सोमवार, 20 जनवरी 2020

लोकसंस्कृति के अध्येता जगदीश त्रिगुणायत

लोक साहित्य के अध्येताओं के लिए जगदीश त्रिगुणायत का नाम अनजाना नहीं होना चाहिए। नाम से भी परिचित होंगे और असाधारण काम से भी। हिंदी-भोजपुरी समाज से वास्ता रखने वाले इस लोक साधक ने एक दूसरे गोत्र की भाषा-संस्कृति के अध्ययन-मनन में अपने जीवन को लगा दिया। उनकी साधना एकनिष्ठ थी। किसी प्राप्य की अपेक्षा नहीं थी। ऐसे साधक को जीते जी ही हमने भुला दिया और जब सात सितंबर, 2010 को अपने जनपद देवरिया (उत्तरप्रदेश) में रहते हुए 87 साल की उम्र में दुनिया से विदा हुए तो हिंदी समाज ने भी कोई नोटिस नहीं ली।
उनका जन्म देवरिया में ही एक मार्च 1923 को हुआ था। महज 18 साल की उम्र में वे झारखंड चले आए। झारखंड में रहते हुए उन्होंने एक बड़ा काम किया। यद्यपि वे आए थे दूसरे काम से। 1941 में महात्मा गांधी और डा. राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से खादी ग्रामोद्योग के प्रचार-प्रसार के सिलसिले यहां भेजे गए थे। वे अकेले नहीं आए थे, बल्कि उनकी मंडली में पांच आदमी थे- मोती बीए, सदानंद ब्रह्मचारी, कवि शंभुनाथ सिंह और एक उपाध्यायजी और वे खुद। रांची के जगन्नाथपुर के पास तिरिल आश्रम इनका ठिकाना था। आश्रम भी 1929 में ही खुला था। इस ग्रामोद्योग का उद्देश्य आदिवासियों में आजादी के प्रति जागृति, उनका उत्थान, चरखा का प्रचार आदि शामिल था। ये लोग एक साल तक छोटानागपुर के गांवों को घूमते रहे। गांवों की संस्कृति-संस्कार, रहन-सहन, नृत्य-गीत, रीति-रिवाज को देखते-परखते रहे। देखते-परखते कुछ लोगों को झारखंड की आबोहवा भा गई तो वे यहीं के होकर रह गए। पर कुछ अपनी निजी जिम्मेदारियों या अन्य वजहों से यहां से चले गए। उन दिनों की प्रकृति को लेकर शंभुनाथ सिंह ने लिखा है, 'सुबह जब पहाड़ी पर निकलते थे, पूरा रास्ता फूलों की सुगंध से मादक हो जाता था। इतनी स्वच्छता थी कि कोई भी यहां के देहातों में रह सकता है। पेड़-पौधे, आकाश, वायु सभी स्वच्छता की आभा से दमक रहे हैं।Ó शंभुनाथ सिंह एक साल के बाद एमए करने के लिए इलाहाबाद चले गए। इसी तरह और लोग भी यहां से चले गए सिवाय सदानंद ब्रह्मचारी और जगदीश त्रिगुणायतजी के। सदानंद भी दूसरे कामों में लग गए। बच गए त्रिगुणायतजी। इनसे प्रकृति कुछ और काम कराना चाहती थी। आए थे प्रचार-प्रसार करने। यह काम चल रहा था कि इस बीच खूंटी हाई स्कूल बना तो त्रिगुणायतजी उसमें प्राध्यापक हो गए और वहीं छात्रावास में छात्रों के साथ रहने लगे। बहुत दिनों तक वहां अध्यापकी की। जब रांची के एक छोर धुर्वा में 1958 में एचईसी की स्थापना  हुई, त्रिगुणायतजी वहां जनसपंर्क अधिकारी के रूप में पदस्थापित हो गए और यहीं से सन् 1981 में अवकाश लिया। इसके बाद भी 1991 तक रांची में रहे। फिर अपने जनपद देवरिया लौट गए। वहीं हाल में ही सात सितंबर, 2010 को उनका निधन हुआ। त्रिगुणायतजी जब एचइसी में जनसंपर्क अधिकारी थे, तब हर साल कवि सम्मेलन का आयोजन कराते। उस समय के हिंदी के अनेक महत्वपूर्ण कवि भाग लेने रांची आते। इस तरह हिंदी साहित्य में भी एक रांची की पहचान बन रही थी। 
खूंटी में रहते हुए वे मुंडा संस्कृति के संपर्क में आए। यहीं पर मुंडारी गीतों को सुनते हुए उनके संकलन की बात सोची।  फादर हाफमैन यह काम पहले कर चुके थे। दो सौ मुंडारी गीतों का उन्होंने अंग्रेजी अनुवाद किया था। आर्चर ने भी कुछ काम किया। सब अंग्रेजी में। जगदीशजी ने यह काम हिंदी में किया। एक लंबा समय गीतों के अध्ययन में लगाया। मुंडा भाषा सीखा। सभी जानते हैं, मुंडा आस्ट्रिक-परिवार की भाषा है। फिर भी अपने अध्यवसाय से सीखा और मुंडारी गीतों की लय पकड़ी। इसके बाद पुस्तक तैयार हुई तो बिहार ग्रंथ अकादमी ने 'बांसरी बज रहीÓ नाम से इसे छापा। पहले संस्करण की भूमिका शिवपूजन सहाय ने लिखी। फिर कुमार विमल जब अकादमी के निदेशक थे, तब पुस्तक के बारे में एक गंभीर भूमिका लिखी। दूसरा संस्करण 1971 में आया था और पहला 1957 में। निराला और पंत ने अपनी अमूल्य सम्मतियां दी, जिसे दूसरे संस्करण में प्रकाशित किया गया। 527 पेज की पुस्तक में 63 पेज की भूमिका सिर्फ लोकगीत के इतिहास, नृतत्वशास्त्र, परंपरा, मुंडा संस्कृति के बारे में ही पड़ताल नहीं करती, मुंडा समाज के अध्येता रहे फादर हाफमैन और शरतचंद्र राय की लोकगीतों के अंग्रेजी अनुवाद की कमियों के बारे में भी सोदाहरण प्रकाश डालती है। इस तरह यह भूमिका एक मशाल की तरह काम करती है। उनकी यह भूमिका पढऩे के बाद ही कुछ और जानने की इच्छा हुई तो एक सुबह उनके शिष्य पद्मश्री डा. रामदयाल मुंडा से उनके आवास पर मिला। त्रिगुणायतजी के बारे में पूछा तो बड़े भावुक हो गए। कहने लगे, उनका रुझान शुरू से ही आदिवासी जीवन के प्रति रहा। यहां के लोक गीत, लोक नृत्य और लोक कथाओं के बारे में अधिकाधिक जानने का उत्सुक रहते। अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए कभी छात्रावास के बच्चों से पूछते, कभी आस-पास के पुराने लोगों सेे। कभी खुद गांवों में निकल पड़ते और रात उन्हीं लोगों के साथ गुजारते। सात्विक प्रवृत्ति के कारण कभी-कभी गंावों में माड़-भात पर ही गुजारा कर लेते और पुआल पर सोकर रात गुजार लेते। इस तरह खुद भी गीतों का संग्रह करते और छात्रावास के बच्चों को भी एक-एक  गीत लिखकर ले आने को प्रेरित करते। इसी प्रक्रिया के तहत उन्होंने मुंडारी गीतों को संग्रहित किया। अब मुंडाजी भी जीवित नहीं हैं। मुंडाजी ने ही त्रिगुणायतजी का मोबाइल नंबर दिया था। यह वाकया 2007-08 का है। फिर उनसे बातचीत हुई तो त्रिगुणायतजी बताने लगे, 'उनकी (आदिवासियों) सेवा करने का मौका नहीं मिलता तो उनकी संस्कृति को नहीं जान पाते। उनके गीतों के संग्रह के लिए पहले उनके दुख-सुख में शामिल हुआ। उनके जीवन संघर्षों को समझा। उनके साथ आत्मीयता कायम की। उनको समझने का प्रयत्न किया। उन्होंने भी मुझे समझा और मुझपर विश्वास किया। इस तरह उनके साथ एक रिश्ता बना जो विश्वास की डोर से बंधा था।Ó
त्रिगुणायतजी तो हिंदी-भोजपुरी भाषी थे, लेकिन काम किया मुंडा और उरांवों की भाषा पर। वह लिखते हैं, मुंडा भाषा की मौलिक शब्दावली में वन-पर्वत संबंधी वस्तुओं के शब्दों की भरमार है, पशु-पालन, ग्राम व्यवस्था तथा खेती बारी संबंधी मौलिक शब्द इस जाति की मूल संस्कृति पर प्रकाश डालते हैं। धातु के बर्तन, कपास के वस्त्र, वाणिज्य व्यवसाय, कर्ज, महाजन, आदि संबंधी शब्द मुंडा भाषा के अपने नहीं हैं। मुंडारी में इन बातों के लिए आर्य भाषाओं के शब्दों को देखकर पता चलता है कि मुंडाओं की मूल संस्कृति में ये बातें विद्यमान नहीं थीं, किंतु नृत्य, गान, वाद्य, बांसुरी आदि के उनके अपने शब्द हैं। (बांसरी बज रही- पृष्ठ तीन)।  त्रिगुणायत जी ने लिखा है, मुंडाओं की भाषा, छोटानागपुर पहाडिय़ों की संथाल, हो तथा अन्य जातियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं के साथ भाषाओं के उस परिवार से संबंध रखती हैं जिसे आस्ट्रो-एशियाटिक कहते हैं और जिसमें मान-ख्मेर, वापालंग, निकोवारी, खासी, मलक्का की आदिवासी भाषाएं सम्मिलित हैं। त्रिगुणायतजी लिखते हैं, 'मुंडा छोटानागपुर कब आए, इसका तो पता नहीं, पर यहां आने पर उनकी दो शाखाएं हुईं, जिनमें एक शाखा 'संथालÓ, आधुकि संथाल परगना की ओर बढ़ी और दूसरी शाखा मुंडा रांची की पच्छिमी घाटियों में उतरी। कुछ दिन बाद, जब उरांव, कर्नाटक की ओर से, नर्वदा के तटों पर होते हुए, विन्ध्य की घाटियों से सोन की घाटी में आकर और कुछ दिन बाद रोहतासगढ़ में राज्यकर, किसी राजा द्वारा हटाए जाने पर, रांची के उसी भाग में आए, तब मुंडा पूरब-दक्षिण की ओर सरक गए। रांची के पच्छिमी भाग में, जो आज उरांवों का क्षेत्र बन चुका है, एक दिन मुंडा सभ्यता की खेती लहरा रही थी। उसके छूटे-छटके हुए बीज, वहां की धरती में मौजूद हैं जो पीले धान के खेत में, लाल बालियों की तरह सरलता से पहचान लिए जा सकते हैं।Ó
त्रिगुणायतजी की 'बांसरी बज रहीÓ हिंदी साहित्य के लिए तो और भी महत्वपूर्ण है। उनकी 'मुंडारी लोक कथाएंÓ की भी 94 पेज की भूमिका त्रिगुणायतजी के व्यक्तित्व को ही नहीं खोलती है, बल्कि भारत की आदिम राग-रागिनियां, संस्कृति-संस्कार, प्रवृत्ति-परंपरा, मिलन-बिछोह के न जाने कितने अनछुए कथा-प्रसंग भी खुलती है। त्रिगुणायतजी ने भाषा पर और भी काम किया था। इसके साथ ही वे बांग्ला के भी जानकार थे। शिवपूजन सहाय ने लिखा था कि 'आप (त्रिगुणायतजी)हिंदी के कवि भी हैं, तथा अंगरेजी और बांग्ला की कविताओं का हिंदी पद्यानुवाद भी किया है। 'अरुणोदयÓ और 'छायागानÓ नामक पुस्तकों में मौलिक और अनुदित कविताएं प्रकाशित हैं।Ó त्रिगुणायतजी ने रांची से ही प्रकाशित आदिवासी पत्रिका और देश की दूसरी पत्रिकाओं में भी लेख आदि लिखा करते थे जो आदिवासी और भारतीय संस्कृति से जुड़े होते थे। आज उन्हें खोजने-सहेजने की जरूरत है।


प्रतिभासम्पन्न साहित्यकार डॉ. श्यामसुन्दर घोष

झारखण्ड की धरती जितनी रत्नगर्भा है उतनी ही साहित्य प्रवण भी। यहाँ के साहित्यकारों/ रचानाकारों ने अपनी रचनाओं से हिन्दी साहित्य को अत्यन्त समृद्ध किया है। मूर्द्धन्य कहानीकार राधाकृष्ण उर्फ ‘लाल बाबू’, नाटककार एवं नाट्य विशेषज्ञ डॉ. सिद्धनाथ कुमार, प्रख्यात भाषाविद आचार्य दिनेश्वर प्रसाद को भला कौन नहीं जानता। इसी तरह डॉ. श्रवण कुमार गोस्वामी, प्रो0 अशोक प्रियदर्शी, डॉ. ऋता शुक्ल अत्यन्त समाहृत विद्वान एवं रचनाकार हैं। इसी क्रम में गोड्ा (झारखण्ड) निवासी, डॉ. श्याम सुन्दर घोष का योगदान भी कम उल्लेखनीय नहीं है।

डॉ. श्यामसुन्दर घोष जीवन और साहित्य के विश्लेषण में पारंगत थे। उनकी दृष्टि से मानव-जीवन और भाषा एवं साहित्य का कोई कोण नहीं छूटता था। वे एक सामान्य सी बात से शुरू करके अपनी तीक्ष्ण विवेचनात्मक दृष्टि से बड़ी बात कह जाते हैं और खूबी यह की उनकी बातें इतनी सटिक होती हैं कि कोई उसे झुठला नहीं सकता और वे ऐसे विरले लेखक थे जो आलोचना की भी आलोचना करने से नहीं चूकते। डॉ. घोष ने साहित्य की सभी विधाओं में लिखा है। वे एक सिद्धहस्त लेखक थे। उनके लिए लेखन एक व्यसन था, जो लग गया, सो लग गया। उनकी पैठ सभी प्रकार के लेखन में थी, चाहे वह लेखन किसी भी प्रकार का क्यों न हो। वे आलोचना लिखते थे तो कविता भी करते थे। व्यंग्य लिखते थे तो भाषा विषयक लेखन भी करते थे। उन्होंने अपने लेखन में जीवन की सभी प्रकार की संवेदना को स्वर दिया है।

डॉ. घोष निरन्तर लिख रहे थे। उनकी लगभग साठ पुस्तकें प्रकाशित हुई होंगी। वैसे तो उन्होंने गीत-प्रगीत और कविताएँ भी लिखी हैं। परन्तु, डॉ. हरिवंश राय बच्चन पर लिखी इनकी समीक्षा अत्यधिक चर्चित है। मुझे उनका भाषा विषयक लेखन अच्छा लगता है। अब यह भी नहीं की दूसरे विषयों पर उनके लेखन की मैं कद्र नहीं करती। सच तो यह है कि मैं उनकी कद्रदान हूँ। परन्तु, आज के समाज में भाषा के प्रति जो उदासी का व्यामोह व्याप्त है, इस पृष्ठभूमि में ’भाषाचिन्तननामा’ नामक, डॉ. घोष की पुस्तक ’रोशनी’ का काम करती है। इस पुस्तक का फलक बहुत व्यापक है। निस्संदेह ही यह पुस्तक व्यापक तौर पर भाषा और बोलियों के महत्त्व और उसकी उपयोगिता को समझने के लिए हमें बाध्य करती है। पुस्तक में एक ओर जहाँ लेखक ने ’भाषायी हीनता-भाव’ और ’भाषा की फजीहत’ पर विवेचन किया है तो दूसरी ओर उसने ’भाषा के विकास में जन और  अभिजन की भूमिका’ व भाषाओं और बोलियों की समीपता


का अर्थ-सन्दर्भ भी ढूढ़ने की भी चेष्टा की है। इतना ही नहीं विद्वान लेखक ने भाषा में शुद्धतावाद और भाषा में सेंधमारी की पड़ताल की है, तो, भाषाओं को सरकारी दर्ज़ा देने के सवाल और ’हिन्दी दिवस’ नहीं, भारतीय भाषा दिवस’ जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर भी विमर्श किया है। आखिर सवाल सिर्फ़ हिन्दी का नहीं अपितु व्यापक तौर पर सभी भारतीय भाषाओं और बोलियों की अस्मिता का प्रश्न भी है।

झारखंड के वाटरमैन सिमोन उरांव

सिमोन उरांव  फोटोसाभारआनंद बाजार
सिमोन उरांव ठेठ देशज आदमी हैं। गांव के। गांव के लोगों से जो सीखा, उसे समाज को दे दिया। केंद्र सरकार ने उन्हें 2016 में पद्मश्री से नवाजा। सिमोन की खासियत ही कुछ ऐसी है कि रांची जिले के बेड़ो प्रखंड के दर्जनों गांवों के लोग लोग उनके मुरीद हैं। जनता का अथाह प्यार उन्हें मिला और आज भी मिल रहा है। ग्रामीणों के सहयोग से तीन-तीन बांध, पांच तालाब और कुओं की लंबी शृंखला खड़ी कर दी। महज साक्षर भर होकर उन्होंने जल प्रबंधन के क्षेत्र में जो कर दिखाया है, वह न सिर्फ बेड़ो, बल्कि पूरे राज्य और राष्ट्र के लिए विकास के लिए सबक है। सिमोन ने लगभग चार किलोमीटर की परिधि में फैले वनक्षेत्र पर गांव के ही लोगों का पहरा बिठा दिया, ताकि माफिया से वन एवं पर्यावरण की रक्षा हो सके। अब से लगभग पांच दशक पूर्व जहां इस इलाके के सैकड़ों एकड़ भूमि डूब क्षेत्र थे, आज वहां फसलें लहलहा रही हैं। पलायन जिस क्षेत्र की मजबूरी थी, आज सभी हाथों में रोजगार है। 
सिमोन ने 1955 से 1970 के बीच बांध बनाने का अभियान जोरदार ढंग से चलाया। लोगों को बताया, समझाया।  इसके बाद लोग जुड़ते चले गए। जब उन्होंने यह काम शुरू किया तो 500 लोग भी उनसे जुड़कर जल संरक्षण की दिशा में काम करने लगे। पांच हजार फीट नहर काटकर, 42 फीट ऊंचा बांध बनाकर 50 एकड़ में सिंचाई की सुविधा की। उन्होंने भी यह महसूस किया कि बांध बनाने से बहुत मदद मिल रही है। वे आज भी जल संरक्षण, वन रक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करते हैं। उन्होंने अनपढ़ होते हुए भी गांव में आठवीं क्लास तक पढ़ाई शुरू कराने में सफलता पाई। सिमोन जमीन पर गांव वालों का अधिकार मानते हैं। उन्होंने तीर-धनुष लेकर पेड़ों की कटाई का विरोध किया। पर्यावरण संरक्षण के मकसद को पूरा करने के लिए दो बाल जेल जा चुके हैं और दोनों बार अदालत ने उन्हें समाजिक कार्यकर्ता बताकर रिहा कर दिया।
पानी के बेतरतीब बहाव की वजह से जहां बरसात के दिनों में सैकड़ों एकड़ भूमि जलमग्न रहा करती थी, वहीं बरसात के बाद सुखाड़ का आलम। रोटी की जुगाड़ में पलायन बेड़ो प्रखंड के नरपत्रा, झरिया, खरवागढ़ा, जाम टोली, वैद्य टोली, खक्सी टोला समेत आसपास के दर्जनों गांवों की कहानी थी। गांव में जल प्रबंधन का अभाव इसकी मूल वजह थी। उस समय सिमोन की उम्र तकरीबन 12-15 वर्ष की थी। खेती-बारी ही आजीविका का इकलौता साधन था, परंतु तब दो जून की रोटी का जुगाड़ भी बड़ा सवाल था। 60 के दशक में कुदाल-फावड़े के साथ जो खेतों को समृद्ध करने उतरे, आज भी उसी काम में जुटे हैं। 
सिमोन ने पूर्वजों के मिले पारंपरिक ज्ञान को ग्रामीणों के बीच बांटा। फिर मेहनत की बदौलत गांव की तस्वीर बदलने की समेकित योजना तैयार की। काम मुश्किल था, परंतु ग्रामीणों के सहयोग से मंजिल मिलती गई। लगभग दशक भर की कड़ी मेहनत के बाद पहले गायघाट, फिर झरिया और फिर देशपल्ली बांध बनकर तैयार हो गया। इससे जहां सैकड़ों एकड़ भूमि डूब क्षेत्र से बाहर निकल गई, वहीं बांध बन जाने से पानी के भंडारण की समस्या दूर हो गई। ग्रामीणों के सहयोग से इस बांध के सहारे 5500 फीट लंबी नहर निकाली गई। फिर क्या फसलें लहलहा उठीं। ग्रामीणों में नई ऊर्जा का संचार हुआ। फिर वैसे क्षेत्र जहां बांध का पानी नहीं पहुंच सकता था, ग्रामीणों सहयोग से पांच तालाब और 10 कुएं खोद डाले गए। 
आजादी से पहले और आजादी के बाद बांध निर्माण की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं से उत्पन्न विस्थापन की समस्या से सबक लेते हुए हमने बांध का निर्माण सुनियोजित तरीके से करने की कोशिश की। हमारे पास न ही कोई खास तकनीक थी और न ही फंड। सब कुछ ग्रामीणों की हिम्मत और उनकी मेहनत पर केंद्रित था। मिट्टी का क्षरण न हो, सो बांध के किनारे-किनारे पौधे लगाते चले गए। बांध बनाने, जलाशयों के निर्माण आदि में में जिन 30 किसान परिवारों की जमीन गई, पुनर्वास के तौर पर उन्हें मत्स्य पालन से जोड़ दिया। 
वह एक बात का जिक्र करते हैं। 'देखो, सीखो, करो, खाओ और खिलाओÓ। इस भावना के साथ अगर हम आगे बढ़े तो गांवों की तस्वीर बदल जाए। जब ग्रामीण समृद्ध होंगे। उनका आर्थिक और सामाजिक स्तर ऊंचा उठेगा। समाज में व्याप्त विसंगतियां स्वत: दूर होती चली जाएंगी। धरती सोना है। यह जमीन फसाद की जड़ भी है और विकास का साधन भी। यह तो हमारा नजरिया है कि हम इसे किस रूप में लेते हैं। यह स्थापित सत्य है कि 'अगर आदमी जमीन से लड़ेगा तो विकास होगा और आदमी आदमी से लड़ेगा तो विनाश होगा।Ó 
जीवन संघर्ष का मैदान है। अगर आप इस पथ पर चलेंगे तो कांटे भी मिलेंगे, परंतु अगर आप सही मार्ग पर हैं तो जीत आपकी ही होगी, आप पराजित कदापि नहीं हो सकते। जब ग्रामीणों के सहयोग से हम जंगल से होकर नहर निकाल रहे थे, सरकारी महकमे के विरोध का सामना करना पड़ा। हमपर मुकदमे भी हुए, परंतु मानव मूल्यों के संवद्र्धन के लिए हमारे काम की सराहना हुई और फिर उसी सरकार ने मुकदमा वापस भी लिया। चाहे वह गांव हो, राज्य हो या फिर देश। विकास के मामले में सबको एकजुट रहना होगा। 
सिमोन को पर्यावरण संरक्षण के लि
ए पहले भी कई पुरस्कार मिले हैं-
-उन्हें अमेरिकन मेडल ऑफ ऑनर लिमिटेड स्टा्राकिंग 2002 पुरस्कार के लिए चुना गया।
-विकास भारती विशुनपुर से जल मित्र का सम्मान मिला।
-झारखंड सरकार की तरफ से सम्मान

योगदा आश्रम शांति का परम धाम




रांची स्टेशन से थोड़ी दूर स्थित योगदा आश्रम शांति का परम धाम है। शहर के बीचोंबीच इस आश्रम में पहुंचने से शहर का सारा शोरगुल शांत हो जाता है। यहां आने पर लगता है, हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं, जहां सिर्फ  शांति ही शांति है। प्रांगण की हरियाली, विभिन्न प्रकार के फूल खिलखिलाते हुए हर आंगतुक का स्वागत करते हैं और उन्हें सुकून बख्शते हैं। यहां वैसे तो हमेशा कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन 'शरद संगमÓ कार्यक्रम सबसे बड़ा आयोजन होता है। यह शरद ऋतु में होता है। आश्रम क्रिया योग की पाठशाला है। 
1917 में स्थापना
रांची में योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया की स्थापना 1917 में परमहंस योगानंद ने की थी। सात मार्च, 1977 को उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी करते हुए भारत सरकार ने कहा था, 'उनका स्थान भारत के महानतम संतों में हैं। उनका कार्य लगातार बढ़ रहा है। उनकी कांति विश्व भर के सत्यान्वेषियों को ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर आकर्षित कर रही है।Ó युवकों की शिक्षा में परमहंस जी की गहन अभिरुचि थी। 
राजा ने दी दान में जमीन
सन् 1918 में कासिम बाजार के महाराज मणींद्र चंद्र नंदी ने रांची में अपने महल और पचीस एकड़ भूमि आश्रम एवं विद्यालय के लिए दान दे दी, जिसे योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय कहा जाता था। अब यह योगदा सत्संग शाखा मठ बन गया, जो पत्राचार कार्यालय एवं योगदा सत्संग पाठमाला एवं योगदा सत्संग सोसाइटी के प्रकाशनों के वितरण केंद्र का काम करता है।
1920 में उन्हें उनके गुरु ने अमेरिका में हो रहे उदारवादियों के विश्व धर्म सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में भेजा। उस समय पूरे अमेरिका का दौरा किया और व्याख्यान दिया। 1936 में परमहंसजी ने योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया (वाइएसएस) को एक असांप्रदायिक और धर्मार्थ संस्था के रूप में पंजीकृत हुआ। वाइएसएस का पंजीकृत मुख्य कार्यालय योगदा सत्संग मठ है, जो दक्षिणेश्वर, कोलकाता में गंगा किनारे स्थित है। 
कौन हैं योगानंद परमहंस
उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में परमहंस योगानंद जी का जन्म पांच जनवरी, 1893 को एक बंगाली परिवार में हुआ था। माता-पिता ने उनका नाम मुकुंद लाल घोष रखा। जन्म के कुछ समय बाद उनकी माता, उन्हें अपने गुरु लाहिड़ी महाशय के आशीर्वाद के लिए बनारस ले गईं। लाहिड़ी महाशय ने कहा, 'छोटी मां, तुम्हारा पुत्रा एक योगी होगा।Ó परम सत्य की खोज के क्रम में अपने गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी के पास पहुंचे। सन् 1915 में दस वर्षों के आध्यात्मिक प्रशिक्षण के बाद योगानंद जी ने संन्यास का स्वामी पद ग्रहण किया। परमहंस ने मार्च 1952 में अपना शरीर त्यागा।  
क्रिया योग का पुनरुत्थान
2012 में आश्रम में क्रिया योग की 150 वीं वर्षगांठ मनाई गई। परमहंस जी ने अपनी योगी कथामृत में एक अध्याय क्रियायोग विज्ञान के लिए समर्पित किया है। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि यह वही विज्ञान है, जिसकी भगवान कृष्ण ने भागवतगीता में चर्चा की है और जिसका ज्ञान महर्षि पतंजलि को भी था। यह एक सरल मन:कायिक प्रणाली है, जिसके द्वारा मानव-रक्त कार्बन रहित तथा ऑक्सीजन से प्रपूरित हो जाता है। इस अतिरिक्त ऑक्सीजन के अणु जीवन प्रवाह में रूपांतरित होकर मस्तिष्क और मेरुदंड के चक्रों को नव शक्ति से पुन: पूरित कर देते हैं। प्राकृतिक नियम या माया के अंतर्गत मनुष्य की प्राण शक्ति का प्रवाह बहिर्विश्व की ओर होता है, जिससे उस शक्ति का प्रवाह इंद्रियों के दुरुपयोग के कारण व्यर्थ ही खत्म हो जाता है। मानसिक प्रक्रिया प्राण शक्ति अंतर्जगत की ओर बहती है और मेरुदंड-स्थित सूक्ष्म शक्तियोंं के साथ पुन: मिल जाती हैं। इस प्रकार प्राण शक्ति के प्रबलीकरण द्वारा योगी के शरीर तथा मस्तिष्क के कोष आध्यात्मिक अमृत से पुनर्नवीन हो जाते हैं। परमहंस जी ने कहा था, क्रिया योग गणित की तरह काम करता है। इसके परिणाम सुनिश्चित हैं। 

झारखंड में भी पगड़ी बदल कर हीरा लूटा गया था

भारत में संधि के अन्तर्गत पगड़ी या मुकुट बदलने की परंपरा रही है। इसी परंपरा के अन्तर्गत कोहीनूर हीरा भारत से बाहर चला गया। जो आज इंग्लैड की महारानी के मुकुट पर लगा है।

पगड़ी बदल कर हीरा प्राप्त करने का वाक्या झारखंड में भी हुआ था जिसके बारे में कम लोगों को ही मालूम है। मजेदार बात है कि दोनों वाक्ये में और भी समानतायें हैं। पहले कोहीनूर की बात कर लेते हैं। नादिर शाह ने जब दिल्ली पर हमला किया तो उस समय तक मुगल शासन कमजोर पड़ चुका था। मुगल बादषाह मुहम्मद शाह को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। काफी हीरे जवाहरात लूट लिए गए। खून की नदी बह गई। अंत में मजबूरन मुहम्मद शाह ने संधि का प्रस्ताव रखा। संधि के शर्तो में यह बात भी थी कि अगर जरूरत पड़ी तो नादिर शाह, मराठा शक्तियों के खिलाफ मुहम्मद शाह को सहायता प्रदान करेगा। इस बीच नादिर शाह को पता चला कि सबसे कीमती कोहीनूर हीरा मुहम्मद शाह ने अपनी पगड़ी में छिपा रखा है। नादिर शाह ने पगड़ी बदलने की रस्म पर जोर डाला। पगड़िया बदली गई। इस तरह कोहीनूर हीरा नादिर के हाथ में पड़ गया जो अन्ततः कई हाथों से होते हुए इंग्लैड के महारानी के पास पहुँच गया।

अब झारखंड की बात पर आते हैं। 12 अगस्त 1765 ई॰ को मुगल बादषाह शाह आलम द्वितीय से ब्रिटिष ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल, बिहार व उ़ड़ीसा की दीवानी (राजस्व प्रसाशन) मिली। इसी के साथ अंग्रेजों को झारखण्ड में पांव जमाने का मौका मिला। तब तक पलामू, झारखंड का राजा करीब-करीब स्वतंत्र था।

28 जनवरी 1771 ई॰ में कैप्टन कैमक झारखंड प्रवेष करता है। पलामू के चेरो राजा चित्रजीत राय पलामू के नये किला को परित्याग कर पुराने किले में शरण लेते हैं। पुराने पलामू किला को अंग्रेज सेना घेर लेती है। भयंकर गोलाबारी होती है। चेरो राजा चित्रजीत राय पराजित होते हैं तथा अपने दीवान जयनाथ सिंह के साथ रामगढ़ भाग जाते हैं।

राजगद्दी का एक अन्य दावेदार गोपाल राय अंग्रेजों के साथ संधि कर लेता है। 1 जुलाई 1771 को गोपाल राय को पलामू का राजा घोषित किया जाता है। इसके बाद की घटना के बारे में ब्रैडले-बर्ट अपनी किताब “छोटानागपुर, ए लिटल नोन प्राविन्स आफ दी एमपायर ;(Chotanagpur, a little known Province of the empire) के 17वें पृष्ठ पर लिखते है” कैप्टन कैमक अपनी सेना के साथ पलामू के राजा से मिलते हैं। राजा अपने को अंग्रेज सरकार के अधीनस्थ मानते हुए मराठा शक्तियों के विरूद्ध अंग्रेजों का साथ देने के वचन के साथ तीन हजार (3000) रूपया नजराना देता है। कैमक कम्पनी के लिए अपना काम पूरा करने के बाद अपने लिए भी कुछ प्राप्त करना चाहता है। राजा के पगड़ी में जड़े हीरों को देखकर वह दोस्ती के प्रतीक के तौर पर पगड़ी बदलने की रस्म की बात करता है। राजा न कहने की स्थिति में नहीं था। अन्ततः ये हीरे कैप्टन कैमक के हस्तगत हो जाता है।”
असीत कुमार



चुआड़ विद्रोह के महानायक गंगा नारायण सिंह

मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को 12 अगस्त, 1765 को बिहार, बंगाल, उड़ीसा की दीवानी सौंप दी। दीवानी यानी राजस्व का अधिकार। इसी साल अंग्रेजों का प्रवेश झारखंड में हुआ था। झारखंड में उस समय कई छोटी-बड़ी रियासतें थीं। छोटानागपुर में नागवंशी, पलामू में चेरो, हजारीबाग-रामगढ़ भी राजवंश था। संताल परगना में भी रियासतें थीं। अंग्रेजों ने प्रवेश करने के साथ-साथ राजस्व का अधिकार मिलने के बाद लगान वसूलना शुरू किया। इसका विरोध रियासतों ने शुरू किया। इनमें असंतोष भी बढऩे लगा। जमींदार और स्थानीय आदिवासी समाज भी विरोध में उतर गया। चार साल बाद बड़ा भूम एवं घाटशिला में भूमिजों ने लगान  बढ़ाए जाने का विरोध किया। भूमिज भी मुंडा आदिवासी परिवार से ही आते हैं। लेकिन कालांतर में भूमिज हिंदू धर्म से भी प्रभावित हुए और उनके नामों में यह प्रभाव देख सकते हैं। भूमिज को चूंकि बंगाली चुआर या चुआड़ कहते थे, इसलिए, इसे चुआड़ विद्रोह भी कहा जाता है। भूमिजों के इस पहले विद्रोह को दबाने के लिए लेफ्निेंट नन को भेजा गया। इस बीच सिंहभूम में अन्य भूमिज भी इस विद्रोह में शामिल हो गए। उन विद्रोहियों ने घाटशिला पर आक्रमण कर दिया। कंपनी सरकार के सिपाहियों को भागकर नरसिंह गढ़ में शरण लेनी पड़ी। 
कैलापाल के जागीरदार सुबह सिंह,दामपाड़ा के सरदार जगन्नाथ पातर और धदका के सरदार श्याम गंजन भूमिज विद्रोह के प्रमुख थे। विद्रोह के कारण कंपनी सरकार को अपने कदम पीछे करने पड़े। इसके बाद शांति बनी रही। लेकिन कंपनी सरकार ने फिर जब उत्पात शुरू किया तो 1832-33 में धालभूम, बड़ा भूम व पाटकुम परगनों में गंगा नारायण सिंह के नेतृत्व में भूमिजों ने व्यापक विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह बड़ा भूम के राजा उसके पदाधिकारियों, विशेषकर उसका दीवान माधव सिंह व कंपनी सरकार के खिलाफ था। 20 अप्रैल, 1832 को गंगा नारायण सिंह ने अपने चचेरे भाई व दीवान माधव सिंह की हत्या कर दी। इस हत्या के साथ विद्रोह की शुरुआत हुई।
बड़ाभूम भी रियासत थी। यहां के राजा विवेक नारायण सिंह की दो रानियां थीं। दो रानियों के दो पुत्र थे। 18वीं शाताब्दी में राजा विवेक नारायण सिंह की मृत्यु के बाद दो पुत्रों रघुनाथ नारायण सिंह  व लक्ष्मण सिंह के बीच उत्तराधिकार का झगड़ा हुआ। अंग्रेजों ने रघुनाथ सिंह को राजा बना दिया। ये छोटी रानी के पुत्र थे। भूमिज परंपरा के अनुसार बड़ी रानी के बड़े पुत्र को ही उत्तराधिकार प्राप्त था। कंपनी सरकार की इस करतूत के कारण पारिवारिक विवाद शुरू हो गया। बड़ी रानी के पुत्र लक्ष्मण सिंह थे और स्थानीय भूमिज सरदार लक्षमण सिंह का समर्थन करते थे। परन्तु रघुनाथ को प्राप्त अंग्रेजों के समर्थन और सैनिक सहायता के सामने वे टिक नहीं सके। लक्ष्मण सिंह को राज्य बदर किया गया। जीवनाकुलित निर्वाह के लिए लक्ष्मण सिंह को बांधडीह गांव का जागीर दे दिया गया। यहां उनका काम सिर्फ बांधडीह घाट का देखभाल करना था।
लक्ष्मण सिंह की शादी ममता देवी से हुई। अंग्रेज के अत्याचार की वह कट्टर विरोधी थी। लक्ष्मण सिंह के तीन पुत्र हुए। गंगा नारायण सिंह, श्यामकिशोर सिंह और श्याम लाल सिंह। ममता देवी अपने दोनों पुत्र गंगा नारायण सिंह तथा श्याम लाल सिंह को अंग्रेजों के खिलाफ लडऩे के लिए सदैव प्रोत्साहित करती थीं। गंगा नारायण सिंह जंगल महल में गरीब किसानों पर शोषण, दमनकारी संबंधी कानून के विरूद्ध अंग्रेजों से बदला लेने के लिए कटिबद्ध हो गए। उन्होंने अंग्रेजों की हर नीति के बारे में जंगल महल के हर जाति को समझाया और लडऩे के लिए संगठित किया। इसके कारण सन् 1768 ईस्वी में असंतोष बढ़ा जो 1832 ईस्वी में गंगा नारायण सिंह के नेतृत्व में प्रबल संघर्ष का रूप ले लिया। इस संघर्ष को अंग्रेजों ने गंगा नारायण हंगामा कहकर पुकारा है और वहीं चुआड विद्रोह नाम से इतिहासकारों ने लिखा है। पुरुलिया गजेटियर में भी इसे हंगामा ही करार दिया है। कंपनी सरकार के खिलाफ उन्होंने गोरिल्ला वाहिनी का गठन किया, जिसे हर जाति का समर्थन प्राप्त था। धालभूम, पातकूम, शिखरभूम, सिंहभूम, पांचेत, झालदा, काशीपुर, वामनी, वागमुंडी, मानभूम, अम्बिका नगर, अमीयपुर, श्यामसुंदरपुर, फुलकुसमा, रानीपुर तथा काशीपुर के राजा-महाराजा तथा जमीनदारों ने गंगा नारायण सिंह को समर्थन दिया। गंगा नारायण सिंह ने बड़ाभूम के दीवान तथा अंग्रेज दलाल माधव सिंह को वनडीह में 2 अप्रैल, 1832 ईस्वी को आक्रमण कर मार दिया था। उसके बाद सरदार वाहिनी के साथ वराहबाजार मुफ्फसिल का कचहरी, नमक का दारोगा कार्यालय तथा थाना को आगे के हवाले कर दिया।
बांकुडा के कलेक्टर रसेल, गंगा नारायण सिंह को गिरफ्तार करने पहुंचा। परन्तु सरदार वाहिनी सेना ने उसे चारों ओर से घेर लिया। सभी अंग्रेजी सेना मारी गयी। किन्तु रसेल किसी तरह जान बचाकर बांकुड़ा भाग निकला। गंगा नारायण सिंह का यह आंदोलन तूफान का रूप ले लिया था, जो बंगाल के छातना, झालदा, आक्रो, आम्बिका नगर, श्यामसुन्दर, रायपुर, फुलकुसमा, शिलदा, कुईलापाल तथा विभिन्न स्थानों में अंग्रेज रेजीमेंट को रौंद डाला। उनके आंदोलन का प्रभाव बंगाल के पुरूलिया, बांकुडा के वर्धमान और मेदिनीपुर जिला, बिहार के सम्पूर्ण छोटानागपुर (अब झारखंड), उडीसा के मयूरभंज, क्योंकझर और सुंदरगढ आदि स्थानों में बहुत जोरों से चला। फलस्वरूप पूरा जंगल महल अंग्रेजों के काबू से बाहर हो गया। आखिरकार अंग्रेजों को बैरकपुर छावनी से सेना भेजना पड़ा जिसे लेफ्टिनेंट कर्नल कपूर के नेतृत्व में भेजा गया। सेना भी संघर्ष में परास्त हुआ। इसके बाद गंगा नारायण और उनके अनुयायियों ने अपनी कार्य योजना का दायरा बढ़ा दिया। बर्धमान के आयुक्त बैटन और छोटानागपुर के कमिशनर हन्ट को भी भेजा गया किन्तु वे भी सफल नहीं हो पाए और सरदार वाहिनी सेना के आगे हार का मुंह देखना पड़ा।
अंग्रेजों ने गंगा नारायण सिंह का दमन करने के लिए हर तरह से कोशिश की, लेकिन अंग्रेज टिक न सके। उस समय खरसावां के ठाकुर चेतन सिंह अंग्रेजों के साथ साठ-गांठ कर अपना शासन चला रहा था। गंगा नारायण सिंह ने ठाकुर चेतन सिंह के किले पर सात फरवरी, 1833 को हमला बोल दिया, परंतु इस लड़ाई में वे वीर गति को प्राप्त हुए। उनका सिर काटकर कप्टन थॉमस विलकिंसन के पास भेज दिया गया। कंपनी सरकार की ओर से गंगा नारायण सिंह पर पांच हजार रुपये का इनाम था। इस तरह चुआड़ विद्रोह, भूमिज विद्रोह के महानायक वीर गंगा नारायण सिंह अपना अमिट छाप छोड़कर अमर हो गए, लेकिन उनका बलिदान निरर्थक नहीं गया। अंग्रेजों को झुकना पड़ा। कई तरह की रियायतें देना स्वीकार किया।

राधाकृष्ण और उनकी ‘मूल्य’

-संजय कृष्ण   हिंदी कथा साहित्य को बहुविध ढंग से समृद्ध करने वाले रांची के राधाकृृष्ण साहित्य की दुनिया में अब अपरिचित नाम हो गए हैं। पुरान...