराक्रम और न्यायप्रियता की दुहाई आज भी दी जाती है। इन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। रांची के निकट छोटानागपुर के नागवंशी राजा के डोइसागढ़ (नवरतनगढ़) पर भी कब्जा किया और उसके किले का नागपुरी दरवाजा निकलवाकर पलामू किले के प्रवेशद्वार पर लगवाया। यह दरवाजा देखभाल के अभाव में अब जीर्ण हो चुका है। इन्होंने ही पुराने पलामू किले की मरम्मत करवाई और उसी से थोड़ी दूर कमलदह नामक झील का निर्माण कराया। इस झील में किले के सुरंग मार्ग से रानी नहाने जाती थीं। यह झील तीन ओर पहाड़ों और एक ओर ओरंगा नदी की तलहटी के बीच है। अब तो यह सिकुड़ गई है। अपने पुत्र के लिए मेदिनी राय ने पुराने किले के पास पहाड़ी पर नए किले का निर्माण कराया। इसकी नींव संवत 1680 माघ कृष्ण पंचमी, बुधवार को रखी गई थी। यह किला रोहतासगढ़ से भी ऊंचा बनाया गया था-ऊंचतिगढ़ पलमुआं हो, नीचहिं गढ़ रूईदास(रोहतास)। पुराने किले के दक्षिण में दस हजारी छावनी थी। इसमें अनेक गुफाएं हैं। यहां चेरो के साथ खरवार भी महत्वपूर्ण जाति थी। इन दोनों के बीच अच्छे संबंध थे।
चेरो राज के संस्थापक भगवंत राय के पोते अनंत राय के शासन काल में औरंगजेब का तत्कालीन बिहार सूबेदार दाऊद खां ने पलामू पर कब्जा कर लिया। लेकिन उसके वापस लौटते ही चेरो राजा ने पुन: अधिकार कर लिया। इस बीच और घटनाएं हुईं। दाऊद खां ने पुन: 3 अप्रैल 1660 को पराजित किया। इस बार उसने किले को ही नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि किले के अंदर मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनवाई। उसी तरह किले के सिंहद्वार पर स्थित मंदिर को भी तोड़कर मस्जिद बनवाई। इसके ध्वंसाशेष आज भी किले के अंदर और बाहर मौजूद हैं। गुंबदों की आकृति को देखकर कोई भी सहज अनुमान ला सकता है। इसके बाद दाऊद ने पलामू का शासन फौजदार खां को सौंप दिया। लेकिन चेरो भी मानने वाले नहीं थे। किले पर पुन: कब्जा कर लिया। राजा भूपल राय (1661-1662) के बाद राजा मेदिनी राय राजा बने। ये चेरोवंश की पांचवीं पीढ़ी में थे। इनके शासन काल में राज्य स्थिर हुआ। विकास की गति तेज हुई। प्रजा खुशहाली के गीत गाने लगी। इन्होंने 13 साल तक राज किया। इसके बाद राज चलता रहा। दसवें राजा थे जयकिशुन राय (1722-1770)। इन्होंने 48 साल तक राज किया। चेरो वंश में सर्वाधिक राज करने वाले यही थे। उनके बाद चित्रजीत राय गद्दी पर बैठे पर, एक साल ही शासन कर पाए। गोपाल राय के भतीजे ने कोयल नदी के किनारे शाहपुर में एक किला बनवाया, जहां वे पलामू को छोड़कर रहने लगा। यहां 12 साल तक शासन किया। 14 वें राजा हुए चुरामन राय। ये नि: संतान थे। इन्होंने 38 साल तक शासन किया, लेकिन वे बिल्कुल अयोग्य थे। शासन की बागडोर दरबारियों के हाथ में ही रहा। यहीं से चेरो वंश अस्त होता है और अंगरेजों का प्रादुर्भाव। 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल-बिहार की दीवानी हासिल की। चेरो परिवार अपने गृह कलह के कारण अपने में ही उलझ गया। कंपनी को हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया। इस तरह पलामू अंगरेजों के अधीन हो गया। इसके एक साल बाद यानी 1766 में पलामू वायसराय के सीधे नियंत्रण में आ गया। इसके बाद 38 सालों तक पलामू उथल-पुथल से मुक्त रहा। लेकिन 1857 आते-आते अंगरेजों के खिलाफ जंगल धधकने लगे। इसकी कहानी फिर कभी। 1 जनवरी 1892 को इसे जिला बनाया गया। इसके सौ साल बाद यानी 3 मई 1992 को इसे प्रमंडल बनाया गया। लेकिन, आज भी पलामू उपेक्षा का दंश झेल रहा है। किले का जीर्णोद्धार आज तक नहीं हुआ, न खुदाई की गई। उपेक्षा के कारण जंगलों ने अपने आगोश में ले लिया। घने जंगलों के बीच किले के बुर्ज से ओरंगा नदी का खूबसूरत नजारा दिखता है। पर, भारतीय पुरातत्व विभाग ने वहां आज तक कोई शिलापट्टï नहीं लगाया, ताकि पर्यटकों को इस ऐतिहासिक किले के बारे में जानकारी मिल सके।

कबरा कला : बदल सकता है झारखंड का इतिहास

 डालटनगंज के हुसैनाबाद प्रखंड के कबरा कला गांव में उत्खनन से झारखंड ही नहीं, भारत के इतिहास पर भी नई रोशनी पड़ सकती हैं। यह एक ऐसा गांव है, जहां पाषाण काल से लेकर मुगल काल तक के अवशेष पाए जाते हैं। पुरातात्विक दृष्टिï से देश का संभवत: अकेला ऐसा स्थल है, जो कभी बेचिरागी नहीं हुआ। यानी यहां सभ्यता की निरंतरता की निशानी के कुछ न कुछ चिह्नï अवश्य मिल जाते हैं। हालांकि आज भी यहां एक-डेढ़ हजार की आबादी निवास करती है। भारतीय पुरातत्व विभाग(दिल्ली)की पत्रिका ने भी माना कि यहां से मिले सामान नियोलीथिक से लेकर मध्यकाल के स्पष्टï संकेत करते हैं। वहीं, पिछले एक दशक से कबरा कला पर काम करने वाले हुसैनाबाद निवासी तापस डे मानते हैं कि यहां मध्य पुरापाषाण काल, नव पाषाण काल, ताम्र पाषाण, लौह युग, मौर्य काल के अवशेष मिले हैं। वह मानते हैं कि यहां चालीस से अस्सी हजार के बीच के कालखंड के पत्थरों के औजार मिले हैं। कला संस्कृति एवं खेलकूद विभाग के पूर्व उपनिदेशक (पुरातत्व) डा. हरेंद्र प्रसाद सिन्हा का कहना है कि पाषाण काल के अवशेष उसकी प्राचीनता की कहानी कहते हैं। लेकिन स्पष्टï तौर पर जब तब खुदाई नहीं होती है, कुछ भी प्रामाणिक ढंग से कहना समीचीन प्रतीत नहीं होता।
पुरातात्विक संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक डा. अमरेंद्रनाथ 2003 में अपने छह सदस्यीय टीम के साथ कबरा कला आए थे। उन्होंने यहां का सूक्ष्म निरीक्षण किया और कहा कि कबरा कला की सभ्यता झारखंड की एक विस्मयकारी पुरातात्विक इतिहास की परिघटना है। उसी समय इस गांव को राष्टï्रीय महत्व का ऐतिहासिक स्थल चिह्निïत कर दिया गया। पर, इतने महत्व के गांव की खुदाई आज तक नहीं हुई। इस बाबत तापस डे कहते हैं कि बार-बार पुरातत्व विभाग को लिखा और दिल्ली तक दौड़ लगाई पर केवल कागजी आश्वासन ही मिले। जबकि इस मामले को सन 2000 में संसद में भी उठाया गया था। तब से केवल स्थल निरीक्षण का काम ही हुआ, उत्खनन नहीं। चूंकि यह गांव सोन नदी के किनारे स्थित है, इसलिए इसे सोन नदी घाटी सभ्यता का नाम दिया गया है। इस गांव के चारो ओर कुछ न कुछ महत्वपूर्ण सामग्री मिलती ही रहती है। अभी कुड़वा कला गांव में, जो जपला-डेहरीआनसोन रोड से दस किमी भीतर स्थित है, वहां भी उत्तरकालीन मृदभांड मिले हैं। इसके साथ ही लाल, काले पालिशदार मिट्टïी के बर्तन मिले हैं। लाल पालिश की हुई सुराही और अंगूठे के आकार का एक सर्प का सिर मिला है। इस सर्प के दो कान बने हुए हैं। इसका एक कान खंडित हो गया है। जाहिर है, या तो यहां शैवों की उपस्थिति रही होगी या नागवंशियों की। हालांकि झारखंड में दोनों की उपस्थिति रही है। कबरा कला में भी मनके, स्त्री की छोटी मूर्ति, जिस एक लिपि में कुछ अंकित है, पत्थरों के औजार आदि मिले हैं। यहां नव पाषाण काल के विभिन्न रंग एवं आकार की चार कुल्हाडिय़ा मिली हैं। पाल, मुगल और ब्रिटिश काल की मूर्तियां, तांबे एवं पीतल के बर्तन, सिक्के आदि भी पर्याप्त संख्या में मिले हैं। यहां लौह काल की लहसीलन (पिछला हुआ लौह) तथा मिट्टïी भी है। ये सभी चीजें सतह पर ही मिलती रही हैं या कभी किसी कारणवश ग्रामीण खुदाई में इन्हें प्राप्त करते रहे हैं। पर, इतने महत्वपूर्ण स्थल की खुदाई आज तक नहीं हुई जबकि तापस डे मानते हैं कि खोदाई से केवल नागर सभ्यता ही नहीं मिलेगी बल्कि मोहनजोदड़ो और सिंधु घाटी की सभ्यता से भी पहले की सभ्यता से साक्षात्कार हो सकता है। हालांकि अब इसकी खोदाई होनी है। पुरातत्व विभाग ने स्वीकृति दे दी है। अब देखिए, क्या-क्या खोदाई में निकलता है। जो भी हो, एक नई सभ्यता से रूबरू होने का मौका तो मिलेगा ही। हो सकता है, फिर से इतिहास लिखा जाए।  

बोली को बनाया मंच की भाषा

भिखारी ठाकुर भोजपुरी के उस व्यक्तित्व का नाम है, जिसने भोजपुरी भाषा को उस जमाने में भी मंच की भाषा बनने का गौरव प्रदान किया, जिस जमाने में गांव में भी साधारण पढ़-लिखे लोग भी, जब रास्ते में, बाजार में, या अपने दरवाजे या दालान बात करने में शर्म महसूस करते थे। इसे अनपढ़-गवारों की भाषा मानकर इसका खुले में प्रयोग करना, उनको, अपने अशिक्षित और पिछड़े होने का एहसास कराता था। ऐसे समय में भिखारी ठाकुर को अपनी इस बोली को, मंच की भाषा बनाने में ज
रा भी झिझक नहीं हुई। हलांकि भिखारी ठाकुर कोई बहुत पढ़े-लिखे व्यक्ति नहीं थे, उन्होंने तो खुद कहा है, 'लिखे-पढ़े के हाल ना जानी, पत राख शारदा भवानीÓ।
भिखारी उस घर में पैदा हुए थे, जिसे उनके गंवई समाज में परजा पवनी का दर्जा प्राप्त था। वह नाई जाति में पैदा हुए थे जिसका काम लोगों की मुफ्त हजामत बनाना था, खास कर अपने जजमानिका के ओहदेदार लोगों का और इसके एवज में उनके परिवार को मिलता था वर्ष में दो बार खेतों में पैदा होने वाली फसलों का एक बंधा बंधाया और शादी-विवाह आदि संस्कारों में कुछ नेग। इस परिप्रेक्ष्य में आपका सोचना जायज है कि फिर ऐसे परिवार का लड़का आखिर कैसे इतना बड़ा लोक कलाकार बन गया? इतने नाटक, इतने गीत लिख गया, गाया भी, नाचा भी, अभिनय किया और गांव की गंवई भोजपुरी बोली को शहरी और नगरों तक पहुंचा दिया, वह भी मंच पर, जबकि उस दौर में भोजपुरी सिनेमा की भाषा भी नहीं बन पाई थी।
यह भिखारी ठाकुर और उनकी लोकप्रियता की देन है कि भोजपुरी को सिनेमा की भाषा बनाने पर बाद में लोगों ने सोचा, इस पर काम किया और इस सिनेमा के जनक बने, हिंदी फिल्मों के महान कलाकार, पर मन-मिजाज से खांटी भोजपुरिया रहे, जनाब नजीर हुसैन। भिखारी ठाकुर का पढ़ा-लिखा होना तो दूर, उन्हें कई वर्षों तक अक्षर ज्ञान भी नहीं हुआ था। उन्होंने खुद भी कहा है कि 'नौ बरिस के जब हम गइनी विद्या पढऩ पाठ पर गइनी, एक बरिस ले जबदल मति लिखे ना आइल राया गीत।Ó और अपनी इस जिंदगी की जलालत से तंग आकर भिखारी ठाकुर एक दिन अपना घर छोड़ कर भाग जाते हैं और पहुंचते हैं बंगाल के मेदनीपुर। वहां पहले तो अपने जीविकोपार्जन के लिए वही अपना पुश्तैनी पेशा अख्तियार करते हैं। पर बाद में बंगाल की कलात्मक उर्वरा भूमि, उनके मन में छिपे कलाकार को जगाती है, झिंझोड़ती है। जब वह, वहां पहली बार रामलीला देखते हैं, फिर बंगाल की प्रसिद्ध नाटक पद्धति जात्रा देखते हैं और अपने मन में भी कुछ वैसा ही करने की कल्पना पालने लगते हैं, फिर क्या था, लौट पड़ते हैं अपने गांव और वहां आकर पहले तो अपने मित्र भगवान दास बनिया से अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं, कुछ लिखने पढऩे भी सिखते हैं और फिर अध्ययन करते हैं तुलसीदास कृत रामचरितमानस का। और फिर साकार हो जाती है उनके मन की कल्पना। अपने दोस्तों के साथ खड़ी करते हैं रामलीला मंडली, पिरोने लगते हैं अपने मन भावों को अपनी भाषा में रामचरित के नायकों का संवाद, गान और फिर होता है एक दिन मंचन। पूरा गांव सराह उठता है। हौसला बढ़ता है। पर माता-पिता की वर्जना बाधक बनती है। पर अब तो कलाकार के मन को पंख लग गये होते हैं। इन सारी वर्जनाओं के बावजूद वह कलाकार विद्रोह करता है, कलाकार विद्रोही नहीं हुआ तो कलाकार कैसा? सो अब बनती है नाज मंडली। शुरू होते हैं नाटक लिखने के सिलसिले। एक के बाद दूसरा, तीसरा, चौथा फिर जाने कितने। होने लगते हैं मंचन। राहुल सांकृत्यायन को कहना पड़ा कि 'भिखारी ठाकुर तो भोजपुरी भाषा के शेक्सपीयर हैं। और इसी भोजपुरी के शेक्सपीयर के नाटकों से कुछ चुनिंदा गीतों को गाया है कल्पना पटवारी ने। नौ गीतों को लंदन की मशहूर कंपनी वर्जिन ने रिलीज किया है। यह भोजपुरी के फक्र व सम्मान की बात है। अब भोजपुरी दुनिया के लिए अजूबा भाषा नहीं होगी।

चुपके से जाना लोक कलाकारों की नियति

संजय कृष्ण झारखंड में चलना ही नृत्य, बोलना ही गीत का मुहावरा बहुत पुराना है और प्राय: यहां की हरेक आदिवासी भाषाओं में मिल जाता है। प...