16 वीं शताब्दी का नवरतन गढ़ किला

 रांची से दक्षिण-पश्चिम में 40 मील दूर डोयसा नगर अब एक गांव की शक्ल ले चुका है। गुमला जिले के सिसई थाने का यह गांव कभी नागवंशियों की राजधानी थी। पर, आज उपेक्षा का दंश झेलते-झेलते खंडहर में तब्दील हो चुका है। यह सिर्फ नवरतन गढ़ किले की मार्मिक कहानी नहीं है। राज्य में फैले अनेक किले अपनी इस दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। पलामू के चेरो राजाओं का किला हो या फिर कोई ऐतिहासिक मंदिर। राज्य न इनके रख-रखाव को लेकर गंभीर रहा है न इन स्थलों को पर्यटन स्थल विकसित करने को ले गंभीर। यह अलग बात है कि सैकड़ों सालों से ये प्रकृति के थपेड़ों को सहते आज भी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
नवरतन गढ़ का किला भी इनमें से एक है। करीब एक सौ एकड़ में फैला यह किला नागवंशियों द्वारा मुगल स्थापत्य का पहला राजमहल माना जाता है। अपने अनूठे मौलिक सौंदर्य व स्थापत्य कला के कारण खास पहचान बनाने वाले इस राजमहल का निर्माण 16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजा दुर्जन शाल ने कराया था। दुर्जन शाल ग्वालियर के किले में 12 साल तक बंद था। बंदी का कारण लगान नहीं देना था। इब्राहिम खान 1615 में बंदी बनाया था। बाद में हीरे का पारखी होने के कारण तत्कालीन इब्राहिम खान ने दुर्जन को 1627 में आजाद कर दिया। तब नागवंशी राजा की राजधानी खुखरा में थी। इब्राहिम खान ने दुर्जन के साथ एक ऐसे व्यक्ति को भी लगा दिया, जो आर्किटेक था। इसके पहले नागवंशी राजा अपनी प्रजा के साथ घुल-मिलकर रहते थे। प्रजा से थोड़ा बड़ा इनका आवास होता था। महलों की कल्पना झारखंड में नहीं थी। दुर्जन शाल को उस आर्टिटेक ने ही मुगल सम्राटों के महलों के जैसे एक महल निर्माण का सुझाव दिया। दुर्जन ग्वालियर में महलों की शानोशौकत देख चुके थे। सो, वह मान गए। महल निर्माण के लिए उन्होंने एक नए स्थान का चयन किया। डोयसा नामक गांव में किले की नींव रखी गई। इस तरह वहां नवरतन गढ़ नामक किले का निर्माण किया गया। सौ एकड़ से ऊपर फैले इस किले को झारखंड का हंपी कहा जाता है।
बदलती रही है राजधानी
नागवंशियों की राजधानी हमेशा बदलती रही है। नागवंशी देश का एकमात्र ऐसा राजवंश है, जिसकी पीढिय़ां आज भी जीवित हैं। इनका इतिहास प्रथम शताब्दी से शुरू होता है। इनके पहले राजा थे फणिमुकुट राय। चौथे राजा मदन राय तक राजधानी सुतियांबे में रही, किंतु पांचवें राजा प्रताप राय ने अपनी राजधानी सन् 307 में चुटिया ले गए। 29 वें राजा भीमकर्ण ने 1079 में खुखरा को राजधानी बनाया। 45 वें राजा दुर्जनशाल ने अपनी राजधानी डोयसागढ़ में बनाई। 1514 में यहां महाराज देवशाह, जो 48 वें राजा थे, ने एक गढ़ का निर्माण कराया, जिसे नवरतन गढ़ कहा गया। इसका निर्माण 1585 में हुआ। पुन: नवरतन गढ़ को छोड़कर 51 वें राजा यदुनाथ शाह को 1707 में पालकोट आना पड़ा। रातू उनकी अंतिम राजधानी है। यह गढ़ पांच मंजिला है। और प्रत्येक मंजिल पर नौ कमरे हैं। गढ़ के चारों ओर मंदिर थे। एक मंदिर में सुरंग थी जो गढ़ तक जाती थी। राज्य म्यूजियम के अध्यक्ष डा. सरफुद्दीन कहते हैं कि पांच मंजिल इस किले का एक मंजिल अंदर धंस गया है। इसलिए ऊपर चार मंजिल की दिखाई पड़ता है। किले के चारो ओर सुरक्षाकर्मियों के कोटर बने हुए हैं। रानी के रहने के लिए अलग किला है। उनके नहाने के लिए तालाब भी है। किले से तालाब तक एक सुरंग भी है। वे कहते हैं, इस किले को वल्र्ड हेरिटेज में शामिल करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। वहीं रांची विवि के मानवविज्ञानी डा. बीएन सहाय गांव में इस किले को देख अचंभित हैं। कहते हैं, इसकी देखभाल ही नहीं, इसका पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए। यह राज्य ही नहीं, देश की धरोहर है। चूना-सुर्खी और लाहौरी ईंटों से बना यह किला मुगल काल के स्थापत्य को भी दर्शाता है। 

सच से रूबरू कराती 'कैसा सचÓ

नारी मुक्ति का सवाल पिछले दो दशकों से साहित्य के केंद्र में है। स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व को लेकर संघर्ष बहुत पुराना है। स्त्री की पराधीनता की बातें बहुत पहले से होती आई हैं। पहले जो दबी-दबी सी आवाज सुनाई देती थीं, उसने अब मुखरता हासिल कर ली है। कभी-कभी स्त्री मुक्ति की बातों के पीछे देह मुक्ति का सवाल छिपा रहता है। देह मुक्ति ही नारी मुक्ति का पर्याय भी बन जाता है। तमाम शोर-शराबे के बावजूद इस विज्ञापनी दुनियां में नारी मुक्ति के नाम पर वह और जकड़ती जा रही है। कुछ नारीवादी लेखिकाएं नारी मुक्ति के नाम पर शोर ज्यादा मचाती हैं तो कुछ अपने को स्थापित करने के लिए काफी अपने को खोलकर और खुलकर लिखने में विश्वास करती हैं। पर, आशा प्रभात का पहला कहानी संग्रह इस तरह के आग्रहों (दुराग्रहों) से सर्वथा मुक्त है। यहां नारी मुक्ति के सवाल तीखे ढंग से उठाए गए हैं, लेकिन कबीर की भाषा में नहीं, तुलसी की भाषा में। पढ़ते समय दिखाई तो चिंगारी की तरह पड़ता है पर मन के भीतर शोले का एहसास पैदा करता है। कुल नौ कहानियों के इस संग्रह में आखिरकार नारी ही केंद्र में है। उसके सपने और उसकी आकांक्षा है। मुक्ति की छटपटाहट है तो दहलीज के दलदल से निकल अपना रास्ता तलाशने का सुकून भी। बाढ़ की विभिषिका में भी स्त्री का संघर्ष बहुत सादगी और संजीदगी से एक सर्वथा नए दृष्टिकोण के साथ उभरता है।  
संग्रह की पहली कहानी 'एक्वैरियमÓ हमारे समाज की पतनशीलता पर टिप्पणी करती है, जहां पुरुष के लिए स्त्री महज देह होती है। लेखिका की मान्यता है कि 'महान से महान पुरुष पहले मात्र एक पुरुष होता है बाकी सब भ्रम?Ó आधुनिक समाज की आधुनिकता में पुरुष वहीं खड़ा हैं, जहां हजारों साल पहले था। उसके लिए रिश्ते बेमानी हो जाते हैं। कहानी की नायिका श्वेता अपने पिता के दोस्त के यहां छुट्टियां मनाने गई है, लेकिन एक दिन '...बिस्तर पर वे थे, पापा के विश्वास...मेरी आस्था और उनकी इमेज की धज्जियां उड़ रही थीं। लगा, इस पल वे मात्र पुरुष थे और उनके लिए मैं एक स्त्री...। देवदूत के चेहरे पर शैतान का चेहरा उग आया था।Ó
'पेट प्रलयÓ बागमती नदी के बाढ़ की विभीषिका के साथ हमारे विकास की अवधारणा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कहानी, रेणु के रिपोर्ताज कुत्ते की आवाज की याद दिलाती है। बिहार के कई इलाके बाढ़ के विनाश से हलकान होते रहे हैं। बागमती अपने साथ प्रलय लेकर आती है। एक ओर बाढ़ का भीषण बहाव तो दूसरी ओर भूख से आकुल पेट। भैरोकाका भूख को बर्दाश्त नहीं कर पाते और भरी जवानी में अपने बच्चों को छोड़ चले जाते हैं। किस्मत ऐसी कि उन्हें उस बाढ़ में उन्हीं की धोती में बांधकर प्रवाहित कर दिया जाता है। कफन, लकड़ी और चिता भी नसीब नहीं। अत्यंत कारुणिक दृश्य। निहारती हुई पत्नी की पथराई आंखें...बहुत कुछ कह जाती हैं।
'इसे भ्रम ही रहने दोÓ कहानी एक ही समय के दो चेहरे को रेखांकित करती है। दो रिक्शा दो चरित्र। एक का वसूल सही भाड़ा लेने में तो दूसरे का विश्वास अधिक से अधिक भाड़ा वसूल करने में। ऐसे चरित्र हम अपने आस-पास फैले समाज में देख सकते हैं। ऐसे लोगों पर प्राय: कहानियां नहीं लिखी जातीं। लेखिका ने इस उपेक्षित प्राणी पर कलम चलाकर अपनी संवेदना का विस्तार किया है।
'सलाखों के पीछेÓ में हम देखते हैं कि परिवर्तन और क्रांति बहुत आहिस्ता-आहिस्ता भी होते हंै। बिना किसी शोर-शराबे के। बदलाव की यह आहट सुनाई नहीं देती, लेकिन इसका चुप्पा शोर बहुत परेशान करता है। बारह वर्ष के दांपत्य, घर-गृहस्थी, समाज और संस्कारों में सिमटे, सांस लेते, व्यस्तताओं को चक्के की तरह पैरों में बांध घूमती रहने वाली पति की बेवफाई बर्दाश्त नहीं कर पाती। पति डा. महेश बत्रा का जब कामुकता और अपने पंद्रह साल छोटी लड़की के दैहिक आकर्षण में फंसते हैं तो वह बर्दाश्त कर लेती है। लेकिन जब वह मातृत्व पर भी डाका डालती है तो अचला बर्दाश्त नहीं कर पाती। तीन-तीन बच्चों की मां अचला अपने पति को उसी की भाषा में जवाब देती है। जब वह अपने पति से कहती है, बधाई हो, मैं मां बनने वाली हूं। डा. बत्रा का कर्ज वह ब्याज समेत लौटा देती है। सचमुच 'क्या इतना अपरिपक्व होता है मनुष्य, जो हमेशा अपने से छोटी, अपरिपक्व, कच्ची उम्र की औरत की कामना करता है।Ó प्रश्न फिर वही। क्या मनुष्य के लिए स्त्री मात्र देह है?  
हालांकि इन कहानियों में स्त्री मात्र देह नहीं है। उसका हर रूप यहां दर्ज है। 'हौसलाÓ कहानी भले ही एक बेरोजगार युवक की कहानी है, जो बाद में एक मंदिर के सामने पूजा-मिष्ठान की दुकान खोल लेता है। पर, कहानी में एक स्त्री की संवेदना को बखूबी उभारा गया है। प्रतियोगिता की तैयारी के समय एक परिवार से उसकी निकटता बढ़ती है। उसे नौकरी नहीं मिलती तो वह एक तीर्थ स्थल पर जाकर दुकान खोल लेता है। अचानक वह दंपति दर्शन करने जाता है तो उसकी मुलाकात वहां होती है। '...नाहक परेशान रहे आप लोग। मैं इतना बुजदिल हीं कि संघर्षों से हार कर खुदकुशी कर लेता।Ó
अत्यंत रोचक व नाटकीय कहानी है 'वह दिन।Ó छोटी है पर मजेदार। पटना पुस्तक मेले से शाम को लौटते हुए एक महिला को नाहक एक आदमी मिल जाता है। कि मैं सचिवालय में काम करता हूं, कि मैं आपको जानता हूं, कि आइए चाय पी लीजिए न कि मुझे भी उधर ही चलना है? कि रिक्शे पर साथ बैठ जाता है। किसी महिला को कोई अपरिचित आदमी मिल जाए तो क्या कर सकती है? नायिका उस दिन को वह नहीं भूल पाती। 
'आदम और हव्वाÓ। सिद्धार्थ और शिप्रा। प्रेम की चाहत। पर, सिद्धार्थ, जीनियस नहीं खोखला साबित होता है। प्रेम विश्वास की मांग करता है। सिद्धार्थ के पास यही नहीं था। इस कहानी में आज का सच व्यंजित है।
'अपने-पराएÓ की पहचान मुसीबत में होती है। यह कहानी घर-घर की है। मां को जब फाजिल मार देते है तो बेटी भागी-भागी अपनी मां को देखने पहुंचती है लेकिन बेटे और बहू के लिए बीमारी बोझ बन जाती है। ऐसे चरित्र हमारे समाज में अब बढ़ते जा रहे हैं। परिवार का मतलब पत्नी तक सीमित हो गया है। जहां मां-बाप के लिए वृद्धाश्रमों में ही जगह बचा है। जहां वे घर पर हैं, उनकी फिक्र किसे? पर, कहानी एकतरफा निर्णय नहीं सुनाती। यह विषय 'कैसा सचÓ में और विस्तार पाती है।
इस कहानी में भी लेखिका ने एक मां के संघर्ष को दिखाया है। पति की बीमारी में जमीन का बिकना। फिर, मृत्यु। जवान होती बेटी के ब्याह की चिंता अलग से। ऐसे में मां के सामने क्या विकल्प? कहां से लड़का ढूंढे? पेट की विकलता यह सोचने पर मजबूर करती कि, '...पैसा वाला, भले ही लड़का दुहाजू या दो तीन बच्चे का बाप की क्यों न हो?Ó क्या कोई मां इस स्तर पर जा सकती है कि वह अपने बेटी की ब्याह दो-तीन बच्चे के पिता से कर दे? गरीबी को वह बर्दाश्त नहीं कर पाती। ऐसे में तो और नहीं, जहां नवेली बहुओं को आधा पेट खाना दिया जाता हो, ताकि वह दिन में दिशा के लिए न जा सके। पर, एक रिश्ता आ जाता है और बेटी अपनी मां को मना ही लेती है। बेटी कहती है 'शहर के घर में पैखाना तो होता है मां!Ó शादी तो हो जाती है। दामाद दिल्ली में कमाता है। एक दिन सूचना मिलती है कि मां आ रही है। अब बेटी कैसे बताए कि शौचालच के लिए बाहर जाना पड़ता है। आखिर, यह कैसा सच था?
'परदादारीÓ कहानी में रेड लाइट एरिया के जरिए स्त्रियों के विभिन्न चरित्रों को संजोया गया है। एक ओर खाते-पीते घरों की महिलाएं एनजीओ के जरिए समाज सेवा का काम करती हैं। तो दूसरी ओर ऐसी भी स्त्रियां हैं जो भूख के लिए जिस्म का सौदा करती है। पर परदादारी वहां भी है।
अंतिम कहानी 'ठेसÓ में स्त्री के विद्रोही तेवर को सशक्त ढंग से उठाया गया है। शादी के एक माह बाद ही ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं कि सोमा तलाक लेने का मन बना लेती है क्योंकि उसका पति सैडिस्ट है, पर उत्पीड़क है, सेक्स के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। सोमा तलाक लेकर एक नई जिंदगी शुरू करती है।
इन कहानियों से गुजरते हुए यह अहसास होता है कि क्रांति आहिस्ते-आहिस्ते भी हो सकता है। शोर-शराबे के बिना। ये कहानियां ऐसी हैं, जैसे हम दूर से समुद्र का सपाटपन देखते हैं, पर नजदीक जाने पर उसकी लहरे दिखाई पड़ती हैं। आशा प्रभात ने ग्रामीण समाज की विसंगतियों, आत्महंता लोक परंपराओं के साथ आदमी की संवेदनहीनता को भी लक्षित किया है। कहीं कहीं गंवई भाषा के जरिए उस समाज से पाठक को जोडऩे की कोशिश करती हैं, पर अधिकांश कहानियां शहरी मध्यवर्ग से जुड़ी हैं। कहानियों की अधिकतर नायिकाएं कुंभ राशि की हैं। लेखिका को ज्योतिष का अच्छा ज्ञान है। यह ठेस कहानी से भी बोध होता है। 
हंस में प्रकाशित

पलामू का ऐतिहासिक किला

बेतला के घने जंगलों के बीच पलामू का ऐतिहासिक किला अपनी बेबसी और उपेक्षा के दंश को झेलता आज भी पूरी शानौ शौकत से खड़ा है। उपेक्षा के बावजूद उसमें एक स्वाभिमान है, जिसे उसके पास जाकर ही महसूस किया जा सकता है। निर्जीव पत्थर भी अपनी कहानी बयां करते हैं, अपने सुख-दुख आने-जाने वालों से साझा करते हैं, इतिहास के बीते तारीखों को वर्तमान में खींच कर ले आते हैं। इसलिए, ये पत्थर महज पत्थर नहीं होते, इनमें भी दर्द होता है। एहसास होता है। पलामू का यह पुराना किला बहुत कुछ कहता है, पर अपने बारे में बहुत कुछ नहीं कहता। इसलिए, इस किले का निर्माण कब हुआ था, किसने कराया था आदि प्रश्न इतिहास के गह्वïर में ही कैद हैं। जिन लोगों ने इस पर से पर्दा उठाने की कोशिश की, वह इतना ही बता सके कि इसका निर्माण 15 वीं शताब्दी के आस-पास हुआ होगा। किसने कराया-ठीक-ठीक पता नहीं।  लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज तथ्यों से कुछ अनुमान लगाया जा सकता है।
पलामू के बारे में ठीक-ठीक इतिहास कुछ नहीं बताता। लेकिन किंवदंतियों और पुराने लोगों की स्मृतियों और यहां के खंडहरों से तथ्य की जो रोशनी छनकर आती है वह यही बताती है कि यहां सबसे पहले कोल जातियों का निवास था। इसके बाद द्रविड़ आए। फिर रकशेल-चेरों का आगमन हुआ। इसी समय मुगलों का भी प्रवेश और इसके बाद अंग्रेज आए। वैसे, यहां का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से होते हुए रामायण और महाभारत से भी जुड़ता है। रामायण काल को लेकर यहां एक कथा प्रचलित है कि यह राजा दशरथ के अधीन था और रामजी के विवाह के अवसर पर उन्होंने से यहां के बजनियों (बाजा बजाने वाले) को बक्सीस में दे दिया था। महाभारत काल के अवशेष तो नहीं मिलते, लेकिन डालटनगंज के उत्तर-पश्चिम में करीब 40 मील पर कोयल नदी के किनारे एक पहाड़ी पर भीम चूल्हा नाम की जगह है। कहते हैं कि पांडवों ने अज्ञातवास में कुछ समय यहां व्यतीत किया था। भीम ने ही उस पहाड़ी पर चूल्हे का निर्माण किया था, इसलिए उसे भीम चूल्हा कहा जाता है। इसके अलावा और कुछ नहीं मिलता, जिससे महाभारत काल पर व्यापक प्रकाश पड़ सके।
पर, कुछ प्राचीन जातियों के बारे में अवश्य जानकारी हासिल होती है। उनमें द्रविड़ कुल के मार्ह और उरांव हैं। उरांवों का संबंध मोहनजोदड़ो सभ्यता से भी है। यहां कर्नाटक की ओर होते हुए इन जातियों ने बिहार के रोहतास में आकर बसे। यहां इनके आगमन की तिथि अज्ञात है। चौदहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पठानों ने रोहतास पर जब वर्चस्व स्थापित कर लिया तो ये पलामू की ओर खिसक आईं। उरांवों के लोकगीतों में इनका पूरा इतिहास दर्ज है। यहां से भी बाद में रांची की ओर प्रस्थान कर गईं और आज उसके समीपवर्ती जिलों में, जंगलों में इनका निवास है।  
मार्ह भी द्रविड़ कुल की ही एक शाखा है। इन लोगों ने जंगलों को काटकर उन्हें कृषि योग्य बनाया, बस्तियां बसाईं, घर और गढ़ों का निर्माण किया। इस तरह वे सारे पलामू में छा गए। उरावों ने रोहतासगढ़ किले का निर्माण किया था। उनके लोकगीतों में 'गढ़रूइदासÓ का बार-बार जिक्र आता है। इनका निवास उरांवों से पुराना है। माना जाता है कि पलामू में इनका प्रवेश दो हजार साल पहले हुआ था। मार्ह आगे चलकर अंग्रेजों के गजेटियरों में 'मारÓ और 'मालÓ हो गया। इनके बनाए गए मकानों, गढ़ों, बस्तियों के खंडहर पलामू में बिखरे हुए हैं। बेतला में घने जंगलों में ओरंगा नदी के निकट बना पलामू किला इन्हीं का निर्माण कहा जाता है। ओरंगा शब्द भी द्रविड़ कुल का ही है। इसके बाद यहां रकेशेल राजपूतों का वर्चस्व स्थापित हुआ और मर्हा भगा दिए गए। रकशेलों का इतिहास बताता है कि इनका दल गया जिले के कुटुंबा-मटपा की राह से, छपरा की ओर गया और कुछ पलामू की उत्तरी-पूरबी सीमा महाराजगंज-हरिहरगंज के मार्ग से होकर पलामू के देवगन और उसके आस-पास फैल गए।
रकशेलों के बारे में रायबहादुर डा. हीरालाल ने 'मध्यप्रदेश का इतिहासÓ में कवि रामचरण भाट की हवाले से बताया है कि रकशेल वंश का आरंभ सन 196 से होता है और इस वंश के वर्तमान राजा रामानुजशरण सिंह तक 114 पीढिय़ों ने राज किया। यह भी कहा गया है कि इस वंश का मूल पुरुष पलामू के कुंडलिया से सन 194 में सरगुजा आया था सने यहां के द्रविड़ मुखिया (राजा) को भगाकर अपना राज्य स्थापित कर लिया। रकशेल राजपूतों की एक शाखा था। यह अर्कशेल का अपभ्रंश है। अर्क यानी सूर्य। इन्हें सूर्यवंशी राजपूत भी कहा जाता है। पलामू में इनका आगमन 13 वीं शताब्दी के आस-पास हुआ माना जाता है। इन्होंने भी गढ़, किले, तालाब, कोट का निर्माण किया। पलामू किले का सुधार और निर्माण रकशेलों ने भी किया। पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में मानसिंह पलामू की गद्दी पर बैठे। उस समय रकशेलों की दो राजधानियां थीं-एक बेतला की ओरंगा नदी का तट पलामू गढ़, मानगढ़, तमोलगढ़, दूसरा पलामू की उत्तरी सीमा के छोर पर चकले देवगन में देवगढ़। पलामू में रकशेलों ने कब तक राज किया, कौन-कौन राजा हुए, इसकी प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। इस वंश के अंतिम राजा मानसिंह का पता इसलिए चलता है कि इन्हीं से चेरो राजा ने पलामू को अपने अधिकार में लिया था।  
चेरो का काल पलामू के लिए स्वर्णकाल था। इनकी उत्पत्ति च्यवन ऋषि से बताई जाती है। इस जाति से सबसे पहले नेपाल की तराई कमाऊं प्रांत में अपना राज्य स्थापित किया। इसके बाद इस वंश ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने राज्य कायम किए। कालांतर में इनके वंश के भगवंत राय और पूरनमल पलामू पहुंचे। जिस समय ये पलामू पहुंचे, उस समय पलामू किले पर राजा मानसिंह का अधिकार था। दोनों ने मानसिंह के दरबार में नौकरी कर ली। दोनों की सूझ-बूझ और बहादुरी से प्रसन्न होकर इन्हें सेना की कमान सौंप दी गई। लेकिन एक विश्वासघात ने पलामू का तकदीर ही नहीं, इतिहास भी बदल गया। हुआ यह कि राजा मान सिंह के पुत्र का विवाह सरगुजा में तय हुआ। वे बारात लेकर सरगुजा चले गए और किले का भार अपने सरदार भगवंत राय पर छोड़ गए। मौका पाक भगवंत राय ने मानसिंह के पूरे परिवार को मार डाला और खुद राजा बन बैठा। सेना लेकर वह आगे बढ़ा और बारात वापस लेकर लौट रहे मान सिंह का मुकाबला किया। मानसिंह हार गए और सरगुजा लौट गए। वहां मान सिंह ने वही किया जो भगवंत ने उनके परिवार के साथ किया। उन्होंने सरगुजा के राजा की हत्या कर राज्य अपने अधीन कर लिया और पूरनमल को अपना मंत्री बना लिया। यहीं से रकशेल राजा का अंत और चेरो राजवंश का उदय होता हैं।
कहा जाता है कि चेरो राजाओं की सात पीढिय़ों (1613 से 1821 तक)ने पलामू पर राज किया। इसके संंंस्थापक थे भगवंत राय और अंतिम राजा हुए चुरामन राय। ये नि:संतान थे। इस कुल में सबसे प्रतापी राजा मेदिनी राय हुए। इन्हीं के नाम पर डालटनगंज का नाम बदलकर मेदिनीनगर किया गया है। इन्हें पलामू के इतिहास पुरुष का गौरव प्राप्त है। इनकी लोकप्रियता इस लोकगीत से पता चलती है-
धन्न-धन्न राजा मेदनियां, घर-घर बजले मथनियां।
अन्नवा से भर गइले खेत-खलिहनवां,

  सांच भइले सबके सपनवां, घर-घर बजले मथनियां।
गइया-भइंसिया से भरले बथनवांइनके कार्यकाल में गाय, बैल और प्रजा सभी खुशहाल थे। 'राजा मेदनियां के राज, न गउए छान, न प्रजा डांड़।Ó मेदिनी राय वीर और साहसी थे। इनके पराक्रम और न्यायप्रियता की दुहाई आज भी दी जाती है। इन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। रांची के निकट छोटानागपुर के नागवंशी राजा के डोइसागढ़ (नवरतनगढ़) पर भी कब्जा किया और उसके किले का नागपुरी दरवाजा निकलवाकर पलामू किले के प्रवेशद्वार पर लगवाया। यह दरवाजा देखभाल के अभाव में अब जीर्ण हो चुका है। इन्होंने ही पुराने पलामू किले की मरम्मत करवाई और उसी से थोड़ी दूर कमलदह नामक झील का निर्माण कराया। इस झील में किले के सुरंग मार्ग से रानी नहाने जाती थीं। यह झील तीन ओर पहाड़ों और एक ओर ओरंगा नदी की तलहटी के बीच है। अब तो यह सिकुड़ गई है। अपने पुत्र के लिए मेदिनी राय ने पुराने किले के पास पहाड़ी पर नए किले का निर्माण कराया। इसकी नींव संवत 1680 माघ कृष्ण पंचमी, बुधवार को रखी गई थी। यह किला रोहतासगढ़ से भी ऊंचा बनाया गया था-ऊंचतिगढ़ पलमुआं हो, नीचहिं गढ़ रूईदास(रोहतास)। पुराने किले के दक्षिण में दस हजारी छावनी थी। इसमें अनेक गुफाएं हैं। यहां चेरो के साथ खरवार भी महत्वपूर्ण जाति थी। इन दोनों के बीच अच्छे संबंध थे।
चेरो राज के संस्थापक भगवंत राय के पोते अनंत राय के शासन काल में औरंगजेब का तत्कालीन बिहार सूबेदार दाऊद खां ने पलामू पर कब्जा कर लिया। लेकिन उसके वापस लौटते ही चेरो राजा ने पुन: अधिकार कर लिया। इस बीच और घटनाएं हुईं। दाऊद खां ने पुन: 3 अप्रैल 1660 को पराजित किया। इस बार उसने किले को ही नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि किले के अंदर मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनवाई। उसी तरह किले के सिंहद्वार पर स्थित मंदिर को भी तोड़कर मस्जिद बनवाई। इसके ध्वंसाशेष आज भी किले के अंदर और बाहर मौजूद हैं। गुंबदों की आकृति को देखकर कोई भी सहज अनुमान ला सकता है। इसके बाद दाऊद ने पलामू का शासन फौजदार खां को सौंप दिया। लेकिन चेरो भी मानने वाले नहीं थे। किले पर पुन: कब्जा कर लिया। राजा भूपल राय (1661-1662) के बाद राजा मेदिनी राय राजा बने। ये चेरोवंश की पांचवीं पीढ़ी में थे। इनके शासन काल में राज्य स्थिर हुआ। विकास की गति तेज हुई। प्रजा खुशहाली के गीत गाने लगी। इन्होंने 13 साल तक राज किया। इसके बाद राज चलता रहा। दसवें राजा थे जयकिशुन राय (1722-1770)। इन्होंने 48 साल तक राज किया। चेरो वंश में सर्वाधिक राज करने वाले यही थे। उनके बाद चित्रजीत राय गद्दी पर बैठे पर, एक साल ही शासन कर पाए। गोपाल राय के भतीजे ने कोयल नदी के किनारे शाहपुर में एक किला बनवाया, जहां वे पलामू को छोड़कर रहने लगा। यहां 12 साल तक शासन किया। 14 वें राजा हुए चुरामन राय। ये नि: संतान थे। इन्होंने 38 साल तक शासन किया, लेकिन वे बिल्कुल अयोग्य थे। शासन की बागडोर दरबारियों के हाथ में ही रहा। यहीं से चेरो वंश अस्त होता है और अंगरेजों का प्रादुर्भाव। 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल-बिहार की दीवानी हासिल की। चेरो परिवार अपने गृह कलह के कारण अपने में ही उलझ गया। कंपनी को हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया। इस तरह पलामू अंगरेजों के अधीन हो गया। इसके एक साल बाद यानी 1766 में पलामू वायसराय के सीधे नियंत्रण में आ गया। इसके बाद 38 सालों तक पलामू उथल-पुथल से मुक्त रहा। लेकिन 1857 आते-आते अंगरेजों के खिलाफ जंगल धधकने लगे। इसकी कहानी फिर कभी। 1 जनवरी 1892 को इसे जिला बनाया गया। इसके सौ साल बाद यानी 3 मई 1992 को इसे प्रमंडल बनाया गया। लेकिन, आज भी पलामू उपेक्षा का दंश झेल रहा है। किले का जीर्णोद्धार आज तक नहीं हुआ, न खुदाई की गई। उपेक्षा के कारण जंगलों ने अपने आगोश में ले लिया। घने जंगलों के बीच किले के बुर्ज से ओरंगा नदी का खूबसूरत नजारा दिखता है। पर, भारतीय पुरातत्व विभाग ने वहां आज तक कोई शिलापट्टï नहीं लगाया, ताकि पर्यटकों को इस ऐतिहासिक किले के बारे में जानकारी मिल सके।

कबरा कला : बदल सकता है झारखंड का इतिहास

 डालटनगंज के हुसैनाबाद प्रखंड के कबरा कला गांव में उत्खनन से झारखंड ही नहीं, भारत के इतिहास पर भी नई रोशनी पड़ सकती हैं। यह एक ऐसा गांव है, जहां पाषाण काल से लेकर मुगल काल तक के अवशेष पाए जाते हैं। पुरातात्विक दृष्टिï से देश का संभवत: अकेला ऐसा स्थल है, जो कभी बेचिरागी नहीं हुआ। यानी यहां सभ्यता की निरंतरता की निशानी के कुछ न कुछ चिह्नï अवश्य मिल जाते हैं। हालांकि आज भी यहां एक-डेढ़ हजार की आबादी निवास करती है। भारतीय पुरातत्व विभाग(दिल्ली)की पत्रिका ने भी माना कि यहां से मिले सामान नियोलीथिक से लेकर मध्यकाल के स्पष्टï संकेत करते हैं। वहीं, पिछले एक दशक से कबरा कला पर काम करने वाले हुसैनाबाद निवासी तापस डे मानते हैं कि यहां मध्य पुरापाषाण काल, नव पाषाण काल, ताम्र पाषाण, लौह युग, मौर्य काल के अवशेष मिले हैं। वह मानते हैं कि यहां चालीस से अस्सी हजार के बीच के कालखंड के पत्थरों के औजार मिले हैं। कला संस्कृति एवं खेलकूद विभाग के पूर्व उपनिदेशक (पुरातत्व) डा. हरेंद्र प्रसाद सिन्हा का कहना है कि पाषाण काल के अवशेष उसकी प्राचीनता की कहानी कहते हैं। लेकिन स्पष्टï तौर पर जब तब खुदाई नहीं होती है, कुछ भी प्रामाणिक ढंग से कहना समीचीन प्रतीत नहीं होता।
पुरातात्विक संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक डा. अमरेंद्रनाथ 2003 में अपने छह सदस्यीय टीम के साथ कबरा कला आए थे। उन्होंने यहां का सूक्ष्म निरीक्षण किया और कहा कि कबरा कला की सभ्यता झारखंड की एक विस्मयकारी पुरातात्विक इतिहास की परिघटना है। उसी समय इस गांव को राष्टï्रीय महत्व का ऐतिहासिक स्थल चिह्निïत कर दिया गया। पर, इतने महत्व के गांव की खुदाई आज तक नहीं हुई। इस बाबत तापस डे कहते हैं कि बार-बार पुरातत्व विभाग को लिखा और दिल्ली तक दौड़ लगाई पर केवल कागजी आश्वासन ही मिले। जबकि इस मामले को सन 2000 में संसद में भी उठाया गया था। तब से केवल स्थल निरीक्षण का काम ही हुआ, उत्खनन नहीं। चूंकि यह गांव सोन नदी के किनारे स्थित है, इसलिए इसे सोन नदी घाटी सभ्यता का नाम दिया गया है। इस गांव के चारो ओर कुछ न कुछ महत्वपूर्ण सामग्री मिलती ही रहती है। अभी कुड़वा कला गांव में, जो जपला-डेहरीआनसोन रोड से दस किमी भीतर स्थित है, वहां भी उत्तरकालीन मृदभांड मिले हैं। इसके साथ ही लाल, काले पालिशदार मिट्टïी के बर्तन मिले हैं। लाल पालिश की हुई सुराही और अंगूठे के आकार का एक सर्प का सिर मिला है। इस सर्प के दो कान बने हुए हैं। इसका एक कान खंडित हो गया है। जाहिर है, या तो यहां शैवों की उपस्थिति रही होगी या नागवंशियों की। हालांकि झारखंड में दोनों की उपस्थिति रही है। कबरा कला में भी मनके, स्त्री की छोटी मूर्ति, जिस एक लिपि में कुछ अंकित है, पत्थरों के औजार आदि मिले हैं। यहां नव पाषाण काल के विभिन्न रंग एवं आकार की चार कुल्हाडिय़ा मिली हैं। पाल, मुगल और ब्रिटिश काल की मूर्तियां, तांबे एवं पीतल के बर्तन, सिक्के आदि भी पर्याप्त संख्या में मिले हैं। यहां लौह काल की लहसीलन (पिछला हुआ लौह) तथा मिट्टïी भी है। ये सभी चीजें सतह पर ही मिलती रही हैं या कभी किसी कारणवश ग्रामीण खुदाई में इन्हें प्राप्त करते रहे हैं। पर, इतने महत्वपूर्ण स्थल की खुदाई आज तक नहीं हुई जबकि तापस डे मानते हैं कि खोदाई से केवल नागर सभ्यता ही नहीं मिलेगी बल्कि मोहनजोदड़ो और सिंधु घाटी की सभ्यता से भी पहले की सभ्यता से साक्षात्कार हो सकता है। हालांकि अब इसकी खोदाई होनी है। पुरातत्व विभाग ने स्वीकृति दे दी है। अब देखिए, क्या-क्या खोदाई में निकलता है। जो भी हो, एक नई सभ्यता से रूबरू होने का मौका तो मिलेगा ही। हो सकता है, फिर से इतिहास लिखा जाए।  

बोली को बनाया मंच की भाषा

भिखारी ठाकुर भोजपुरी के उस व्यक्तित्व का नाम है, जिसने भोजपुरी भाषा को उस जमाने में भी मंच की भाषा बनने का गौरव प्रदान किया, जिस जमाने में गांव में भी साधारण पढ़-लिखे लोग भी, जब रास्ते में, बाजार में, या अपने दरवाजे या दालान बात करने में शर्म महसूस करते थे। इसे अनपढ़-गवारों की भाषा मानकर इसका खुले में प्रयोग करना, उनको, अपने अशिक्षित और पिछड़े होने का एहसास कराता था। ऐसे समय में भिखारी ठाकुर को अपनी इस बोली को, मंच की भाषा बनाने में ज
रा भी झिझक नहीं हुई। हलांकि भिखारी ठाकुर कोई बहुत पढ़े-लिखे व्यक्ति नहीं थे, उन्होंने तो खुद कहा है, 'लिखे-पढ़े के हाल ना जानी, पत राख शारदा भवानीÓ।
भिखारी उस घर में पैदा हुए थे, जिसे उनके गंवई समाज में परजा पवनी का दर्जा प्राप्त था। वह नाई जाति में पैदा हुए थे जिसका काम लोगों की मुफ्त हजामत बनाना था, खास कर अपने जजमानिका के ओहदेदार लोगों का और इसके एवज में उनके परिवार को मिलता था वर्ष में दो बार खेतों में पैदा होने वाली फसलों का एक बंधा बंधाया और शादी-विवाह आदि संस्कारों में कुछ नेग। इस परिप्रेक्ष्य में आपका सोचना जायज है कि फिर ऐसे परिवार का लड़का आखिर कैसे इतना बड़ा लोक कलाकार बन गया? इतने नाटक, इतने गीत लिख गया, गाया भी, नाचा भी, अभिनय किया और गांव की गंवई भोजपुरी बोली को शहरी और नगरों तक पहुंचा दिया, वह भी मंच पर, जबकि उस दौर में भोजपुरी सिनेमा की भाषा भी नहीं बन पाई थी।
यह भिखारी ठाकुर और उनकी लोकप्रियता की देन है कि भोजपुरी को सिनेमा की भाषा बनाने पर बाद में लोगों ने सोचा, इस पर काम किया और इस सिनेमा के जनक बने, हिंदी फिल्मों के महान कलाकार, पर मन-मिजाज से खांटी भोजपुरिया रहे, जनाब नजीर हुसैन। भिखारी ठाकुर का पढ़ा-लिखा होना तो दूर, उन्हें कई वर्षों तक अक्षर ज्ञान भी नहीं हुआ था। उन्होंने खुद भी कहा है कि 'नौ बरिस के जब हम गइनी विद्या पढऩ पाठ पर गइनी, एक बरिस ले जबदल मति लिखे ना आइल राया गीत।Ó और अपनी इस जिंदगी की जलालत से तंग आकर भिखारी ठाकुर एक दिन अपना घर छोड़ कर भाग जाते हैं और पहुंचते हैं बंगाल के मेदनीपुर। वहां पहले तो अपने जीविकोपार्जन के लिए वही अपना पुश्तैनी पेशा अख्तियार करते हैं। पर बाद में बंगाल की कलात्मक उर्वरा भूमि, उनके मन में छिपे कलाकार को जगाती है, झिंझोड़ती है। जब वह, वहां पहली बार रामलीला देखते हैं, फिर बंगाल की प्रसिद्ध नाटक पद्धति जात्रा देखते हैं और अपने मन में भी कुछ वैसा ही करने की कल्पना पालने लगते हैं, फिर क्या था, लौट पड़ते हैं अपने गांव और वहां आकर पहले तो अपने मित्र भगवान दास बनिया से अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं, कुछ लिखने पढऩे भी सिखते हैं और फिर अध्ययन करते हैं तुलसीदास कृत रामचरितमानस का। और फिर साकार हो जाती है उनके मन की कल्पना। अपने दोस्तों के साथ खड़ी करते हैं रामलीला मंडली, पिरोने लगते हैं अपने मन भावों को अपनी भाषा में रामचरित के नायकों का संवाद, गान और फिर होता है एक दिन मंचन। पूरा गांव सराह उठता है। हौसला बढ़ता है। पर माता-पिता की वर्जना बाधक बनती है। पर अब तो कलाकार के मन को पंख लग गये होते हैं। इन सारी वर्जनाओं के बावजूद वह कलाकार विद्रोह करता है, कलाकार विद्रोही नहीं हुआ तो कलाकार कैसा? सो अब बनती है नाज मंडली। शुरू होते हैं नाटक लिखने के सिलसिले। एक के बाद दूसरा, तीसरा, चौथा फिर जाने कितने। होने लगते हैं मंचन। राहुल सांकृत्यायन को कहना पड़ा कि 'भिखारी ठाकुर तो भोजपुरी भाषा के शेक्सपीयर हैं। और इसी भोजपुरी के शेक्सपीयर के नाटकों से कुछ चुनिंदा गीतों को गाया है कल्पना पटवारी ने। नौ गीतों को लंदन की मशहूर कंपनी वर्जिन ने रिलीज किया है। यह भोजपुरी के फक्र व सम्मान की बात है। अब भोजपुरी दुनिया के लिए अजूबा भाषा नहीं होगी।

मंदिरों का गांव मालूटी

foto tourism jharkhand
मालूटी मंदिरों का गांव है। राज्य की दूसरी राजधानी दुमका से पूरब 55 किमी दूर शिकारीपाड़ा प्रखंड में यह ऐतिहासिक गांव स्थित है। रामपुर रेलवे स्टेशन से पश्चिम में 16 किमी दूर है। यहां पहुंचने के लिए राजधानी रांची से बस द्वारा देवघर होते हुए भी पहंुचा जा सकता है। वहीं दुमका से भी इस गांव में सड़क मार्ग द्वारा सुडीचुआं तक पहुंचा जा सकता है। यहां से पांच किमी दक्षिण पैदल या रिक्शा द्वारा यात्रा कर मंदिरों की नगरी में पहुंचा जा सकता है। इस गांव की जानकारी देश-दुनिया को 22-23 साल पहले हुई। गांव से बाहर इस मंदिर के बारे में लोग नहीं जानते थे। यहां पहले 108 शिव मंदिर थे, लेकिन अब 75 से 80 मंदिर ही शेा हैं। बंगाल की सीमा पर स्थित होने के कारण मंदिरों की शैली पर इसका प्रभाव स्पट देखा जा सकता है। बताते हैं कि तंत्रा साधना का बड़ा केंद्र था।   
  1979 में भागलपुर के तत्कालीन आयुक्त अरुण पाठक संयोगवश मालूटी गांव पहुंचे। लगभग 300 घरों का यह छोटा सा गांव मालूटी मंदिरों की नगरी में तब्दील थी। इसे देखकर वे काफी अचंभित हुए। भागलपुर लौटने के बाद उन्होंने इसकी जानकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और बिहार पुरातत्व विभाग को दी और इसके संरक्षण के लिए आवश्यक कार्यवाही का आदेश दिया। इस तरह यह गांव पुरातत्व के नक्शे पर आया।
  झारखंड और बंगाल की सीमा पर स्थित मालूटी का प्राचीन नाम मल्लाहाटी बताया जाता है। उस समय यह गांव मनोहारी जंगलों से आच्छादित था। पुराने समय में यह गांव समुदेश, राढ़, मल्लभूम, कामकोटी, गौड़ और जंगल राज्य के अंतर्गत था। कहा जाता है कि कालांतर में मल्लाहाटी ही मालूटी बन गया। मालूटी मंे आदि शक्ति मां मौलीक्षा का मंदिर है। मौलीक्षा देवी के मंदिर को यहां जनसाधारण में मौलीकुटी कहा जाता है। इसी मौलीकुटी से विकसित होकर इस ग्राम का नाम मालूटी पड़ गया। मालूटी के पूरब सातरंगम गांव, पश्चिम में भगवछुट्ट गांव उत्तर में घटकपुर गांव एवं सतीघ्रदा नाला व दक्षिण में घरमपुर गांव हवा बंगाल एवं चंदन नाला स्थित है।

क्या है इतिहास
ऐतिहासिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि 15 वीं शताब्दी में यह क्षेत्रा गौड़ राज्य के अधीन था। ननकर राज्य के संस्थापक वसंत राय जो एक स्थानीय पंडित थे, को उपहार स्वरूप गौड़ के तत्कालीन बादशाह अलाउद्दीन हुसैन शाह -1493-1519 द्वारा ननकर राज्य प्राप्त हुआ था। बताया जाता है कि बसंत राय का जन्म बीरभूम जिले के मौड़ेश्वर के निकट कटिग्राम नामक छोटे से गांव में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया था। अत्यंत निर्धनता के कारण पेट पालने के लिए वे दूसरों का मवेशी चराते थे। मवेशी चराने के क्रम में दोपहर के समय बसंत एक पेड़ की छाया में सोए हुए थे। कुछ समय बाद बसंत के मुंह पर सूर्य की किरणें पड़ने लगीं। उस समय एक अद्भुत घटना घटी। एक विौला सांप वहां आकर बसंत के मंुह को बचाने के निए अपना फन फैलाकर खड़ा हो गया। उसी समय काशी के सुमेरू मठ के महंत दंडीस्वामी निगमानंद तीर्थ महाराज वहां से गुजर रहे थे। उनके निकट आते ही सांप भाग गया। उन्हांेने पाया कि बालक के शरीर पर राजलक्षण हैं। उन्हांेने उसी शाम बसंत को सिंहवाहिनी मंत्रा की दीक्षा दी और इसे संजीवित करने की प्रक्रिया बताई। 
  काल क्रम मंे कहा जाता है कि एक बार गौड़ साम्राज्य के बादशाह अलाउद्दीन ओड़िसा से वीरभूम जिला होते हुए अपनी राजधानी गौड़ लौट रहे थे। रास्ते मंे विश्राम के लिए बादशाह ने मयूरराक्षी नदी के किनारे अपना शाही पड़ाव डाला। नृत्य-संगीत एवं आमोद-प्रमोद में सात दिन बीत गए। अंतिम दिन बेगम का प्रिय पालतू बाज पक्षी पिजड़े से उड़ गया। बेगम उस बाज के वियोग को सहन नहीं कर सकीं और बीमार पड़ गईं। बेगम की हालत देखकर बादशाह ने घोश्ाणा की कि जो व्यक्ति उनके बाज को लौटा देगा, उसे यथोचित उपहार दिया जाएगा।
  प्रतिदिन की तरह उस दिन भी बसंत राय मवेशी चराने के लिए गया था। जब उसने अपने मित्रों से बादशाह की घोाणा सुना तो उसने भी अपने मित्रों की तरह बाज पकड़ने का फंदा पेड़ की शाखा पर डाल दिया और अपने मित्रों के साथ खेलकूद में जुट गया। विधि का विधान कहिए या भाग्य का चमत्कार-दोपहर के समय बादशाह का बाज बसंत राय द्वारा डाले गए फंदे मंे फंस गया।
घोशण में बाज की जो पहचान दी गई थी, इस बाज के पेट में वैसी ही टूटी हुई सोने की चेन थी। बसंत उसे जाल में लपेटकर घर ले आया।
  दंडी स्वामी निगमानंद महाराज उसी क्षेत्रा में रह रहे थे। जब राजा द्वारा की गई घोाणा की जानकारी दंडीस्वामी को हुई तो वे तत्क्षण समझ गए कि बसंत राय के भाग्य परिवर्तन का समय आ गया है। वे अपनी तीर्थ यात्रा स्थगित कर बसंत राय के घर पहुंचे। बाज पक्षी को देखकर उनके आनंद की सीमा नहीं रही। दूसरे ही दिन स्वामी अपने शिय के साथ शिविर पहुंचे और बादशाह को उनका खोया हुआ बाज पक्षी लौटा दिया। स्वामीजी ने बसंत राय की आर्थिक दुर्दशा का वर्णन करते हुए पुरस्कार स्वरूप बसंत राय के लिए थोड़ी सी जमीन मांगी। स्वामी जी के अनुरोध पर बादशाह ने बसंत राय को पर्याप्त निस्कर ’बिना करवाला‘ जमीन देने को राजी हो गए। कहा कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक घोड़े पर सवार होकर जितने क्षेत्रा का अतिक्रमण कर सकोगे, निस्कर राज्य के रूप में वह क्षेत्रा दे दिया जाएगा।
  वैसा ही हुआ। दूसरे दिन बसंत राय शाही घोड़े पर सवार होकर बीस मील के व्यास वाले एक भूति की परिक्रमा करने में सफल हुआ। बादशाह ने बसंत राय को अधिकार पत्रा लिख दिया। इसा तरह बसंत राय को बाज के बदले राज्य मिल गया। जिसे आज भी बाजबसंत के नाम से जाना जाता है।
  अब बसंत राय राजा बन गए थे। उन्हांेने सबसे पहले वीरभूम के मयूरेश्वर नामक स्थान में
अपनी राजधानी बनाई। बाद में राजा बसंत राय ने अपनी राजधानी मयूरेश्वर से स्ािानांतरित कर डमरा गांव ले गए जो राज्य के बीचोबीच स्थित था। ऐसा सुरक्षा एवं प्रशासिनक दृिट से किया गया था। इस समय भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों मंे बंटा था। यही कारण है कि 1649-1697 के मध्य राजनगर के राजा खाजा कमाल खां और ननकर राज्य के बीच भीाण युद्ध हुआ था, जिसमें ननकर राज्य को पराजय का मुंह देखना पड़ा तथा राजा को राजधानी छोड़का अन्यत्रा पलायन करना पड़ा। राजा कमाल खां से पराजित होने के बाद लभग 1680 मंे राजा बसंत राय के वंशज सपरिवार मालूटी चले आए। उस समय मालूटी का क्षेत्रा घनघोर जंगलों से आच्छादित था। जंगलों को काटकर साफ किया गया तथा ननकर राज्य की स्थापना की गई। राज परिवार के लोग स्थायी रूप से रहने लगे। कालांतर में चलकर राजा बसंत राय के वंशजों ने जागीरदारी को लेकर झंझट होने लगा। राजा बसंत राय के तीन भाई थे। तीनों भाई में बंटवारा हुआ। बड़े भाई को राजा की पदवी मिला और उसके जागीरदारी को राजारबाड़ी कहा गया। मझले भाई की जागीरदारी को सिकिरबाड़ी तथा छोटे भाई की जागीरदारी को छय तरफ कहा गया। कुछ दिन बाद बड़े भाई की जागीरदारी का भी विभाजन हुआ, जिसे मध्य बाड़ी कहा गया। इस प्रकार बसंत राय का परिवार चार परिवारों में बंट गया।   आंतरिक कलह एवं बाहरी आक्रमण के बीच राजा बसंत राय व उनके राजपरिवार के सदस्यों ने मालूटी गांव में अपने निवास के लिए राजमहल का निर्माण नहीं कर देवी-देवताओं के निवास के लिए 108 मंदिरों का निर्माण करवाया। इन मंदिरों का निर्माण लगातार 100 साल तक होते रहा। आगे चलकर वक्त के थपेड़ों और प्राकृतिक आपदाओं को झेलते 75-80 मंदिर ही बचे हैं इनमंे 54 मंदिर काफी बेहतर स्थिति मंे हैं। मंदिर राजपरिवारों की जागीरदारी के नाम पर हैं। जैसे राजारबाड़ी मंदिर समूह में कुल 20 मंदिर हैं। इनमें टोराकोेटा से युक्त शिव मंदिरों की संख्या 12, सादा शिव मंदिर 6, छतदार काली मंदिर एक व रास मंदिर एक। ये सभी मंदिर मालूटी गांव के उत्तरी-पश्चिमी भाग में स्थित हैं। दूसरे, मध्यम बाड़ी एवं सिकिर बाड़ी मंदिर समूह में कुल 28 मंदिर हैं, जो उत्तर-पूरब में स्थित हैं। इनमें टेराकोटो अलंकरण से युक्त शिव मंदिर सात, सादा शिव मंदिर 16 एवं छतदार मंदिर पांच। छय तरफ मंदिर समूह मंे कुल 16 मंदिर हैं। ये गांव के दक्षिण भाग में स्थित हैं। इनमें टेराकोटा अलंकर युक्त शिव मंदिर 10, सादा शिव मंदिर 1 व छतदार मंदिरांे की संख्या पांच है।
  इनके अलावा पांच मंदिर सड़क कि बगल में स्थित हैं। ये हैं-सादा काली मंदिर एक व सादा शिव मंदिर चार हैं। मालूटी गांव के दक्षिण पूर्वी कोण पर दो मंदिर हैं। एक मौलीक्षा मंदिर व दूसरा सादा शिव मंदिर।
  मंदिरों की नगरी मालूटी गांव में शिवपुरी काशी के समान शिव मंदिरों की संख्या सर्वाधिक है। मालूटी में जो मंदिर हैं, उनमें 58 शिव मंदिर हैं। शेा काली, दुर्गा, विणु, मौलीक्षा आदि के हैं इनके अलावा वामाखेपा, धर्मराज आदि के भी मंदिर हैं, जो आधुनिक हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन मंदिरों के निर्माण में किसी एक स्थापत्य का अनुसरण नहीं किया गया है। सभी शिव मंदिरों का निर्माण शिखर शैली में किया गया जो एक कक्षवाला ‘चार चाला कुटीर’ की आकृति मंे बनाई गई है। पर त्रिशूल के आकार में व्रजटणु गर्भगृह मंे शिवलिंग स्थापित एवं पूजित है। इन मंदिरों की न्यूनतम चाई लगभग 15 फीट व अधिकतम चाई लगभग 60 फीट है। अधिकांश मंदिरों के सम्मुख भाग पर तरह-तरक की नक्काशियां की गई हैं तथा मंदिरों के उपरी हिस्से प्रोटो-बंगला अक्षरों की सहायता से संस्कृत अथवा प्राकृत भासा में प्रतिठास्ता का नाम व स्थापना तिथि आदि अंकित है।   काली, दुर्गा, वामाखेपा तथा धर्मराज मंदिरों की शैली सामान्यतः समतल छत की है। ये मंदिर मंच शैली के आधार पर निर्मित हैं। इसे रासमंच कहा जाता है। यह मंदिर छतविहीन हैं तथा सभी दिशाओं से खुले हैं। गांव के दक्षिणी भाग में मां मौलीक्षा मंदिर के निर्माण में जिस प्रकार के स्थापत्य कला का सहारा लिया गया है, उसे बंगला शैली कहा जाता है। यह बंगाल की लोकप्रिय शैली है। बिहार-झारखंड में बंगला शैली में यह एकमात्रा मंदिर है। इसकी बनावट दो चाला कुटीर के समान है।
  मंदिरों में टेराकोटा का काम आकर्िात करने वाला है। टेराकोटा के विभिन्न चित्रांकनों, डिजाइनों, अलंकरणों एवं दृश्यों से युक्त मंदिर केवल स्ािापत्य की दृिट से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं वरन अनुपम एवं विलक्षण कला कौशल की दृिट से भी अद्वितीय हैं। मंदिर के अग्रभाग के मुख्य पैनल तथा पार्श्व पैनल में रामलीला एवं कृण लीला का दृश्य काफी प्रभावकारी ढंग से दिखाया गया है। राजा जनक द्वारा हल चलाने, राम, लक्ष्मण एवं सीता का वन गमन, मारीच बध, राम द्वारा शिकार करने का दृश्य, बालि बध, हनुमान द्वार सेतुबांध निर्माण, सिर पर पत्थरों को ढोने, राम-सुग्रीव आदि केवल स्वाभाविकता को ही प्रकट नहीं करते हैं वरन करुणा और मार्मिकता की भी सर्वोच्च संचाई को भी चित्रित करने में सफल हैं। वैसे ही कान्हा की लीला भी प्रदर्शित की गई है। यशोदा द्वारा दही मंथन, गोपियों का कान्हा द्वारा चीर हरण, बकासुर बध, गोपियों संग रासलीला, राधा संग कान्हा का बांसुरी वादन आदि देखकर मुग्ध हुआ जा सकता है। टेराकोटा से बने ये चित्रा वज्र लेह से दीवार पर चिपकाए गए हैं। हर मंदिर की भीतरी दीवारें पौराणिक इतिहास का आख्यान रचती हैं। महिसाासुरमर्दिनी से लेकर रावण बध तक की प्रस्तुति में एक सजीवता है। कलात्मकता है। टेराकोटा के इस अद्भुत काम को देखकर इस शैली की कलात्मक उंचाई का बोध होता है। ये मंदिर टेराकोटा मंदिरों के नाम से भी प्रचलित हैं।   
मौलीक्षा मंदिर
  मालूटी गांव तांत्रिकों का शक्तिपीठ भी है। इस गांव में मौलीक्षा देवी का मंदिर स्थित है। यह मध्यकाल में ही नहीं, बौैद्ध काल से ही एक तांत्रिक सिद्धि का एक बड़ा केंद्र रहा है। ननकर राज्य के राजा अपनी कुल देवी दुर्गा के रूप में मौलीक्षी देवी की पूजा-अर्चना करते थे। मंदिर का निर्माण सुनकर राजाओं ने 17वीं शताब्दी में किया गया है। यह मंदिर भी बंगला शैली में निर्मित है। इसकी बनावट दो चाला कुटीर के समान है। मंदिर के बाहरी भाग की लंबाई 15 फीट एवं चौड़ाई 12 फीट 6 इंच है। मंदिर का निर्माण लाहौरी ईंटों द्वारा सुरखी-चूना की सहायता से किया गया है। मंदिर का शीर्ा भाग शिखरनुमा है। यह एक उंचे चबूतरे पर स्थित है।
 मंदिर का गर्भगृह 8 फीट 5 इंच लंबा एवं 5 फीट 3 इंच चौड़ा है। गर्भगृह की दीवार सुरखी-चूने से प्लास्टर किया हुआ है। गर्भृह के अंदर उंची वेदी पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा का निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। यह प्रतिमा पूर्ण नहीं, केवल मस्तक है। यहां भक्त केवल मां के मस्तक का ही दर्शन करते हैं। इसलिए  मां को मौलीक्षा कहकर पुकारते हैं। माली का अर्थ होता है मस्तक एवं इक्षा का दर्शन। यानी मौलीक्षा का अर्थ हुआ मस्तक का दर्शन। मौलीक्षा देवी की आंख चांदी से बना हुआ है। मौलीक्षा देवी की प्रतिमा के दाहिने थोड़ा हटकर भैरव की प्रतिमा है जो बलुआही पत्थर से निर्मित है। मां काली का जीभ बाहर निकला हुआ है। मौलीक्षा देवी के आगे शिवलिंग है जो काले पत्थर से बना है।

 मौलीक्षा देवी इस क्षेत्रा का एक महान शक्तिपीठ है। यहां विभिन्न धर्र्माे के मतावलंबी अपने मतानुसार साधना कर सिद्धि प्राप्त करते हैं। कहा जाता है कि मौलीक्षा मां की स्वीकृति के बगैर तारापीठ में सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। तारापीठ मौलीक्षा मंदिर से 15 किमी दूर बंगाल के वीरभूम जिले में स्थित है। कहा जाता है कि बाकाखोपा, जो तारापीठ के निकट आटला गांव का निवासी थे, दो साल तक मां मौलीक्षा की साधना की। इसके बाद एक मौलीक्षा मां का साक्षात दर्शन हुआ, तब उन्हें तारापीठ में जाकर सिद्धि प्राप्त हुई।
  इनके अलावा मालूटी गांव में कुछ छतदार मंदिर भी हैं जो बाद के काल में बनाए गए हैं। इन मंदिरों का निर्माण ईंटों से किया गया है तथा गोरे के रूप में सुरखी-चूना का प्रयोग किया गया है। मंदिर का शीर्ा भाग शिखरनुमा न होकर छतदार है। दुर्गा मंदिर के सम्मुख भाग में मनुयों की कुछ मूर्तियां, दोनों किनारे पर एक शेर तथा परियों का अंकन अंग्रेजी संस्कृति का प्रभाव देखा जा सकता है। खैर, मालूटी गांव के मंदिरों के संरक्षण को लेकर झारखंड की सरकार गंभीर हुई है। इन ऐतिहासिक मंदिरों की सुरक्षा जरूरी है।  
                      

नवरत्नगढ़ : झारखंड का एकमात्र राष्ट्रीय धरोहर"

डॉ. हरेन्द्र सिन्हा, पुरातत्वविद्.
                       
       झारखण्ड में नागवंशी शासकों की एक अद्भुत् परम्परा है। कहा जाता है कि नागवंश की नींव प्रथम शताब्दी में फणि मुकुट राय द्वारा रांची से लगभग 25 किलोमीटर दूर पिठोरिया-सुतिआम्बे में  डाली गई। नागवंश की स्थापना में तत्कालीन स्थानीय मुण्डा शासकों की भी महति भूमिका रही। तभी मुण्डा जनजाति और नागवंश में आपसी संबंध की चर्चा भी सामने आती है। यह अपने आप में गहन शोध का विषय है।
         नागवंश का शासन काल भी दुनिया के लिए एक अजूबा ही है जिसकी नींव प्रथम शताब्दी में पड़ी और जो आजतक अस्तित्वमान  है। किसी भी राजवंश का ये लगभग दो हज़ार वर्षों का कार्यकाल तो निश्चय ही 'गिन्नेस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में दर्ज़ किये जाने योग्य है।
        नागवंशियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी राजधानी नौ बार बदली। सुतिआम्बे के बाद खुखरा, चुटिया, दोईसा, पालकोट आदि स्थान भी उनकी बदलती हुई राजधानियों के रूप में जाने जाते हैं। लेखक द्वारा खुखरा के पुरातात्विक उत्खनन के उपरांत यह तथ्य स्थापित किया जा सका कि लगभग 12वीं-13वीं शताब्दी में नागवंशी शासक भीमकर्ण की राजधानी खुखरा ही थी। इसीके उपरांत लगभग 17वीं शताब्दी में राजा दुर्जनसाल के समय में नई राजधानी दोईसा में स्थापित की गई जो आज के गुमला ज़िला में अवस्थित है। यहाँ बड़ी संख्या में प्राचीन भवनों के अवशेष एक ही परिसर में दिखते हैं। इस स्थान को देख हमें कर्नाटक के हम्पी में स्थित 14वीं शताब्दी के विजय नगर साम्राज्य के अवशेषों की याद आती है, जिन्हें तत्कालीन सरकार द्वारा प्रयत्न करके, विकसित करके बहुत पहले ही विश्व धरोहर का दर्ज़ा दिलाया जा सका। नवरत्नगढ़ को भी उसी प्रकार से विकसित किये जाने की आवश्यकता है।
         ऐतिहासिक साक्ष्य बतलाते हैं कि मुग़ल शासक जहांगीर के समय में दुर्जनसाल नागवंश का शासक था। मुग़लों से  कतिपय मतभिन्नता के कारण बिहार के तत्कालीन सूबेदार इब्राहिम खां  द्वारा दुर्जनसाल को गिरफ्तार करके ग्वालियर के क़िले में बंद कर दिया गया। लगभग 12 सालों बाद कुछ समझौतों के उपरांत दुर्जनसाल को रिहा कर दिया गया। इस घटना की चर्चा जहांगीर की आत्मकथा 'तुजुक' में अंकित है। ग्वालियर से वापस आने पर दुर्जनसाल ने नागवंश की राजधानी को खुखरा से स्थानांतरित किया और वर्तमान गुमला ज़िले के अंतर्गत, सामरिक दृष्टिकोण से अधिक सुरक्षित, दोईसा में अपनी नई राजधानी स्थापित की। इस समय तक नागवंशी शासक अपने लिए भव्य आवासीय भवनों का निर्माण न कर सामान्य भवनों में ही रहते थे। पर दुर्जनसाल, अपने दुर्भाग्यपूर्ण ग्वालियर प्रवास के दौरान, मुग़लों की स्थापत्य कला से खासा प्रभावित हुआ था। फलतः उसने दोईसा स्थित नई राजधानी में एक भव्य राजप्रासाद का निर्माण कराया जिसपर मुग़ल स्थापत्य का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। इस क़िले को नाम दिया गया- नवरत्नगढ़। इस समय तक दिल्ली में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ गद्दीनशीन हो चुका था।
          नवरत्नगढ़ झारखण्ड की राजधानी रांची से लगभग 67 किलोमीटर दक्षिण-पूरब में गुमला ज़िला के सिसई प्रखण्ड में स्थित है। रांची से बेड़ो-बसिया-सिसई होकर नवरत्नगढ़ पहुंचा जा सकता है। यह पूरा इलाक़ा लगभग 140 एकड़ में बसा हुआ है।  यहाँ नवरत्नगढ़ क़िले के अलावा अनेक मंदिर और अन्य संरचनाएं भी हैं जो दुर्जनसाल के बाद के शासकों द्वारा भी कालक्रम में बनाई जाती रहीं। इन भवनों में कपिलनाथ मंदिर, बड़ा महादेव, बूढ़ा महादेव, राजकुल मंदिर, बाउड़ी मठ, कमलनाथ सिंह दरवाज़ा गणेश मूर्ति, अंत:पुर मंदिर, रानी लुकवल, महादेव मंदिर, लुड़दा मंदिर समूह इत्यादि महत्वपूर्ण हैं। इनमें से कुछ में भित्ति चित्र, अत्यंत सुंदर प्रस्तर अलंकरण एवं प्राचीन अभिलेख आदि भी हैं।
         जहाँ तक नवरत्नगढ़ क़िले का प्रश्न है, इसपर मुग़ल स्थापत्य हावी दिखता है। निश्चय ही इस के निर्माण के लिए  बाहर से भी कुशल शिल्पकार लाए गये होंगे। इस क़िले का आधार 42 मीटर वर्गाकार है। इसकी पांच मंज़िलें थीं जिनमें से अब तीन ही बची हैं। ग्वालियर क़िले की भांति ही सुरक्षा कारणों से इस क़िले के चारों ओर भी मोट, यानी पानी युक्त गड्ढा,खोदा गया था। क़िले के अंदर कई व्यवस्थाएं की गई थीं, यथा; एक कचहरी, एक कोषागार और भूमिगत एक कारागार भी आदि। निर्माण सामग्री में, झारखण्ड के हर क्षेत्र की भांति, यहाँ भी ईंटों और पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। दीवारों की मोटाई लगभग 82 सेंटीमीटर है। प्रथम मंज़िल की योजना में उत्तर दिशा में, उपर की मंज़िलों तक जाने के लिए, पत्थर के मोटे पटरों की सीढ़ियां बनी हुई हैं। महराब भी दरवाज़ों के उपरी हिस्से में बनाये गये हैं।कमरों के आकार के अनुसार उनकी छतें चौकोर अथवा गोल हैं। कमरों में विभिन्न आवश्यकताओं के लिए अमूमन 8 ताखे भी निर्मित हैं। दूसरे तले पर एक बालकनी जैसी संरचना है जहाँ से राजा संभवतः अपनी प्रजा को दर्शन देते होंगे, जैसा कि उन दिनों मुग़ल शासकों में चलन था। कमरों की अंदरुनी छतों में लकड़ी सजावट भी की गई थी, जिनमें लताओं के अतिरिक्त हाथी जैसे जीव-जंतु भी उकेरे गये हैं। क़िले की छत के परकोटे मुग़ल शैली के  अनुकरण में बनाये  तो गये हैं पर  इनमें छिद्र नहीं बनाने के कारण ये अनुपयोगी रह गये होंगे, क्यूंकि किसी युद्ध के समय छुपकर वार करने की सहूलियत यहाँ नहीं रह गई होगी। भूतल के मुकाबले यहाँ की दीवार की मोटाई मात्र 76 सेन्टीमीटर है।
         अब यहाँ की सारी संरचनाएं समाप्ति के कगार पर हैं। राज्य सरकार सहित केन्द्र सरकार का ध्यान बारंबार इस महत्वपूर्ण  स्मारक की तरफ़ लेखक द्वारा दिलाया जाता रहा। अंततः भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रांची संकुल की पहल पर इस स्मारक को केन्द्र सरकार द्वारा संरक्षित घोषित कर दिया गया। यह भी ज्ञातव्य हो कि राज्य सरकार राज्य बनने से लेकर आज तक एक भी स्मारक को संरक्षित घोषित नहीं कर सकी।
      पर अब यह पूरे राज्य के लिए हर्ष, गर्व और संतोष की बात है कि भारत सरकार के असाधारण राजपत्र भाग II, खंड 3 उप-खंड (II) में प्रकाशित भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा अब आदेश सं. 3183 दि: 27.09.19 द्वारा नवरत्नगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया है। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (रांची संकुल) द्वारा अविलम्ब इसके विकास की दिशा में ठोस क़दम उठाते हुए इसे हम्पी की तर्ज़ पर राज्य के एक महत्वपूर्ण पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने के उपाय करने चाहिएं।



शहीद बुधु भगत का उपेक्षित गांव

सिलागाई अमर शहीद बुधु भगत का गांव हैं। गांव जाने के दो रास्ते हैं। एक चान्हो होते हुए। चान्हो से गांव की दूरी दस किमी है, लेकिन रास्ता बहुत खराब है। यह गांव चान्हो प्रखंड में ही पड़ता है। एक दूसरा रास्ता बेड़ो से तुको और यहां से एक रास्ता सिलागाई की ओर जाता है। यह रास्ता ठीक है और 25 किमी दूरी तय कर इस गांव में पहुंच सकते हैं। तुको से सड़क सिलागाई जाती है, वह कोलतार की है। थोड़ी संकरी भी। 
वीर बुधु भगत कोई सामान्य योद्धा नहीं थे। इस सुदूर गांव से उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध तब छेड़ा था, जब कहीं तथाकथित पहली स्वतंत्रता आंदोलन की 1857 की क्रांति बहुत दूर थी। यानी 1831-1832 में। जब इस गांव में जाएंगे और भर रास्ते आस-पास का प्राकृतिक नजारा आपकी आंखों को सुकून बख्शता है तो आपके दिमाग में यह जरूर बात आएगी कि इतना दूर...इस सुदूर गांव से 180 साल पहले क्रांति की एक ज्वाला उठी थी, जिसे इतिहास में लरका विद्रोह के नाम से दर्ज किया गया।

यह गांव आज भी गांव की तरह है। सड़कें जरूर बन गई हैं। स्कूल जो आठवीं तक था, दसवीं तक हो गया है। स्कूल के पास ही एक पार्क बन गया और यहीं पर हर साल जयंती व पुण्यतिथि पर मेला लगता है। बुधु भगत की आठवीं पीढ़ी की हुलस देवी कहती हैं गांव में करीब सात हजार की आबादी है। उरांव, मुस्लिम, महतो, ग्वाल आदि जातियां यहां रहती हैं। इसी परिवार की अंजू देवी पूर्व मुखिया रह चुकी हैं। कहती हैं, अब भी परिवार के लोग खेती-बारी पर ही निर्भर हैं। परिवार बड़ा हो गया है। घर आज भी मिट्टी के ही हैं। कल्याण विभाग ने जरूर आंगन में सोलर ऊर्जा का एक पोल लगा दिया है, जिससे रात का अंधेरा छंटता है।

परिवार के वरिष्ठ सदस्य रामदेनी भगत कहते हैं कि हम आठवीं पीढ़ी के हैं और 18 परिवार हैं। इस गांव को शहीद गांव का दर्जा दिया गया है, लेकिन सुविधा और विकास के नाम पर केवल घोषणाएं ही हुई हैं। गांव के बाहर उनके नाम पर पार्क है, लेकिन उसकी हालत भी ठीक नहीं। पार्क के ऊपर एक जंगल है। एक पाहन हमें उस जंगल में ले जाते हैं और कुछ छोटे-बड़े पत्थरों का एक टीला है और उसमें एक बड़ा साल होल है, जिसमें पानी था। पाहन बताते हैं कि यहां हमेशा पानी रहता है। बुधु भगत यहीं आकर बैठते थे। पाहन यह भी कहते हैं पहले यहां 24 घंटे पानी निकलता था, लेकिन अब कभी-कभी। पानी कहां से आता है, किसी को पता नहीं। गांव के लोग इसे वीर पानी कहते हैं। इस पहाड़ पर एक शेड बना है। और, अक्सर इस ऊंचे जंगल में शेड के पास जुआ खेलते हुए कुछ नवयुवक मिल जाएंगे। गांव में कई जातियां है। उरांव की बहुलता है। यहां गांव में उरांव के चार श्मशान हैं और चार पाहन भी।

सिलागाई की खास बात यह है कि इसे शहीद गांव का दर्जा दिया गया, बाकी सुविधा कुछ नहीं। यहां एक आंगनबाड़ी केंद्र है, जिसे आदर्श बनाने की कोशिश की गई है। इसकी दीवार पर एक सूचना है-मद-शहीद ग्राम विकास योजना अन्तर्गत 2017-18। योजना का नाम : चान्हो प्रखंड के शिलागांई में आंगनबाड़ी केंद्र के समीप शौचालय, चारदीवारी स्टैचू एवं सुंदरीकरण कार्य। प्राक्कलित राशि-7,19, 420। शौचालय का दरवाजा टूट चुका है। स्टैचू का बेस भी टूट चुका है। ले-देके एक चारदीवारी बची है। आंगनबाड़ी केंद्र के सामने ही चार जलमीनार बने हैं, जहां पानी ही नहीं आता। वीर बुधु परिवार की सदस्य व पूर्व मुखिया अंजू देवी कहती हैं इसे शहीद गांव का दर्जा दिया गया, लेकिन सुविधा कुछ नहीं। आंगनबाड़ी केंद्र भी केवल नाम का है। यहां सात लाख का काम हुआ, लेकिन देखिए। लगता है कि इसमें सात लाख खर्च हुआ है। गांव की की कहानी आप सुन लिए। अब वीर बुधु भगत की कहानी भी जानिए।


वीर बुधु भगत का जन्म रांची जिले के सिलागाई गांव में 17 फरवरी, 1792 ई. में हुआ था और 14 फरवरी, सन् 1832 ई. में ये शहीद हो गए। यानी फरवरी में ही जन्म और फरवरी में ही शहीद। डॉ महेश भगत एक दंतकथा बताते हैं कि जब अंग्रेजों से जब वीर बुधु युद्ध कर रहे थे तो उनका तीर उनके आंगन में गिरा व सिर घर में। धड़ भी गांव के बाहर एक टुंगरी पर। इसलिए, जहां सिर गिरा, वहां पिंड बनाकर आज भी पूजा होती है। वीर बुधु भगत 1831-1832 के 'लरका विद्रोहÓ के नायक रहे। बुधु बचपन से ही जमींदारों और अंग्रेजी सेना की क्रूरता देख रहे थे। तैयार फसल जमींदार ले जाते और गांव के गरीब भूख रह जाते। बालक बुधु भगत कोयल नदी के किनारे बैठ इस क्रूरता के निजात के बारे में सोचते रहते। फिर तीर-तलवार चलाने में निपुणता प्राप्त की और फिर युद्ध छेड़ दिया। अपने दल को गुरिल्ला युद्ध में दक्ष बनाया। इसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। अंतत: अंग्रेज सरकार ने बुधु भगत को पकडऩे के लिए कैप्टन इंपे को भेजा। 14 फरवरी 1832 ई. को बुधु और उनके साथियों को कैप्टन इंपे ने  घेर लिया। कैप्टन ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। अंतत: बुधु भगत अपने सैकड़ों साथियों के साथ शहीद हो गए। अब गांव में जयंती व शहीद दिवस पर मेला लगता है। नेता जाते हैं, घोषणा करते हैं। इसी तरह की एक घोषणा पिछले साल सीएम ने किया था कि उनके पैतृक घर के फर्श पर टाइल्स बिछवा देंगे। घर वालों ने कहा, साहेब, भला मिट्टी के घर में टाइल्स कहां शोभा देगी। पहले घर तो पक्का का बनवा दीजिए। परिवार के सदस्य साल भर से इसका इंतजार कर रहे हैं। हां, विकास के नाम पर गांव की सड़क जरूर पक्की हो गई है। बिजली आती-जाती रहती है। 

हाशिए पर टाना भगत


   टाना भगत आदिवासियों का वह समूह है, जिसने अपना एक अलग धर्म चलाया, जिसे टाना धर्म कहा गया। तब के रांची जिले में ही 1914 में उरांव जनजाति के बीच यह धर्म अस्तित्व में आया। टाना धर्म पूर्णतः अहिंसा पर आधारित है। रामचंद्र चौधरी ने लिखा है, ‘बिशुनपुर थाना के पास चिंगरी गांव में जतरा उरांव नामक एक 20 साल के नवयुवक ने इस पंथ को चलाया। कहते हैं, एक दिन वह पोखर में स्नान करने गया था। वहां पानी के भीतर उसे धर्मेश ईश्वर का दर्शन हुआ। धर्मेश ने उसे मंत्रा दिया। पानी के भीतर से ‘टाना बाबा, टाना बाबा’ स्वर उच्चरित करते हुए जतरा निकला। उसने धर्मेश के दर्शन की बातंे लोगों को बताईं-हमें भूत प्रेत और विविध बोंगाओं की पूजा छोड़ देनी चाहिए। हम सात्विकता में रहें और एक ईश्वर की उपासना करें। बलि की प्रथा बंद करें। हड़िया की तपावन की जगह शुद्ध जल और दूध का तपावन दें। परंपरागत शिकार प्रथा बंद करें। जने धारण करें। गो सेवा में लगें। जीव हत्या न करें। भगवान का भजन करें।’
   जतरा का जन्म गुमला जिले के चिंगरी नावाटोली गांव में 1888 को हुआ था। पिता का नाम कोहरा भगत व माता का नाम लिवरी भगत था। बुधनी भगत इनकी पत्नी का नाम था। जतरा के जन्म की तिथि ज्ञात नहीं पर, टाना भगत गांधी जयंती के दिन ही जतरा की जयंती भी मनाते हैं। तुरिया भगत से तंत्रा-मंत्रा की विद्या सीखने के क्रम में इन्हें 1914 में अचानक आत्मबोध हुआ। अंगरेजी राज के अत्याचार, जमींदारों की बेगारी, समाज में फैले अंधविश्वास एवं नाना प्रकार की कुरीतियांे से पीड़ित आदिवासी समुदाय को सन्मार्ग दिखाने का संकल्प लेकर युवा जतरा उरांव जतरा भगत बन गया। जतरा ने अपना मंत्रा लोगांे को दिया। वह रोग निदान भी करने लगा। बहुत से लोग उसके पंथ में चले आए और अनुयायी बन गए। जतरा टाना बाबा बन गए। हालांकि विरोध भी हुआ, लेकिन टाना पंथ आगे बढ़ता चला गया। जतरा के प्रचार से जमींदार, महाजन और अंगरेजी सरकार चौकन्ना हो गई। जतरा को उसके सात साथियों के साथ गिरतार कर लिया गया और डेढ़ साल की सजा हो गई। तब बटकुरी गांव की देवमनिया ने टाना नेतृत्व संभाला और प्रचार करने लगी। रांची, पलामू, हजारीबाग तथा अन्य क्षेत्रों में कोई ढाई लाख लोग टानापंथी बन गए। प्रारंभ में उरांव वर्ग में सादगी, स्वच्छता जैसी सुधारवादी नीयत से काम होने लगा। बाद में महाजन, कुछेक जमींदार और सरकार के विरुद्ध आंदोलन शुरू हो गया। अपने अनुयायियों को मजदूरी करने से रोकने के अपराध में 1916 में जतरा भगत को एक साल की सजा हुई और बाद में उसे इसे शर्त पर छोड़ा गया कि वह अपने नए सिद्धांत का प्रचार नहीं करेगा और शांति बनाए रखेगा। पर, जेल में मिली घोर प्रताड़ना के कारण जेल से बाहर आने के दो महीने के भीतर ही जतरा की मृत्यु हो गई। इस तरह जतरा भगत नेपथ्य में चला गया पर आंदोलन की धार तेज होने लगी। पलामू से लेकर सरगुजा तक यह फैल गया।
   टाना भगतों ने खुद के लिए नियम बनाए। वृहस्पतिवार को हल नहीं जोतने का निश्चय हुआ और इस दिन विश्राम और आपसी मंत्राणा का दिन रखा गया। इसके बाद टाना आंदोलन ने दूसरा ही रूप ले लिया। उन्हांेने खेती करना छोड़ दिया। बारदोली आंदोलन से प्रभावित टाना भगतों ने जमीन टैक्स, चौकीदारी टैक्स आदि देना बंद कर दिया। इसके बाद जमींदारों ने इनकी जमीन नीलाम करवाई।
   हरबंस भगत ने ‘टाना-आंदोलन’ नामक अपने एक लेख में इसके जन्म के कारणांे और आंदोलन की कहानी लिखी है। वे लिखते हैं कि टाना विविध देवताओं की पूजा नहीं करते। टाना अपने व्यक्तित्व तथा समाज में अहिंसक परिवर्तन पर विश्वास करते हैं। वह मानते हैं कि अहिंसक संघर्ष से बाधाएं दूर होती हैं।
                  ‘टाना भगतर सोना भगतर नीसा ओनन मना ननर।
                  टाना भगतर सोना भगतर अहड़ा मोखनन मना ननर।
                  टाना भगतर सोना भगतर अखड़ा बेचनन ननर।’

   यानी, टाना भगत सोने के समान उत्तम भगत है। वे मदिरा नहीं पीते। मांस नहीं खाते। वे नृत्य आदि का त्याग करते हैं। धुमकुरिया और शिकार से खुद को मुक्त किया। रंगीन कपड़ों से परहेज किया। किसी प्रकार का आभूषण भी नहीं पहनते। टाना ईमानदारी के साथ अपना जीवन बिताता है। वह पवित्रा जीवन व्यतीत करता है। गांधी टोपी व सफेद वस्त्रा ही पहनावा है। शंख, घंट, तिरंगा इनकी पहचान है। खाने को लेकर भी ये शुद्धता के आग्रही हैं। ये जहां जाते हैं, खुद बनाते हैं और खाते हैं। पानी तक दूसरों का नहीं पीते। इस परंपरा का पालन ये आज भी कड़ाई से करते हैं।
                     
   टाना भगतों का योगदान देश की आजादी में भी अभूतपूर्व रहा। पर, इन्हें वह सम्मान आज तक नहीं मिला। कुछ ताम्रपत्रा जरूर मिले, लेकिन उनकी जमीन नहीं मिली। इसके लिए ये आज भी अपनी लड़ाई अहिंसात्मक ढंग से जारी रखे हुए हैं। नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक ने इसकी कहानी सुनी, वादा किया, लेकिन वादे आज तक पूरे नहीं हो सके। अपने अधिकार और हक की लड़ाई ये आज भी लड़ रहे हैं। शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन के जरिए सरकार को अपनी बात भी सुनाते हैं, लेकिन सरकार इतनी संवेदनशील होती तो ये 66 सालों से लड़ते ही क्यों? खैर, समाज सुधार के साथ शुरू हुआ टाना भगत का आंदोलन जमींदारों और अंगरेजों के खिलाफ शुरू हो गया। गांधीजी से इनकी 1920 में मुलाकात ऐसी रही कि ये फिर गांधी के ही हो गए और पूर्ण अहिंसक भी। महात्मा गांधी 1920 में असहयोग आंदोलन को लेकर देश का दौरा कर रहे थे। उस दौरान वे रांची भी आए। गांधीजी के आने के बाद ही रांची में जिला कांग्रेस कमेटी का गठन किया गया। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ही टाना भगतों को गांधीजी से मिलवाया। गांधीजी से ये खासे प्रभावित हुए और अहिंसा की बात इनकी जंच गई। ये अपना वस्त्रा खुद चरखे पर बुनने लगे। सफेद कुर्ता और गांधी टोपी इनका डेस कोड हो गया। चरखा छाप तिरंगा इनका भगवान। चंवर व घड़ी घंट इनका संकेत चि बन गया। 1922 के गया कांग्रेस में करीब तीन सौ टाना भगतों ने भाग लिया। ये रांची से पैदल चलकर गया पहुंचे थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में इनकी संख्या तो पूछनी ही नहीं थी।
    पांच अक्टूबर, 1926 को रांची में राजेंद्र बाबू के नेतृत्व में आर्य समाज मंदिर में खादी की प्रदर्शनी लगी थी तो टाना भगतों ने इसमें भी भाग लिया। 1934 में महात्मा गांधी हरिजन-उत्थान-आंदोलन के सिलसिले में चार दिनों तक रांची में थे। इस समय भी टाना भगत उनके पास रहते थे। 1927 में साइमन कमीशन के बॉयकाट में टाना भगत भी शामिल थे। सन् 1942 के आंदोलन में तो टाना भगतों ने रांची पहाड़ी पर तिरंगा ही फहरा दिया था। टाना भगतों की जमीन तो अंगरेजी सरकार ने पहले ही नीलाम कर दी थी, फिर भी वे आजादी के आंदोलन से पीछे नहीं हटे, मार खाई, सड़कों पर घसीटे गए, जेल की यातनाएं सही, फिर भी गांधीजी की जय बोलते रहे, अंतिम दम तक। देश जब आजाद हुआ तो टाना भगतांे ने अपनी तुलसी चौरा के पास तिरंगा लहराया, खुशियां मनाईं, भजन गाए। आज भी टाना भगतों के लिए 26 जनवरी, 15 अगस्त व दो अक्टूबर पर्व के समान है। हरवंश भगत ने ‘पंद्रह अगस्त और टाना भगत’ लेख मंे बताया है कि ‘15 अगस्त को टाना भगत पवित्रा त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इस दिन टाना भगत किसी प्रकार खेती वारी आदि का काम नहीं करते। प्रातः उठकर ग्राम की साफ-सफाई करते हैं। महिलाएं घर-आंगन की पूरी सफाई करती हैं। स्नानादि के बाद समूह रूप में वे राष्टीय गीत गाकर राष्ट-ध्वज फहराते हैं। अभिवादन करते हैं। स्वतंत्रा भारत की जय, महात्मा गांधी की जय, राजेंद्र बाबू की जय, जवाहर लाल नेहरू की जय तथा सभी टाना भगतों की जय का नारा लगाते हैं। गांव में जुलूस निकालते हैं। प्रसाद वितरण भी करते हैं। अपराह्न आम सभा होती है। सूत काता जाता है और आपस में प्रेम और संगठन को दृढ़ करने की चर्चा होती है।’
   महात्मा गांधी के अहिंसा का प्रभाव टाना भगतों पर कितना था, इसे सिर्फ एक घटना से समझा जा सकता है। सोंधी बरवा टोली, रांची के निवासी थे विश्वामित्रा टाना भगत। वे गांधी के प्रति अटूट श्रद्धा रखते थे। उनकी धारणा थी कि गांधीजीकी अहिंसा का प्रताप जब है, तो सांप हिंसा पर उतारू नहीं हो सकते। और, अपने इसी विश्वास के बल पर उन्हांेने अपने घर में डेढ़ सौ विषधर सांपों को पाल रखा था। वे सांपों को अपने मकान में टोकरी के अंदर रखते थे। इन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग लिया और जेल की सजा भी काटी थी। डॉ राजेंद्र प्रसाद के साथ भी जेल में थे। 1961 में काफी वृद्धावस्था में इनका निधन हो गया।
  श्री नारायणजी ने अपने एक लेख ‘महात्मा गांधी और आदिवासी’ में भी इस बात की पुष्टि की है। लिखा है, ‘टाना भगत महात्मा गांधी के अनन्य भक्त बन गए। गांधीजी के आह्वान पर देश की आजादी के वे प्रथम श्रेणी के सिपाही बने। आजादी की लड़ाई में टाना भगतांे ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। कितने जेल गए, हजारों की जमीन नीलाम हुई, कितने जेल में खेत आए। स्वराज्य की लड़ाई में अहिंसा का व्रत लेकर जिस प्रकार टाना भगतों के समूह ने आहुति दी, उस प्रकार का उदाहरण भारत में कहीं और नहीं मिलता है। दस हजार परिवार करीब टाना भगतों का है। परिवार के सब के सब व्रतधारी बन गए और स्वराज्य का संवाद सुनने के लिए कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए सैकड़ों पांव पैदल गया, कानपुर, बेलगांव और कोकोनाडा गए। महात्मा गांधी इनकी अटूट आस्था से मुग्ध थे। वे दिल खोलकर मिलते। जब भेंट होती थी, इनसे गले मिलते थे। गांधीजी इनकी दयनीय दशा देखकर परेशान होते थे।’ उन्होंने आगे लिखा है, ‘महात्मा गांधी की आदत थी कि जब वे देश की किसी समस्या को व्यापक मानते थे, तो उसके हल के लिए पग उठाते थे। आंदोलन खड़ाकर अथवा सरकार का ध्यान आकृष्ट कर ही वे संतुुष्ट नहीं होते थे। अपनी शक्ति भर वे उस समस्या का हल करने के लिए रास्ता निकालते थे। स्वभावतः आदिवासी समस्या को जब देखा तो इसके हल के लिए उन्होंने विशेषकर ठक्कर बापा को उत्साहित किया और उनके इशारे पर ठक्कर बापा के साथ सैकड़ों कार्यकर्ता गुजरात, बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा आदि स्थानों मंे, आदिवासियों की सेवा कार्य में जुट गए। इस कार्य के लिए पहली संस्था गुजरात में भील सेवा मंडल बनी। फिर बिहार में आदिम जाति सेवा मंडल की स्थापना हुई। बापू इतने से ही संतुष्ट नहीं हुए। रचनात्मक कार्यकर्ताओं के लिए 14 सूत्राीय कार्यक्रम बना। उसमें भी आदिवासी सेवा को स्थान दिया गया। इस प्रकार यह महात्मा गांधी के प्रयत्न का ही परिणाम है कि आदिवासी समस्या की गणना भारत की समस्याओं में होने लगी। भारत के संविधान में उनको प्रमुख स्थान मिला।’
  श्री छोटानागपुरी ने अपने लेख ‘महात्मा गांधी और टाना भगत’ में बताया कि गांधीजी टाना भगतों के लिए क्या महत्व रखते थे, गांधी के बारे में उनके क्या विचार और आस्था थी, गीतों के माध्यम से इसे रखा है। जैसे तिरंगा, टाना भगतों के लिए महज तीन रंगों का झंडा नहीं था, तिरंगा उनके लिए सत्य, अहिंसा और दया का मंत्रा था। तिरंगा उनके लिए गांधी जी था। हरिवंश टाना भगत ने कुड़ुख में यह गीत लिखा है। यह गीत अब मंत्रा बन गया है...
                ‘तिरंगा झंडा भैरो नम्है राजी गही झंडा,
                तिरंगा झंडा नू, सत, दया अहिंसा, धरमदीस रादस
                तिरंगा झंडा नू, मा गांधीस दीम रादस।

देश की सामाजिक बुराइयों पर भी टाना भगतों ने गीत लिखे। अपने समाज में जागरूकता पैदा की...
              
                भारत छुआछूत नू कलंक मंजकी रहचा
                जाति-रीति गही भेद फैलार ही रहचा...
               प्रिस्थिति गही कारण महात्मा गांधी में ध्यान बरचा
               गीता रामायण नीति याद बरचा
               भारत उद्धार गीता रामायण बरचा
               महात्मा गांधीस कही कर्णधार बनचा
               सत, प्रेम, अहिंसा, राजनीतिक शास्त्रा बनचा
               असहयोग, सत्याग्रह स्वतंत्राता युद्ध गही अस्त्रा बनचा...

भावार्थ है, भारत छुआछूत के भेद से कलंकित हो गया था। जाति-पांति और रीति-नीति का भेदभाव फैला था...। परस्थिति के कारण महात्मा गांधी को ज्ञात हुआ, गीत और रामायण की नीति याद आई। भारत के उद्धारक गीता-रामायण ही हुआ और महात्मा गांधी देश के कर्णधार बने। सत्य, प्रेम, अहिंसा, राजनीतिक शास्त्रा बना और असहयोग सत्याग्रह स्वतंत्राता की लड़ाई अस्त्रा...।
एक गीत और है। इसमें गांधीकी लीला का वर्णन किया..
               गांधी बाबास बड़ा लीला धारेस
               चरेखा ले ले मेरे ओजदस
               अंग्रेज सरकार बड़ा पापी रहचा
               गांधी बाबासीन कैदी नंजा
               कैदी नंजा बरा लाबागे लागिया
               मं गांधीस अंग्रेजन खेचस चिचस...

अर्थ है, महात्मा गांधी बहुत लीला वाले महापुरुष थे। वे चरखा द्वारा सूत काते थे। अंगरेज बहुत आततायी थे। गांधी बाबा को कैद कर लिया था और मारना चाहा था, परंतु अंत में अंगरेज को भागना पड़ा।
             
   गांधी आज भी इनके दिल में बसे हैं

और अहिंसक तरीके से आज भी अपनी जमीन वापसी के लिए लड़ रहे हैं। यह लड़ाई वैसे तो आजादी के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी। सरकार ने इनकी जमीन वापसी की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी, लेकिन बहुतों को जमीन का आज भी इंतजार है। आजादी के तत्काल बाद, 1947 में ही इनकी जमीन वापसी का कानून बना। बिहार राज्य सरकार ने रांची जिला टाना भगत रैयत कृषि  प्रत्यावर्तन अधिनियम पारित किया, जिसके अनुसार सन् 1913 से 1942 तक स्वतंत्राता संग्राम के दौरान लगान नहीं देने पर नीलाम कर दी गई उनकी जमीन वापसी का प्रावधान है। इस अधिनियम के अनुसार प्रारंभ से अब तक का कुल 358 टाना भगतों को कुल 3722.26 एकड़ जमीन वापस की जा चुकी है एवं जमीन पर दखलकार विपक्षियों को कुल 13,05,669 रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में भुगतान किया गया है। ‘स्वतंत्राता दिवस विशेषांक, 12 अगस्त, 1976, अंक 28 । उक्त कानून में इनमें कुछ कमियां थीं। यह रांची तक ही सीमित था, जबकि कई अन्य जिलों के टाना भगतों को इससे लाभ नहीं मिलता था। फिर इस कानून को 1961-62 में संशोधित किया गया। 1970 के आदिवासी अंक ‘गणतंत्रा विशेषांक, अंक 50, 22 जनवरी, 1970 में जमीन वापसी के बारे में जानकारी दी गई थी। यह 1968-69 में जो जमीन वापसी की गई थी, उस बारे में जानकारी थी। उस समय कुल 1,200 मुकदमे दायर हुए। 232 परिवारों को लाभ मिला। 7,38,98 रुपये खर्च हुआ। 88 मामले लंबित दिखाया गया और 2,808 एकड़ 80 डिसमिल जमीन वापस की गई।  इसी अंक मंे यह सूचना भी थी कि 1966 में टाना भगत बोर्ड का गठन किया गया, जिसमें 14 टाना भगत इसके सदस्य थे। यह बोर्ड कल्याण विभाग के अधीन था। प्रत्येक महीने इसकी बैठक होने की बात कही गई थी, लेकिन चार-पांच महीने बाद ही बंद कर दी गई।
    ‘12 अगस्त, 1976, अंक 28 के स्वतंत्राता दिवस विशेषांक’ में ही एक टाना भगत पदाधिकारी ने लिखा है कि ‘टाना भगतों को सिर्फ जमीन वापस करा देना ही पर्याप्त नहीं था। इसलिए इनकी जमीन में कृषि की सुविधा प्रदान करने के लिए कल्याण विभाग से मिलने वाली सुविधाओं में भी कृषि अनुदान आदि में बैल एवं बीज आदि के वितरण में इन्हें प्राथमिकता दी जाती है। जमीन वापसी कानून से लाभान्वित टाना भगतों के अतिरिक्त कुछ वैसे टाना भगतों को वर्ष 1972 में सरकारी जमीन दी गई है। कुल 389 टाना भगतों को कुल 827.06 एकड़ जमीन सरकार से बंदोबस्त की गई है। इस प्रकार बंदोबस्त की गई जमीन में अच्छी किस्म की जमीन नहीं रहने पर भूमि कर्षण विभाग से कृषि योग्य बनाने के लिए संपर्क किया जा रहा है।’ इस पदाधिकारी ने यह भी बताया है कि ‘समय-समय पर किए गए सर्वेक्षण के आधार पर ये रांची के सदर अनुमंडल के रमांडर, बुड़मू, बेड़ो, लापुंग, लोहरदगा के कुड़ु, किस्को, लोहरदगा, सेन्हा व गुमला के घाघरा, बिशुनपुर, सिसई, पालकोट, चैनपुर, डुमरी, बसिया आदि क्षेत्रों में बसते हैं। टाना भगत परिवारों की संख्या कुल 2,356 है तथा इनकी जनसंख्या लगभग 13,000 है।’
    जमीन वापसी का संघर्ष आज भी चल रहा है। रह-रहकर टाना भगत राजभवन के समक्ष धरना देते आए हैं। फिर भी इनकी मांग और बात अनसुनी रह जाती है। कई संगठन और कई लोगों ने भी टाना भगतों की मदद की है। संघर्ष का उनका लंबा इतिहास है। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी और राहुल गांधी तक अपनी बात रख चुके हैं। फिर भी इनकी मांग पूरी नहीं हो सकी। टाना भगतों को न्याय दिलाने के लिए परमेशचंद्र सिंह ने अखिल भारतीय टाना विकास परिषद् नामक संस्था का गठन किया था। उन्होंने टाना भगतों को इंदिरा गांधी व राजीव गांधी से मिलवाया। ‘आदिवासी’ के गणतंत्रा दिवस विशेषांक, 1988 अंक, 51-52 में परमेशचंद्र सिंह ने एक लेख लिखा, ‘स्वदेश प्रेमी जन जातीय टाना भगत इतिहास के परिवेश में।’ उन्होंने अपने नेतृत्व में 28 दिसंबर, 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी से कलकत्ता में हो रहे अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में मिलवाया और अपनी बात सुनाई। प्रधानमंत्राी ने इन्हें पूर्ण आश्वासन दिया। यही नहीं, उन्हांेने इनके एक प्रतिनिधि को राज्यसभा में तथा प्रांतीय स्तर पर एक प्रतिनिधि को कौंसिल में भी मनोनीत करने का आश्वासन दिया। इसके बाद 3 जनवरी, 1984 को रांची के मेसरा में अखिल भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन के मौके पर भी परमेशचंद्र सिंह ने टाना भगतों को फिर प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी से मिलवाया। पर, इसी साल अक्टूबर में उनकी हत्या कर दी गई और आश्वासन भी उन्हीें के साथ दफन हो गया। पर, टाना भगतों ने हिम्मत नहीं हारी। परमेशचंद्र सिंह ने फिर इन्हें प्रधानमंत्राी राजीव गांधी से मिलवाया। यह दिसंबर 1985 की बात है। टाना भगतों ने राजीव गांधी को सम्मानित कर रस्म पगड़ी और मान पत्रा भेंट किया। प्रधानमंत्राी ने मार्च 1986 में इनकी नीलाम जमीन की वापसी के लिए बिहार के मुख्यमंत्राी बिंदेश्वरी दुबे को आदेश दिया। आदेश के बाद काफी लोगों को जमीनें मिलीं लेकिन फिर भी बहुतेरे टाना भगत आज भी नीलाम जमीन की वापसी के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।
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आदिवासी लोक कथाओं में बादलों की कड़क और बिजली

डॉ वेरियर ऐल्विन
भारतीय आदिवासियों के अधिकांश सृष्टि-संबंधी विश्वासों की पृष्ठभूमि में लोकप्रिय हिंदू-धर्म की परंपरा है और इंद्र, राम, भीम और कभी-कभी अर्जुन भी शास्त्र के महान पृष्ठों से आदिवासियों की गृह निर्मित पौराणिक-कथाओं को प्रेरणा देने तथा विविधता प्रदान करने के लिए चले आते हैं। बिजली मारुति के कतिपय अस्त्रों में से है और वज्र को तो पर्जन्य ने ही प्रयोग किया था।
कहा जाता है कि प्रथम पुरुष कीे आत्मा, बिजली रूप में, सबसे पहले
ऐन्थोवन ने, पश्चिमी भारत में प्रचलित विविध विश्वासों का अच्छा वर्णन किया है। बादलों की कड़क कभी इंद्र का रुष्ट स्वर है, तो कभी उसका अट्टहास। यह वह होहल्ला है, जो वह बादलों में 'गुल्ली-डंडाÓ या 'फुटबालÓ खेलते समय करता है। उसका विवाह होता है, वह युद्ध करता है, वर्षा लाने को अपना बाण चलाता है, या अपने हंटर से बादलों की पिटाई करता है। कभी बादलों की कड़क भगवान के रथ के आकाश में चलने से उत्पन्न हुई कही जाती है और यह उन नक्कारों की ध्वनि है, जो देवगण वर्षा के आने पर बजाते हैं, या यह किसी बूढ़े खूसट द्वारा आकाश में पत्थर लुढ़काने या पीसने की आवाज है।
पृथ्वी पर आई। महाभारत में कहा गया कि बिजली दधीचि की अस्थियों से निकली, पर एक और भी प्राचीन विश्वास है कि बिजली शेषनाग की फुंकार है, जो सांपों का राजा है। जिस प्रकार अग्नि काष्ठ का भक्षण करती है, उसी प्रकार बिजली जल का भक्षण कर लेती है। यह उस पर प्रहार करती है, जिसने 'बज्र-पापÓ या ब्रह्म-हत्या किया हो।

इस विषय की आदिवासी परंपराओं के अध्ययन से लेखन योग्य विविधता दृष्टिगोचर होती है और कम से कम छह अभिप्राय अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं। प्रथम और सबसे लोकप्रिय है कि बिजली एक लड़की है, जो विवाह-दिवस पर आकाश में भागी फिरती है और बादलों की कड़क उसके दुष्ट स्वामी का शोर है, जो उसके पीछे दौड़ रहा है। एक बैगा कथा वर्णन करती है कि किस प्रकार लक्ष्मण ने 'बीजलदाई कन्याÓ के लिए बारह वर्ष बिताए, जो दर्पण की भांति सुंदर थी, जिस पर एक युवक सूर्य की किरणों की प्रतिच्छाया डालता है। वह प्रकाश की भांति ही विलीन हो जानेवाली है। इस समय (12वर्ष) की समाप्ति पर उसके श्वसुर ने एक घड़ा, जिसमें उसी का रक्त भरा था, दिया और घर ले जाने और भीतर न देखने के लिए कहा। पर लक्ष्मण उसे अपने कक्ष में ले गया और खोल डाला। भीतर से उसकी वधू इतनी शक्तिशाली निकली कि छत को तोड़कर आकाश में जाकर बिजली बन गई। लक्ष्मण ने अपना धनुष-बाण संभाला ओर उसकी पीछा किया, घनगर्जन बादलों को चीरते हुए उसके बाणों का रव है।
 इसी प्रकार एक 'देवारÓ कथा में एक युवा नेता 'बेल कुंवरÓ का विवाह बीजल कन्या से होता है। वह एक बांस की नाल में छिप जाती है और उस नाल को बेल कुंवर के धनुष-बाण के साथ विवाह-स्तंभ के चारों ओर घुमाया जाता है। लड़का बांस को घर ले जाता है, पर रास्ते में-कितनी ही बार मना करने पर भी इसे मत खोलना-वह भीतर देखता है, उसकी वधू उछलकर बाहर निकल आती है ओर एक खोखले वृक्ष में छिप जाती है। बेल कुंवर उस पर बाण चलाता है, वह चरका देती है, बाण बांस के झुरमुट में लगता है। बेल कुंवर बार-बार बाण चलाता है, पर वह एक गांठ से दूसरी गांठ सरकती रहती है और अन्त में आकाश पर पहुंच जाती है। इस प्रकार बिजली अभी तक कुंवारी ही है और बादलों की कड़क सदा के लिए उसकी रुष्ट आवाज है, जब भी वह उसे देखता है, चिल्लाता है।
'कोंडÓ और 'सावराÓ कथाओं का अभिप्राय वही है। एक लड़की जो अग्नि सदृश सुंदर है, किसी लोहार के आसोत्र में ज्वालामय लोहे से उत्पन्न होती है। वह इतनी सुंदर है कि सभी लोहार उससे प्रेम करते हैं और एक ईष्र्यालु पत्नी उसे शाप देती है कि विवाह होने पर भी उसे अपने पति से सदा अलग रहना पड़ेगा। इस प्रकार जब उसका विवाह होता है तो पतिगृह जाते समय रास्ते में ही उसके कंधों में पंख निकल आते हैं और वह उड़कर आकाश चली जाती है।
ये मनोरंजक विचार हैं, पर कार्य-रूप में परिणित नहीं हुए। बिजली गिर जाना भयंकर तथा बुरी बात है। प्राय: यह पाप का दंड माना जाता है या किसी जातीय टैबू का तोडऩा। जिस वृक्ष या घर पर बिजली गिर जाती है, उसे भारी जादू से भरा समझा जाता है और वह बड़े विचार से स्पर्श या व्यवहार किया जाता है। 'सावराÓ लोगों का कहना है कि बिजली से मरने वालों की आत्मा पृथ्वी पर जुगनू बनकर लौट आती है और अपने अन्य जीवन को सदा जल-जलकर कष्ट में बिताती है।
                                                                                                                  (1959, विशाल भारत)