किताबों में नहीं, जीवन में समाया है आदि दर्शन

महाराष्ट्र का गढचिरौली जिला नक्सली हिंसा के लिए जब-तब सुर्खियों में रहता है, लेकिन इसी जिले का एक गांव मेढ़ा लेखा सामुदायिकता की नई कहानी लिख रहा है। यहां पांच सौ की आबादी है, लेकिन किसी के नाम जमीन नहीं। जो जमीन है, वह ग्रामसभा के नाम है। सामुदायिकता ही यहां के जीवन का आधार है।
रांची में चल रहे आदि दर्शन पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में भाग लेने आए मोहन हीरभाई हीरालाल व देवजी नवलू तोफा ने जागरण से अपने अनुभव साझा किए। तोफा ने कहा, यह गांव आदि दर्शन को जीता है। यहां किताबों में नहीं, जीवन में दर्शन का समावेश है। हीरालाल कहते हैं कि यहां 1000 हेक्टेअर में जंगल है और सौ हेक्टेअर में खेती होती है। जंगल व खेती पर पांच सौ आबादी का अधिकार है। अधिकार को लेकर कई बार वन विभाग के साथ अङ्क्षहसक संघर्ष भी हुआ। संघर्ष जब लंबा चला तो तत्कालीन वन-पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश गांव में आए और फिर उन्होंने कानून के अनुसार वन का अधिकार ग्रामसभा को दिया। वनोपज पर भी जंगल का अधिकार है। यहां बांस की प्रचुर खेती होती है। इसे ग्रामसभा ही बेच सकती है। निजी कुछ भी नहीं। खेती भी सामूहिक होती है। जब गांव में नए बच्चे का जन्म होता है तो उसका भी हक हो जाता है। वे जोर देकर कहते हैं, हमारा बस एक ही नारा है-'केंद्र व राज्य में हमारी सरकारÓ, 'मेरे गांव में हम हीं सरकार।Ó इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि केंद्र व राज्य में हमारी सरकार है, यानी हमारे प्रतिनिधि वहां हैं, जिन्हें अपना वोट देकर भेजते हैं, लेकिन गांव में हमारी सरकार होगी यानी ग्रामसभा की। यहां सभा में हर परिवार से एक महिला-एक पुरुष का भाग लेना अनिवार्य है। यदि एक भी अनुपस्थित रहता है या एक भी व्यक्ति किसी योजना या विचार से सहमत नहीं होता है, उसे लागू नहीं किया जाता है। हमारे यहां सब काम सर्व सहमति से होता है। इसके तीन मूलाधार है-अध्ययन, अङ्क्षहसा व सर्वसहमति। अध्ययन यानी अपने हक-कानून को जानना। वे इस गांव में 1986 में अध्ययन के सिलसिले में आए थे फिर यह गांव-घर भी अपना ही हो गया।
तोफा जनजाति समुदाय हैं। इसे कोया कहते हैं। बाहरी लोग गोंड नाम से पुकारते हैं। तोफा कहते हैं, जो बाहरी लोग आदिवासियों के जीवन का अध्ययन करने आए, गोंडवाना लैंड पर जो आदिवासी आबादी रहती है, उसे गोंड नाम दे दिया जबकि हम सब कोया है यानी इंसान। जैसे झारखंड के हो। हो का मतलब आदमी होता है। तोफा आदि दर्शन के बारे में ईश्वर की अवधारणा जैसी हमारे यहां ऐसी कोई अवधारणा नहीं है। हां, कोया भाषा का एक शब्द है पेन। हम उसे ही पेन कहते हैं, जो हमारे समाज का ऐसा कोई आदमी जो समाज के लिए बड़ा काम किया हो। सीएए व एनआरसी के सवाल पर कहते हैं कि हमारे यहां इसकी कोई समस्या नहीं है। हमारी ग्रामसभा बहुत मजबूत है। जब जिसे 'आदिवासीÓ कहते हैं, उसे सरकार भी मान लेती है। हम कानून को मानने वाले हैं। हम अपनी आजादी के साथ दूसरों की आजादी की भी कद्र करते हैं। हां, चलते-चलते हीरालाल जरूर कहते हैं, यहां आदि दर्शन पर सेमिनार हो रहा है, लेकिन वनाधिकार पर कोई बात नहीं कर रहा, जबकि जंगल के बिना आदिवासी का अस्तित्व नहीं। यही उसके जीवन का दर्शन है।

धरती के हर प्राणी की चिंता करता है आदिवासी

हैदराबाद से आए डॉ सुरेश जगन्नाथम झारखंड के आदिवासी असुर-बिरजिया की मौखिक परंपरा पर काम कर चुके हैं। वे घुमंतू शोधार्थी हैं। केरल-कर्नाटक आदि प्रदेशों के आदिवासियों पर भी काम कर चुके हैं। खुद भी आदिवासी हैं। वे आदिवासी दर्शन के बाबत कहते हैं, आदिवासी केवल मनुष्य की चिंता नहीं करता। उसके चिंता के केंद्र में धरती का हर प्राणी और पूरा ब्रह्मांड है। वे कहते हैं, इस चिंता में हमारा पूरा मौखिक साहित्य भरा पड़ा है। वे नेतरहाट के असुरों के एक लोकगीत का जिक्र करते हैं। अभी आस्ट्रेलिया के जंगल में आग से लाखों जानवर मर गए। यहां सैकड़ों साल से यह गीत मौखिक परंपरा से चला आ रहा है-जंगल जल रहे हैं, जीव-जंतु भाग रहे हैं। शेर-भालू भाग रहे हैं, लेकिन जो छोटे-छोट जीव हैं, रेंगने वाले जीव हैं, वह कैसे भाग पाएंगे? इस गीत में छोटे जीव-जंतु के प्रति करुणा है, संवेदना है। दरअसल, यही आदि दर्शन है। 
वे कहते हैं, आदिवासी प्रकृति से अलग नहीं रह सकता है। तथाकथित सभ्य संस्कृति ने आदिवासियों से बहुत कुछ लिया, लेकिन आज वे पिछड़ा मानते हैं। सुरेश इसे एक उदाहरण से समझाते हैं। वे कहते हैं कि केरल में जब आप किसी के घर जाएंगे तो पानी जो मिलेगा, उसमें कुछ मिला हुआ होगा। वे जीरा को उसमें मिलाते हैं। यहां की जलवायु के लिए यह जरूरी है। लेकिन इसका मूल आदिवासी है। आदिवासियों में यह परंपरा मिलती है, जिसे लोगों ने अपनाया। अभी मकर संक्राति का पर्व बीता है। हम लोग भी मकर संक्राति मनाते हैं, लेकिन मकर संक्रांति के तीन तीन बाद। हम इसमें अपने पूर्वजों को याद करते हैं। हम पांच से सात पीढ़ी तक के पूर्वजों को उनके पसंद के व्यंजन परोसते हैं। पीढिय़ों से चले आ रहे इस विश्वास को अगली पीढ़ी को सौंपते हैं। इसमें किसी प्रकार का तर्क नहीं, यह हमारा विश्वास है। इसका मकसद यही है कि हम अपने पूर्वजों को कतई न भूलें।
वे इस बात पर चिंता व्यक्त करते हैं कि आज धरती को उपभोक्तावादी संस्कृति लील रही है। जल, जंगल, जमीन खत्म होते जा रहे हैं। जहां आदिवासी आबादी है, वहीं जंगल सुरक्षित है। चाहे अपने देश की बात हो या विदेश की। आदिवासी संस्कृति का मूल एक ही है, भले भाषा अलग-अलग हो। आज हमारी भाषा, संस्कृति के सामने भी कई चुनौतियां हैं। इनका सामना करना होगा। हवा, पानी की शुद्धता जंगल पर निर्भर है, लेकिन जंगलों को बेरहमी से काटा जा रहा है। इस विकास के मॉडल को बदलना होगा।

विवेकानंद ने सात बार की थी बाबा धाम की यात्रा

स्वामी विवेकानंद देवघर करीब सात बार आए। पहली बार 1887 की गर्मियों में, जब वे बीमार हो गए थे। गुरु भाइयों के अनुरोध पर जलवायु परिवर्तन के लिए वे वैद्यनाथ और सिमुलतला आए। गुरु भाइयों ने भिक्षा मांगकर स्वामी विवेकानंद को यहां भेजा था, लेकिन वे बहुत दिन रह नहीं पाए। दो साल बाद फिर वे यहां आए। यहां से तब कई पत्र लिखे। एक पत्र 24 दिसंबर, 1889 को स्वामीजी ने बलराम बसु को लिखा था...'मैं वैद्यनाथ में कुछ दिनों से पूर्ण बाबू के निवास-स्थान में ठहरा हंू। यहां उतनी ठंड नहीं है, और मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है, शायद यहां के पानी में लोहा अधिक होने के कारण मुझे अपच की शिकायत हो रही है। मुझे तो अपने अनुकूल यहां कुछ भी नहीं मिला-न स्थान, न मौसम और न साथी ही।Ó यहां की जलवायु उनके स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं थी। इसलिए वे बहुत दिन तक यहां रह नहीं पाए। यह पत्र लंबा है। उन्होंने यहां गोविंद चौधरी का जिक्र करते हैं। उनके बारे में तरह-तरह की उड़ रही बातों का उल्लेख भी इस पत्र में किया है। दो दिन बाद उन्होंने 26 दिसंबर को यहां से प्रमदादास मित्र को पत्र लिखा। यह अपेक्षाकृत छोटा है। करीब दस पंक्तियों का। यहां एक सूचना दर्ज है-'मैं यहां कलकत्तानिवासी एक सज्जन के मकान पर दो चार दिन से हूं-किंतु वाराणसी के लिए चित्त अत्यंत व्याकुल है।Ó यहां से वे वाराणसी नहीं, सीधे इलाहाबाद जाते हैं।
एक साल बाद 1890 के अगस्त में वे भागलपुर आए थे। यहां से वे अखंडानंद जी के साथ लखीसराय और वहां से देवघर आए। अखंडानंदजी लिखते हैं, 'इसके पूर्व मेरा वैद्यनाथ दर्शन नहीं हुआ था। बाबा का दर्शन करने के लिए मैंने स्वामीजी से बड़ा आग्रह किया और हठपूर्वक उन्हें वैद्यनाथ ले आया। भागलपुर से देवघर की दूरी 126 किमी है। वहां पहुंचकर उन्होंने शिव का दर्शन-पूजन आदि किया और उसके बाद बंगाल के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता राजनारायण बोस से मिलने गए।Ó राजनारायण बोस समाज सुधारक व ब्रह्मसमाज के नेता थे। वे उन दिनों देवघर के ही 'पुराना दहÓ इलाके में रहते थे। यह मुलाकात काफी रोचक थी...। महेंद्रनाथ दत्त ने लिखा है कि, बोस महाशय के साथ नरेंद्रनाथ की पुरानी तथा आधुनिक काल की घटनाओं, ब्रह्मसमाज आदि विषयों पर कई तरह की चर्चा होने लगी। बातचीत के दौरान नरेंद्रनाथ ने पूछा-आपका स्वास्थ्य इतना बिगड़ कैसे गया? बसु महाशय ने सरल तथा निष्कपट भाव से बताया, मद्य, मद्य, मद्य। नया-नया अंग्रेजी भाव देश में प्रविष्ट होने पर, उसके साथ-साथ यह धारणा भी प्रविष्ट हुई कि मद्यपान किए बिना न पढ़ाई-लिखाई होगी और न ही देश का काम हो सकेगा। इसलिए हम लोगों ने मद्यपान शुरू किया।....इसी से स्वास्थ्य चौपट हो गया। कुछ समय बाद जब स्वामीजी का नाम विश्व में प्रसिद्ध हो गया तब राजनारायण बाबू को समझ में आया कि ये ही संन्यासी तो कई साल पूर्व उनसे मिलने आए थे, तब उस भेंट की घटना उनकी स्मृति पटल पर उभर आई। हालांकि यह भी कहा जाता है कि 1898 में भी वे देवघर आए थे और वृद्ध राजनारायण बाबू से मिलने गए थे। उन्होंने स्वामीजी से दोपहर को वहीं भोजन करने का अनुरोध किया और उस दिन स्वामीजी ने स्वयं ही भोजन पकाया था। हालांकि इस बार वे वैद्यनाथ धाम में राजनारायाण बाबू के यहां रात बिताने के बाद अगले दिन वाराणसी के लिए चल पड़े। हालांकि वे वाराणसी सीधे नहीं गए। 30 दिसंबर, 1889 को उन्होंने इलाहाबाद से पूज्य पाद बलराम बसु को पत्र लिखा था। इसके बाद वे 21, जनवरी 1890 को गाजीपुर पहुंचे। यहां वे अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक रहे और प्रसिद्ध संत पवहारी बाबा का दर्शन किया। यहां भी वे अपने कमर दर्द व बुखार को लेकर परेशान थे। गाजीपुर में वे अपने बाल्यबंधु सतीशचंद्र मुखर्जी के आवास पर ठहरे थे। बाद में उन्होंने पवहारी बाबा नाम से एक छोटी सी पुस्तिका लिखी और इस तरह गाजीपुर के इस संत को उन्होंने विश्व में पहुंचाया। एक लंबे अंतराल के बाद विवेकानंद फिर देवघर आए। तीन जनवरी, 1898 को उन्होंने देवघर से एक बंगाली शिष्या को पत्र लिखा। 23 दिसंबर 1900 को भी उन्होंने देवघर से ही मृणालिनी बसु को पत्र लिखा था। यानी, उनकी देवघर आना-जाना लगा रहा। भले ही उनको यहां की जलवायु पसंद नहीं थी। विवेकानंद निरंतर यात्रा करते रहे और संतों से मिलते रहे। यह यात्रा अंदर की भी थी और बाहर की भी।    

ताड़ीघाट स्टेशन पर भूखे-प्यासे विवेकानंद


जब विवेकानंद गाजीपुर से गंगा के उस पार स्थित ताड़ीघाट स्टेशन पर उतरे, तब तक दोपहर बीत चुकी थी। स्टेशन के चौकीदार ने स्वामीजी को प्लेटफार्म के ऊपर बने शेड की छांव में नहीं बैठने दिया। विवश होकर वे विश्रामागार के बाहर ही जमीन पर अपना कंबल बिछाकर एक खंभे के सहारे बैठ गए। स्वामीजी ने सुबह से कुछ खाया नहीं था। उनके बिल्कुल सामने शेड के नीचे एक बनिया बड़े आराम से अपनी दरी पर बैठा था और थके-मांदे स्वामीजी को तरह-तरह से चिढ़ाने की चेष्टा कर रहा था। उसने कहा, 'अरे, देखो, पैसे में कितनी शक्ति है। तुम तो पैसा-कौड़ी रखते नहीं और उसका फल भी भोग रहे हो। परंतु मैं रुपये पैसे कमाता हूं और मेरी मौज मस्ती देख लो।Ó यह कहकर वह अपने साथ लाए खाद्य पदार्थों को खोलकर खाने लगा तथा स्वामीजी को वह सब दिखा-दिखाकर कहने लगा-'ये सारी पूडिय़ां, पेड़े, मिठाइयां क्या बिना पैसे के मिल सकती हैं?Ó
स्वामीजी सब कुछ चुपचाप सहे जा रहे थे। तभी अचानक वहां एक अन्य व्यक्ति आ पहुंच। उसके दाएं हाथ में एक गठरी तथा एक लोटा और बाएं हाथ में एक सुराही जल तथा एक दरी थी। प्लेटफार्म पर चारों ओर कई चक्कर लगाने के बाद वह स्वामीजी के पास आकर बोला-'बाबाजी, आप धूप में क्यों बैठे हैं? छांव में चलें। मैं आपके लिए कुछ भोजन-पानी लेकर आया हूं, कृपया ग्रहण करें।Ó
स्वामीजी सहसा विश्वास नहीं कर सके। आए हुए व्यक्ति द्वारा बारंबार भोजन के लिए अनुरोध करने पर स्वामीजी ने कहा-'भाई, मुझे ऐसा लगता है कि तुम भूल कर रहे हो। शायद किसी दूसरे को देने के लिए आए थे और गलती से मेरे पास चले आए हो।Ó इसके बाद भी उस व्यक्ति ने कहा, 'नहीं, नहीं, आप ही तो वे बाबाजी हैं, जिन्हें मैंने देखा था।Ó स्वामीजी ने उत्सकुतावश पूछा-'इसका मतलब? तुमने मुझे कब देखा?Ó
तब उसने सारा वाकया स्पष्ट करते हुए कहा-'देखिए, मैं एक हलवाई हूं। मेरी मिठाइयों आदि की दुकान है। दोपहर को भोजन के बाद मैं लेटकर विश्राम कर रहा था, उसी समय समने में देखा कि रामजी आकर मुझसे कह रहे हैं-मेरा एक साधु स्टेशन पर भूखा-प्यासा पड़ा हुआ दुख भोग रहा है। सुबह से ही उसने कुछ खाया-पीया नहीं है। तू तुरंत जाकर उसकी सेवा कर।Ó मैंने इसे अपने मन का भ्रम समझा और करवट बदलकर फिर सो गया। परंतु श्रीरामजी कृपा करके पुन: आए और मुझे धक्का देकर उठा दिया। फिर उन्होंने जैसा पहले कहा था, वही करने का आदेश दिया। तब मैं बिस्तर छोड़कर उठा और तंबाकू लेकर मैं यथाशीघ्र स्टेशन आ गया।
स्वामीजी ने फिर जानना चाहा, 'तुमने यह कैसे जाना कि वह साधु मैं ही हूं?Ó हलवाई बोला, 'पहले मुझे भी संदेह हुआ था, इसीलिए यहां आते ही मैंने एक बार चारों ओर घूमकर देख लिया, किंतु अन्य किसी साधु को न देखकर समझ गया कि वह साधु आपके सिवा कोई अन्य नहीं हो सकता।Ó इसके बाद उसने स्वामीजी को छाया में बैठाकर खाना खिलाया। भोजन के बाद हाथ पर पानी डालकर धुला दिया और धूम्रपान के लिए चिलम भर दी। स्वामीजी द्वारा धन्यवाद दिए जाने पर उसने कहा-'नहीं, नहीं, स्वामीजी, मुझे धन्यवाद मत दीजिए, यह बस रामजी की लीला है।Ó

अपने ही गांव घर में उपेक्षित हैं जयपाल सिंह

झारखंड को एक नई दिशा देने वाले जयपाल सिंह मुंडा अपने ही गांव में उपेक्षित हैं। गांव में उनका पुश्तैनी घर ढह रहा है। उनकी कब्र भी गांव में उदास पड़ी हुई है। हम अपने नायकों का इसी तरह सम्मान करते हैं। जबकि बिरसा मुंडा के बाद जयपाल मुंडा ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिनकी आवाज देश में नहीं नहीं, विदेशों में भी गूंजती थी। ऑक्सफोर्ड में उनकी पढ़ाई का यह नतीजा रहा कि वे आदिवासियों के हित के लिए संविधान सभा और उसके बाद संसद में अपनी आवाज पूरी तार्किकता से उठाई। संसद में तब उन्होंने कहा था-'आदिवासियों को लोकतंत्र का पाठ न पढ़ाया जाए।Ó
इस महानायक का जन्म खूंटी जिले का टकरा गांव में धरती आबा बिरसा मुंडा के शहीद होने के दो साल बाद 1903 में हुआ था। रांची से इसकी दूरी 11 मील है। उनके पिता अमरू परंपरागत रूप से मुंडा समाज के पाहन थे। पाहन यानी पुजारी। रांची से पढ़ाई की यात्रा शुरू हुई तो विदेश में जाकर रुकी। वहीं से हॉकी में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। इसके बाद भारत लौटे से पढ़ाने का काम किया और फिर अलग राज्य के लिए झारखंड आंदोलन में सक्रिय हो गए।
जयपाल सिंह पर पुस्तक लिखे संतोष किडो कहते हैं कि झारखंड के सपूत शहीद जयपाल ङ्क्षसह मुंडा भले ही हॉकी चैंपियन के रूप में विश्वभर में अपनी एक अलग पहचान बनाई, लेकिन अपने गांव-घर और सूबे में उपेक्षित हैं। मुंडा का पैतृक घर लोग विदेशों से भी देखने आते हैं जो पूरी तरह से धंस चुका है। अब यहां सिर्फ खंडहर दिखता है। यहां हर साल बड़े-बड़े नेता उनकी पुण्यतिथि व जयंती पर ही आते हैं। उनके पैतृक घर के जीर्णोद्धार की बात किसी को नहीं सुझती। इतना तो उन्होंने काम कर ही दिया कि वहां एक भव्य स्मारक बन सके और एक पुस्तकालय, जहां उनसे जुड़ी पुस्तकें, उनके सामान प्रदर्शित हो सकें और जो बाहर से यहां देखने आएं, वे खुद को धन्य कर सकें। अब केंद्रीय मुत्री व खूंटी सांसद अर्जुन मुंडा ने उनके गांव को आदर्श गांव बनाने की घोषणा कर दी है, लेकिन यहां अन्य शहीदों के आदर्श गांव को देखें तो कोफ्त ही होती है। रांची शहर में बना उनके नाम का स्टेडियम अब नाम का रह गया है। कोई सड़क, उनके नाम से कहीं जाती हो, पता नहीं।
संविधान सभा से लेकर संसद व सड़क तक आदिवासियों की आवाज रहे जयपाल सिंह मुंडा ने झारखंड अलग राज्य के लिए अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया था, जिसका खामियाजा उन्हें व उनकी पार्टी को भुगतना पड़ा, क्योंकि कांग्रेस ने उन्हें धोखा दे दिया। संसद में नेहरू से इस पर सवाल भी किया। बाद में उन्हें विलय को लेकर पछतावा हुआ। 13 मार्च 1970 को रांची में आयोजित झारखंड पार्टी के सम्मेलन में पार्टी में लौटने की सार्वजनिक घोषणा की, लेकिन 20 मार्च को उनका निधन। बहुत कम लोग जानते हैं कि तत्कालीन बिहार सरकार में वे मात्र 29 दिन उपमुख्यमंत्री भी रहे।
जयपाल सिंह के भाषणों को पहली बार हिंदी में लाने वाले अश्विनी कुमार पंकज उनके राजनीतिक कॅरियर पर कहते हैं, दिसंबर 1938 की बात है जब वर्षों बाद जयपाल सिंह मुंडा बिहार-झारखंड आए। वे पहले पटना पहुंचे और फिर रांची। अपने गांव टकरा पाहनटोली भी गए। इंग्लैंड जाने के ठीक बीस साल बाद बिहार-रांची की यह उनकी पहली यात्रा थी जो उनके जीवन की वह महत्वपूर्ण घटना है, जिसने न सिर्फ उनके व्यक्तिगत जीवन को पूरी तरह से बदल डाला, बल्कि भारतीय राजनीति में एक ऐसे शख्सियत का उदय हुआ जिसने झारखंड आंदोलन को राजनीतिक मैदान में 'फुल बैकÓ तो बनाया ही, सदियों से देश के करोड़ों आदिवासियों की उपेक्षित आवाज को, उनके नैसर्गिक अधिकार के सवाल और आदिवासियत की पहचान को औपनिवेशिक एवं अंतर औपनिवेशिक भारत में अदम्य साहस के साथ स्थापित किया।
वे आगे बताते हैं, 'आदिवासी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, 'यह मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवसरों में से एक है। मैं लगभग बीस साल से आप लोगों के बीच में नहीं था। अब आप हमारी आर्थिक और राजनैतिक आजादी के लिए, आगे आने वाले संघर्ष में मुझसे नेतृत्व करने के लिए कह रहे हैं। आप मुझे अपने एक ऐसे सेवक, जो आपकी सेवा करे, मुझे आमंत्रित कर सर्वोच्च सम्मान दे रहे हैं। ...मैं पूर्ण निष्ठा के साथ स्वयं को उस कार्य के लिए जो आप मुझे सौंप रहे हैं, उसके महती उत्तरदायित्व तथा महान कठिनाइयों को पूरी तरह समझते हुए समर्पित करता हूं।Ó अपने इस वचन को जयपाल सिंह मुंडा ने आजीवन निभाया। अपने अद्भुत सांगठनिक कौशल से उन्होंने आदिवासी सभा को 'अखिल भारतीय आदिवासी महासभाÓ में बदल दिया। स्वतंत्रता की ओर बढ़ते भारत के नए लोकतांत्रिक समाज में आदिवासियों की हक और भागीदारी के लिए राजनीतिक दल 'झारखंड पार्टीÓ बनायी। संविधान सभा में देश के आदिवासियों की इच्छा को बुलंद किया। आदिवासी भाषा, संस्कृति और पुरखा स्वशासन व्यवस्था का पारंपरिक हक संविधान में शामिल हो, इसकी पुरजोर वकालत की। अलग झारखंड राज्य की मांग को राजनीतिक रूप से स्थापित किया। संविधान सभा की बैठक में उन्होंने कहा था, 'आदिवासी दुनिया के सबसे प्रजातांत्रिक समुदाय हैं। नए बनते भारत और भारतीय समाज को आदिवासियों से लोकतंत्र सीखना होगा।Ó


उनके जीवन की कुछ महत्वपूर्ण तिथियां
1950 : एक जनवरी को जमशेदपुर में आयोजित आदिवासी महासभा में राजनीतिक पार्टी 'झारखंड पार्टीÓ की घोषणा।
1951 : मार्च में हुए प्रांतीय एवं केंद्रीय चुनाव में झारखंड पार्टी के 32 विधायक व चार सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न मुर्गा पर जीते। रांची पश्चिम यानी खूंटी से जयपाल सिंह चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
1957 : चुनाव में झारखंड पार्टी के 34 विधायक व पांच सांसद चुनाव जीते। जयपाल सिंह खूंटी से पुन: जीत हासिल की।
1962 : झारखंड पार्टी के 22 विधायक व पांच सांसद जीते। खूंटी से तीसरी बार जीत हासिल की।
1963 : 20 जून को झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय।
3 सितंबर को राज्यपाल ने रांची में उपमुख्यमंत्री की शपथ दिलाई। पंचायत एवं सामुदायिक विकास विभाग का मिला प्रभार।
2 अक्टूबर को मंत्री पद से हटाए गए। मात्र 29 दिन मंत्री रहे।
1966 : कांग्रेस से खूंटी सीट पर लगातार चौथी बार जीत हासिल की।
1970 : 13 मार्च को रांची में आयोजित झारखंड पार्टी के सम्मेलन में पार्टी में लौटने की सार्वजनिक घोषणा की।
-20 मार्च को उनका निधन।
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धधकता-बदलता पलामू


पलामू का नाम आते ही जो सबसे पहले छवि बनती है, वह है अकाल, भूख और बंधुआ मजदूरी की। पलामू यानी मृत्यु उपत्यका। इस छवि के निर्माण में कुछ तो प्रकृति की भूमिका रही तो कुछ नव सामंतों और जमींदारों की। इस छवि से पलामू आज भी मुक्त नहीं है। अकाल आज भी एक दो बरस के अंतराल के बाद आ ही जाता है। इसके बाद भूख का नर्तन शुरू होता है। इस नर्तन को बड़े शौक से पलामू के अधिकारी और नेता देखते हैं, क्योंकि अकाल-सूखा इनकी झोली और तिजोरी को भरने का काम करता है। यह खेल आज से नहीं, 1967 से और उसके पहले से चला आ रहा है। तब कई योजनाएं बनीं खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए। पर मजा देखिए, वे आज तक पूरी नहीं हुईं, आज तक चल रही हैं और लागत हर साल चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ रही है। सो, पलामू के चरित्र में आज भी कोई ठोस और उपलब्धिपरक बदलाव नहीं आया है। ऐसा भी नहीं कि रांची बहुत दूर है। कुल दूरी 160 किमी. है। झारखंड की राजनीति में पलामू के नेताओं की जबरदस्त दखल है। यह दखल इन्दिरा गांधी के समय भी रहा और सरकार में, पर, इन नेताओं ने पलामू के लिए कुछ विशेष किया हो, पता नहीं। कुछ ईमानदार नेता आज भी सिंचाई साधनों के लिए लड़ रहे हैं। कुछ मांग करते-करते चल बसे। पर, पलामू वहीं है। पलामू का एक चेहरा यह है। दूसरा चेहरा और भी बदसूरत है। तरह-तरह के नक्सली गुट यहां हावी हैं। जमींदारों के उत्पीडऩ से शुरू हुआ हक-हकूक की लड़ाई का आंदोलन आज कई ऐसे पड़ावों पर पहुंच बिखरा-बिखरा और भ्रष्ट नजर आता है। कुछ ऐसे जमींदरों के उत्पीडि़त लोग हैं, जो आज भी न्याय के लिए तरस रहे हैं। मलवरिया नरसंहार की याद से ही सिहरन पैदा हो जाती है। आज मलवरिया को लोग याद करना नहीं चाहते। पलामू की एक हकीकत यह भी है कि जो कभी यहां के राजा थे, वे आज रंक बन गए हैं। आज मजदूरी कर रहे हैं। पलामू का नंगा सच समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में आता रहता है। कई बड़े पत्रकारों ने यहां हफ्तों रहकर यहां की खाक छानी और रिपोर्टिंग की। मशहूर साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने यहां आकर अकाल पर कई उम्दा रिर्पोताज लिखे। रामशरण जोशी भी सत्तर के दशक में यहां आकर बंधुआ मजदूरों के दर्द को राष्ट्रीय स्तर पर ले गये। नब्बे के दशक में पी साइनाथ आए और कई रिपोर्टें लिखीं। महाश्वेता देवी ने पलामू को रामेश्वर की आंखों से देखा। वे कई बार यहां आईं। बंधुआ मजदूरों की मुक्ति आंदोलन से जुड़ीं। यहां की दशा, दर्द और दमन देखकर 'भूखÓ उपन्यास लिखा। पलामू के ही रहने वाले मनमोहन पाठक ने 'गगन घटा गहरानीÓ लिखकर स्तब्ध कर दिया। इस क्लैसिक रचना पर हिंदी में चर्चा नहीं होती। डाल्टनगंज के ही रहने वाले काशी में रह रहे कथाकार-पत्रकार श्याम बिहारी 'श्यामलÓ ने पलामू को केंद्र में रखकर 1998 में 'धपेलÓ उपन्यास लिखा, जिससे पहली बार व्यापक स्तर पर हिंदी समाज का ध्यान इस इलाके की ओर खिंचा! 'धपेलÓ पलामू के जनजीवन और वहाँ के चिरंतन संघर्ष की संपूर्णता में उजागर करने वाली पहली औपन्यासिक रचना के रूप में देश स्तर पर चर्चित हुआ, जिसकी सराहना ख्यात आलोचक नामवर सिंह तक ने की। 'श्यामलÓ का दूसरा उपन्यास 'अग्नि पुरुषÓ भी पलामू पर ही केन्द्रित है, जिसमें यहां के जनजीवन में मिथक के रूप में चर्चित 'सतुआ पाड़ेÓ की कथा के बहाने अपने समय-समाज की पड़ताल की गई है। युवा कथाकार राकेश कुमार सिंह ने भी अपने गांव-घर का ऋण लेखन से चुकाया। राकेश ने 'जहां खिले हैं रक्त पलाश', 'पठार पर कोहराÓ, 'साधो, यह मुर्दों का गांवÓ 'आपरेशन महिषासुरÓ के जरिए पलामू के नग्न, जटिल होते यथार्थ और इसके रक्तचरित्र को कई कोणों से देखने-समझने का प्रयत्न किया है। पलामू की यात्रा जारी है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के बड़े भाई संजीबचंद्र चट्टोपाध्याय ने पलामू नाम से एक यात्रा वृत्तांत लिखा था-1888 में। यह शायद पलामू पर लिखी कोई पहली साहित्यिक कृति मानी जा सकती है। 

बदलता पलामू, सिकुड़ता पलामू
पलामू आज सिकुड़ गया है। पहले गढ़वा और लातेहार दोनों ही पलामू के अंग थे। एक अप्रैल, 1991 को गढ़वा अनुमंडल को जिला घोषित किया गया और लातेहार अनुमंडल को दस साल बाद, चार अप्रैल, 2001 को जिला बना दिया गया। पलामू पहले परगना था। 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी के मातहत हुआ। एक जनवरी, 1892 को यह जिला बना। सौ साल बाद 3 मई, 1993 को इसे प्रमंडल बनाया गया। पलामू, धरती का प्राचीनतम भूखंड माना जाता है। पलामू के नामकरण पर भी तरह-तरह के कयास लगाए जाते हैं। पहला तो यही कि यहां कभी खूब पाला पड़ता था, जिसके कारण फसलों, पशु-पक्षियों और जन की काफी हानि होती थी। इसलिए इसे पलामू कहा गया-यानी पाला का घर। एक दूसरा मत यह है कि इस क्षेत्र में पलायनवादियों या भागे हुए लोगों को शरण मिलती रही। सो, यह पलामू कहलाया। तीसरा मत यह है कि औरंगा नदी के किनारे स्थित किले के राजाओं की कुलदेवी 'पालामाÓ थीं, इसलिए पलामू कहा गया। पालामा यानी पालन करने वाली मां। पलामू के डिप्टी कमिश्नर रहे मैकफर्सन ने अनुमान लगाया कि पलामू द्रविड़ गोत्र का शब्द है। द्रविड़ भाषा में पाल का अर्थ दांत और आम का अर्थ पानी होता है। इसी से पलामू शब्द निकला। अनुमान कई हैं। हवलदारी रामगुप्त 'हलधरÓ ने अपनी पुस्तक 'इतिहास पलामू काÓ और रामेश्वरम ने अपने कई लेखों में पलामू शब्द पर विचार किया है। अंग्रेज जब आए तो वे पलामू को पालामऊ च्ंसंउंन लिखने लगे। कहानियाँ और भी हैं फिर भी एक बात साफ है, जब से इस अंचल को पुकारा जा रहा है, वह शब्द पलामू ही है। अब यह शब्द कहां से आया है, किसने इसे प्रचलित किया, यह आज तक अज्ञात है। एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि यहां कई जातियां आईं और बस गईं और बाद में आगे बढ़ती गईं। पर एक जाति कोल के बारे में कोई जानकारी नहीं है। कोल आदिम काल से ही यहां की उपत्यका में निवास करते आ रहे हैं और आज भी हैं। अब ये आदिम जनजाति की श्रेणी में हैं। संजीब ने इनका खूब जिक्र किया है। ये आर्यों और द्रविड़ों के आगमन से पहले से ही यहां रह रहे हैं। वे जब आए तो ये जंगलों की ओर खिसक गए और जंगल ही इनका आसरा हो गया। बहुत बाद में द्रविड़ गोत्र की मार्ह जाति आई। कहा जाता है कि यह कर्नाटक की ओर से आई। इन्होंने कई किलों का निर्माण किया, जिनके ध्वंसावशेष आज भी मौजूद हैं। फिर इसी गोत्र के मध्यकाल में उरांव आए। ये रोहतास होते हुए पलामू आए और यहां लंबे समय तक रहने के बाद रांची की ओर चले आए। रोहतासगढ़ का किला उरांवों का ही बनवाया हुआ बताया जाता है। मुगलों ने आक्रमण कर कब्जा कर लिया तो फिर वे वहां से पलायन कर गये। मुगल और उरांवों के संघर्ष की कथाएं आज भी लोकगीतों में सुरक्षित हैं। इसमें महिलाओं ने मोर्चा संभाला था। इस संघर्ष की याद में ही 'जनी शिकारÓ पर्व मनाया जाता है। पलामू के इतिहास में रकशेलों का भी बड़ा महत्व है। उनका यहां दो हजार साल पुराना इतिहास मिलता है।

पौराणिक आख्यानों में पलामू
पौराणिक आख्यानों पर विश्वास करें तो पुराने लोग कहते आ रहे हैं कि इस वन प्रांत को महाराज दशरथ ने रामजी के विवाहोत्सव के समय बाजा बजाने वालों को ईनाम में दिया था। महाभारत काल में यह वन खंड प्रतापी राजा बब्रुवाहन के राच्य में शामिल था। पांडवों ने यहां अज्ञातवास में कुछ समय भी बिताया थे। हुसैनाबाद में भीम चूल्हा को लोग उसी से जोड़कर देखते हैं। बौद्ध काल के भी कुछ अवशेष मिले हैं। हुुसैनाबाद के आस-पास प्राचीन इतिहास के कई सूत्र मौजूद हैं। प्रखंड के पंसा व सहराविरा गांव में दो स्तूप मिले हैं। स्तूप मिट्टी के बने हैं। दूसरा स्तूप सहारविरा गांव में मिला है। यह पंसा गांव से 5 किमी. दूर है। इस स्तूप की ऊंचाई तीन मीटर है और परिधि आठ मीटर। इसमें पकी ईंटों का भी इस्तेमाल हुआ है। स्तूप के बीच में पत्थर का स्तंभ है। स्तंभ के ऊपरी हिस्से पर बुद्ध की आकृति है। यह 6वीं-7वीं शताब्दी का है। पलामू में एक रॉक पेंटिंग मिली है। हुसैनाबाद अनुमंडल के महुदड़ पंचायत की लिखलाही पहाड़ी पर के इनसाइक्लोपीडिया रामेश्वरम मछली के जीवाश्म का भी जिक्र करते हैं, जो पलामू के रजडंडा, महुआडांड़ में मिला था। नेतरहाट की पहाड़ी में आठ लाख वर्ष पूर्व च्वालामुखी के विस्फोट से प्राकृतिक रंगशाला का निर्माण हुआ था, जो आज भी है।
स्पष्ट है कि पलामू का इतिहास ज्ञात इतिहास से कहीं अधिक प्राचीन है। जिले के शाहपुर, अमानत पुल, रंकाकलां, दुर्गावती पुल, बजना, वीरबंध, मैलापुल, चंदरपुर, झाबर, हाथीगारा एवं बालूगारा, नाकगढ़ पहाड़ी आदि स्थलों पर खुदाई में पूर्व, मध्य और उत्तर पाषाणकाल के साथ नव पाषाणकाल के पत्थर के औजार भी प्राप्त हुए। इनमें कुल्हाड़ी, स्क्रेपर, ब्लेड, बोरर और ब्यूरिम मुख्य हैं। भवनाथपुर के निकट प्रागैतिहासिक काल के दुर्लभ शैलचित्र भी मिले हैं। कई प्राकृतिक गुफाएं भी यहां हैं।

औरंगा नदी को निहारता पलामू किला
औरंगा नदी के तट पर पलामू किला है। 17वीं शताब्दी से चेरो वंश के राजा यहीं से राज करते थे। इस वंश के प्रथम शासक भागवत राय थे। उनका शासन 1613 ई. में शुरू हुआ था। इस वंश के सबसे प्रतापी राजा थे मेदिनी राय। गढ़वा से 16 किमी उत्तर-पूर्व में विश्रामपुर में एक गढ़ है। इसे पलामू के राजा जयकिशन राय के भाई नरपत राय ने बनवाया था। डालटनगंज के पास भी एक अधूरे किले के अवशेष हैं। इसे 18वीं शताब्दी में पलामू के ही राजा गोपाल राय ने बनवाना शुरू किया था लेकिन किला अधूरा रह गया। पलामू में पुराना किला और नया किला हैं। इतिहास की किताबों में दर्ज तथ्य के अनुसार पुराने किले से 12वीं शताब्दी की बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में एक मूर्ति मिली थी।

च्यवन ऋषि की संतान चेरो
चेरों का काल पलामू के लिए स्वर्णकाल था। इनकी उत्पत्ति च्यवन ऋषि से बताई जाती है। इस जाति से सबसे पहले नेपाल की तराई में कुमाऊं प्रांत में अपना राच्य स्थापित किया। इसके बाद इस वंश ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने राच्य कायम किए। कालांतर में इनके वंश के भगवंत राय और पूरनमल पलामू पहुंचे। जिस समय ये पलामू पहुंचे, उस समय पलामू किले पर राजा मानसिंह का अधिकार था। दोनों ने मानसिंह के दरबार में नौकरी कर ली। दोनों की सूझ-बूझ और बहादुरी से प्रसन्न होकर इन्हें सेना की कमान सौंप दी गई। लेकिन एक विश्वासघात से पलामू की तकदीर ही नहीं, इतिहास भी बदल गया। हुआ यह कि राजा मान सिंह के पुत्र का विवाह सरगुजा में तय हुआ। वे बारात लेकर सरगुजा चले गए और किले का भार अपने सरदार भगवंत राय पर छोड़ गए। मौका पाकर भगवंत राय ने मानसिंह के पूरे परिवार को मार डाला और खुद राजा बन बैठा। सेना लेकर वह आगे बढ़ा और बारात वापस लेकर लौट रहे मान सिंह का मुकाबला किया। मानसिंह हार गए और सरगुजा लौट गए। वहां मान सिंह ने वही किया जो भगवंत ने उनके परिवार के साथ किया। उन्होंने सरगुजा के राजा की हत्या कर राच्य अपने अधीन कर लिया और पूरनमल को अपना मंत्री बना लिया। यहीं से रकशेल राजा का अंत और चेरो राजवंश का उदय होता है। 

किले पर आक्रमण और मस्जिद का निर्माण
चेरो राज के संस्थापक भगवंत राय के पोते अनंत राय के शासन काल में औरंगजेब का तत्कालीन बिहार सूबेदार दाऊद खां ने पलामू पर कब्जा कर लिया। लेकिन उसके वापस लौटते ही चेरो राजा ने पुन: अधिकार कर लिया। इस बीच और घटनाएं हुईं। दाऊद खां ने पुन: 3 अप्रैल 1660 को उसे पराजित किया। इस बार उसने किले को ही नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि किले के अंदर मंदिरों को तोड़कर मस्जिद का निर्माण भी करवाया। उसी तरह किले के सिंहद्वार पर स्थित मंदिर को भी तोड़कर मस्जिद बनवाई। इसके ध्वंसावशेष आज भी किले के अंदर और बाहर मौजूद हैं। मुगलों के आगमन के साथ ही पलामू में उथल-पुथल तेज हो गई। अंग्रेजों के समय तो पूरा क्षेत्र धधक उठा। 1857 की आग यहां भी लगी और नीलांबर-पीतांबर ने इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया। 1857 के संग्राम के करीब 26 साल पहले ही झारखंड की जनजातियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का राजनीतिक अर्थ भी पहली बार 1831 के कोल विद्रोह से उजागर हुआ था। उसमें मुंडा, हो, उरांव, भुइयां आदि जनजातियां शामिल थीं। इस विद्रोह का केंद्र रांची, सिंहभूम और पलामू था। इसके बाद तो पलामू रह-रहकर धधकता रहा। और आज भी धधक रहा है। भले ही आज कारण दूसरे हों।

सेरेंगसिया के शहीद

सेरेंगसिया घाटी शहीदों की याद दिलाती है। यह अतीत का एक पन्ना है, जिस पर बहुत कम चर्चा होती है। यह उस आंदोलन की याद दिलाता है, जिसमें अंग्रेजों को हो आदिवासियों ने अपनी बहादुरी से पस्त कर दिया था।  
घटना सन् 1820-21 की है। अंग्रेजों के खिलाफ कोल्हान में चले विद्रोहों पर काबू पाने में ब्रिटिश अफसरों को सफलता मिल चुकी थी। कोल्हान क्षेत्र में हुए दर्जनों विद्रोहों पर काबू पाने के बाद कोल विद्रोह को शांत करना उनके लिए बड़ी उपलब्धि मानी गई। लेकिन, अंग्रेजों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए सत्ता हासिल करनेवाली ब्रिटिश सरकार को ही आदिवासियों से समझौता करना पड़ा। तब के कमिश्नर थामस विल्किंसन से औपचारिक समझौते के बाद विल्किंसन रूल बना। इसके तहत स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की स्वायत्तता को संवैधानिक मान्यता मिल गई, लेकिन, उनका दमन चक्र चलता रहा। जब इस दमन का दायरा बढ़कर बच्चों और महिलाओं तक आया तो स्वभावगत लड़ाके हो आदिवासी इसे कबूल नहीं कर पाए। इसक बाद 1831-32 में विद्रोह फूट पड़ा, जिसे इतिहास में कोल विद्रोह के नाम से दर्ज किया गया। इस विद्रोह में अंग्रेजों का काफी नुकसान हुआ। हालांकि अंग्रेजों ने पूरी ताकत से इस कोल विद्रोह भी दबा दिया। 
इसके बाद 18 जनवरी 1833 को सरायकेला में हिल असेंबली बुलाई गई। इसमें कुछ मुंडा मानकी सरदारों ने कंपनी शासन की अधीनता स्वीकार कर ली। फरवरी 1837 तक अंग्रेजों ने पुलिसिया कार्रवाई की बदौलत बाकी बचे गांवों में अपनी हनक कायम कर ली। इसके बाद दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी की स्थापना हुई और थामस विल्किंसन को एजेंसी का एजेंट बना दिया गया। इसके बाद तो विद्रोह की ज्वाला धधक उठी। इस आग ने इस घाटी को अपनी चपेट में ले लिया। 
सेरेंगसिया घाटी की कहानी यहीं से शुरू होती है। राजबासा पीड़ (इलाका) के पोटो सरदार के नेतृत्व में 22 पीड़ों के लोगों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। कंपनी की सेना कई मौकों पर मुंह छिपाकर भागी। इससे हो लड़ाकों का हौसला बढ़ा। वालंडिया में गुप्त सभा हुई। इसमें सेरेंगसिया और बागलिया घाटियों को अपने अधिकार में लेने का निर्णय लिया गया। ग्राम प्रधानों को तीर भेजकर विद्रोह में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया। बगावत हो चुकी थी। अंग्रेजों को इसका भान भी नहीं था कि हो आदिवासी इतनी मुस्तैदी से विरोध करेंगे। इससे विचलित विल्किंसन ने 12 नवंबर 1837 को चाईबासा में अपने अफसरों के साथ बैठक की। विरोध को दबाने के लिए 17 नवंबर को कैप्टन आर्मस्ट्रांग के नेतृत्व में 400 सशस्त्र सैनिक 60 घुड़सवार सिपाहियों और दो तोपों के साथ बाढपीड़ रवाना गुए। इसकी खबर पोटो सरदार को लग गई। 19 नवंबर को पोटो सरदार की विद्रोही सेना ने आर्मस्ट्रांग की टुकड़ी पर हमला बोल दिया। भीषण लड़ाई हुई और कंपनी की सेना को हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद अंग्रेजों ने पोटो सरदार के गांव पर हमला कर दिया। उनके पिता को कैद कर लिया गया. तड़ागहातु, रुईया, जयपुर आदि गावों पर भी हमला किया गया। महिलाओं तक को बंदी बना लिया गया। तड़ागहातु गांव में आग लगा दी गयी। बर्बर दमन किया गया। आठ  दिसंबर को पोटो सरदार गिरफ्तार कर लिए गए। उनके सहयोगियों की भी गिरफ्तारी हुई। एक जनवरी 1838 को जगन्नाथपुर में हजारों लोगों के बीच सेरेंगसिया घाटी के लड़ाके पोटो सरदार, नारो हो और बड़ाय हो को फांसी दे दी गई। एक दिन बाद 2 जनवरी को बोड़ो हो और पंडुआ हो को सेरेंगसिया गांव में सार्वजनिक तौर पर फांसी पर लटका दिया गया। 
इतनी भीषण लड़ाई के बावजूद इतिहास के पन्नों में इन हो लड़ाकों को सम्मान देने में थोड़ी कंजूसी की गई। किसी एक इलाके के पांच-पांच लोगों को एक साथ फांसी पर चढ़ा देना कोई सामान्य घटना नहीं थी. आज भी सेरेंगसिया के लोग इस शहादत की तारीखों पर मेला लगाते हैं। एक-एक महीने तक कार्यक्रम होता है। अपने स्तर से चंदा कर यह कार्यक्रम लोग करते हैं। 
हो किसी राजतन्त्र के अधीन कभी भी नहीं रहे। इनका जीवन स्वाधीन था। इनकी पहचान पराक्रमी योद्धाओं के रूप में थी। इनके धनुष से निकला तीर का निशाना कभी नहीं चूकता था। पोड़ाहाट के राजा तथा कई अन्य राजाओं ने इन क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए कई-कई बार प्रयास किये पर 'होÓ समुदाय के लोगों ने इन्हें खदेड़कर इनके छक्के छुड़ा दिए तथा इन राजाओं को हमेशा मुंह की खानी पड़ी। अंग्रेजों के साथ भी ऐसा ही हुआ। हो कभी शांत नहीं हुए। बीसवीं सदी में भी इनकी लड़ाई अपनी स्वतंत्रता के लिए जारी रही। 

देश का पहला जन आंदोलन 1855 का हूल

सिदो और कान्हू पालकियों पर (हैं),
चांद और भायरो घोड़ों पर (हैं),
ऐ चांद, देखो, ऐ भायरो, देखो,
घोड़े (अब) मलिन हो रहे हैं।।
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सिर गड़ धंस (ढह) गया,
शिखर गढ उजड़ गया,
शिखर के सिपाही (सैनिक)
तितर-बितर हो गए,
वैसे ही, हे बड़ी बहन (दीदी) हमलोग भी,
माता-पिता के नहीं रहने पर तितर
बितर हो गए।


यह गीत आज भी संताल में गूंजता है। उस ऐतिहासिक हूल की याद दिलाता है, जो भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम 1857 से पहले 1855 में फूट पड़ा था। हालांकि सही अर्थों में देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम आदिवासी क्षेत्रों में ही फूटा था और 1855 का यह हूल इस अर्थ में पहला था, क्योंकि इसका क्षेत्र काफी व्यापक था। छोटानागपुर के रामगढ़ से लेकर संताल परगना तक। यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी। महीनों की तैयारी थी। उस समय चार सौ किमी दूर तक सूचना देना और एक तिथि को एक जगह एकत्रित होना, बड़ी घटना था। इस हूल के पीछे ऐतिहासिक कारण थे और जिसके नायक थे चार भाई सिदो-कानू, चांद-भैरव। 
 कहा जाता है कि दामिन ई-कोह का निर्माण 1833 में अंग्रेजों ने किया। यही आज संताल परगना है। अंग्रेजों ने छोटानागपुर से संतालों को जंगल साफ  करने और कृषि योग्य भूमि बनाने और बाद में रेल की पटरियां बिछाने के लिए 1800 ई के आस-पास बसाना शुरू किया था। इसका मुख्य कारण संताल कठिन परिश्रमों और कठिन कार्य करने में निपुण थे। संतालों को इस क्षेत्र में बसाने का एक और प्रमुख कारण था, पहाडिय़ा जनजाति द्वारा लगातार विद्रोह। उसे भी कम करने की अपनी नीति के चलते अंग्रेजों ने संतालों को इस क्षेत्र में बसाना शुरू किया। चालीस-पचास सालों में अच्छी-खासी संख्या में संताल बस गए, लेकिन अंग्रेजों ने संतालों के साथ भी वही अत्याचार शुरू कर दिया। इसका नतीजा यह रहा कि सन् 1855 में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमींदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संताल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। इसे संताल विद्रोह या संताल हूल कहते हैं। संताली भाषा में हूल शब्द का शाब्दिक अर्थ है विद्रोह। यह अंग्रेजों के विरुद्ध पहला सशस्त्र जनसंग्राम था। सिदो-कान्हू, चांद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संताल हूल का नेतृत्व, शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में किया। 1852 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा आरम्भ किए गए स्थाई बंदोबस्त के कारण जनता के ऊपर बढ़े हुए अत्याचार इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण था।
इसका जिक्र उस समय के एक अंग्रेज अधिकारी राबर्ट कार्टियर्स की किताब हाड़मा विलेज में भी किया है। उसने अपनी इस किताब में दो महाजनों के नाम का भी उल्लेख किया है- केनाराम भगत और बेचाराम भगत। महेशलाल दारोगा के अत्याचार से विद्रोह की शुरुआत होती है। महाजन सूदखोर शुरू में ऋण देते थे और उसका तीन सौ गुना वसूलते थे। 
संताली लोकगीत में भी देख सकते हैं-
 सिदो, तुमने ख्ूान में क्यों नहा लिया है
कान्हू तुम हूल हूल क्यों चिल्लाते हो।
अपने लोगों की खातिर हमने खून में नहाया है।
हालांकि अंग्रेजों की क्रूर नीति के कारण 1854 में असंतोष फैलने लगा था। संतालों के मुखिया इन दिकुओं को उखाड़ फेंकने का उपाय सोचने लगे। संतालों पर अत्याचार बढ़ गया। खेत बंधक रख कर अपने कब्जे में कर लेते थे। गरीब संताल खेत नहीं छुड़ा पाते थे। शोषण अत्याचार का बदला लेने के लिए संताल मांझियों ने राय सलाह कर बड़े-बड़े महाजनों के घर डाका डाला और वे पकड़े गए। इसमें संतालों को सजा दिलाने में महेश लाल दारोगा का हाथ था। संताल बदला लेना चाहते थे।
इसी बीच बरहेट के भोगनाडीह में सिदो-कान्हू, चांद, भैरव, झानो-फूलों, भाई बहनों ने संघर्ष छेड़ दिया। 30 जून 1855 को एक सभा बुलाई और जिसमें दस हजार संताल जमा हुए। जाहेर एरा ने बताया है कि सिदो तुम सूबा (राजा) हो और कान्हू सब सूबा। यह धरती तुम लोगों का है। अब तुम लगान वसूल करो। तब भोगनाडीह में मिट्टी का जाहेर थान बना कर पूजा पाठ शुरू हो गया। दूसरे दिन पंचकटिया बाजार में स्थित देवी मंदिर में पूजा की। एके पंकज ने लिखा है, 'यह कोई आकस्मिक युद्ध नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ एक सुनियोजित हूल था, जिसकी तैयारियां भोगनाडीह गांव के सिदो मुर्मू अपने भाइयों कान्हू, चांद व भैरव, इलाके के प्रमुख संताल बुजुर्गों, सरदारों और पहाडिय़ा, अहीर, लुहार आदि अन्य स्थानीय कारीगर एवं खेतीहर समुदायों के साथ एकताबद्ध होकर कर रहे थे। जब सारी सामरिक तैयारियां पूरी हो गई, सैन्य दल, छापामार टुकडिय़ां, सैन्य भर्ती-प्रशिक्षण दल, गुप्तचर दल, आर्थिक संसाधन जुटाव दल, रसद दल, प्रचार दल, मदद दल आदि गठित कर लिए गए, रणनीतिक योजना को अंजाम दे दिया गया, तब 30 जून को विशाल सभा बुला कर अंग्रेजों को देश छोडऩे का 'सम्मनÓ जारी कर दिया गया। इस सम्मन यानी 'ठाकुर का परवानाÓ को सिदो परगना के निर्देश पर किरता, भादू और सुन्नो मांझी ने लिखा था। गौर करने वाली बात है कि हूल संबंधी सम्मन और अन्य प्रचार सामग्रियां हिंदी, बांग्ला, संताली भाषा तथा कैथी और बांग्ला लिपि में लिखी गई थी। यही नहीं, ब्रिटिश मुद्रा को अमान्य करते हुए आर्थिक गतिविधियों के लिए विशेष तौर पर हूल के लड़ाकों ने नए सिक्के जारी किए थे। भागलपुर, बीरभूम के कमिश्नर और जिला मजिस्ट्रेटों और स्थानीय पुलिस थानों व अन्य प्रमुख अधिकारियों को जो सम्मन भेजे गए, उसमें स्पष्ट कहा गया था-1. राजस्व वसूलने का अधिकार सिर्फ संतालों को है। 2. प्रत्येक भैंस-हल पर सालाना 2 रु., बैल-हल पर एक आना और गाय-हल पर आधा आना लगान लिया जाएगा। 3. सूद की दर एक रुपये पर सालाना एक पैसा होगा। 4. सूदखोरों, महाजनों और जमींदारों को तत्काल यह क्षेत्र खाली कर चले जाना होगा। 5. 'ठाकुर जिउÓ (संतालों के सर्वोच्च ईश्वर) के आदेश पर समूचे क्षेत्र पर संतालों का राज पुनस्र्थापित किया जाता है और सिदो परगना 'ठाकुर राजÓ के शासन प्रमुख नियुक्त किए गए हैं। 6. सभी ब्रिटिश अधिकारी और थानेदार को सूचित किया जाता है कि वे तत्काल आकर सिदो परगना के दरबार में हाजिरी लगाएं अन्यथा उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।Ó
जाहिर है कि ब्रिटिश शासन इसे मानने को तैयार नहीं थी। लिहाजा जुलाई का पहला सप्ताह बीतते ही संताल और स्थानीय जनता ने युद्ध छेड़ दिया। बाजार, महाजनों-सामंतों के ठिकानों, थानों, ब्रिटिश प्रशानिक केंद्रों और थानों पर हमला बोल दिया गया। 
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हूल की सूचना पाकर महेश लाल दत्ता नामक दारोगा दीघी थाना का दारोगा वहां पहुंचा। विद्रोहियों ने उस दारोगा की हत्या कर दी। यह हूल की पहली कारगर घटना थी। यह घटना सात जुलाई, 1855 की है। शीघ्र ही विद्रोहियों ने बरहेट बाजार को लूट लिया, क्योंकि यह महाजनों का गढ़ था। चारों तरफ आतंक मच गया। डाक एवं संचार व्यवस्था नष्ट हो गई। 12 जुलाई को सिदो-कानू और भैरव ने सलामपुर लूटने के बाद पाकुड़ के जमींदार को लूटा। पाकुड़ छोडऩे के बाद संतालों ने पाकुड़ की पूर्वी सीमा पर स्थित बल्लमपुर व अन्य गावों को लूटा। इसके बाद मुर्शिदाबाद जिले की सीमा पर बढ़े। वीरभूम में भी यह आग फैल चुकी थी। 13 जुलाई को पीरपैंती के निकट एक गांव में रेल कर्मचारी जख्मी हुए। 16 को पीरपैंती के निकट  हथियारबंद संतालों के एक दल के साथ मेजर बर्रोस की सैनिकों के साथ मुठभेड़ हुई। जिसमें कुछ अधिकारी समेत 25 सैनिक मारे गए। विद्रोह संताल दामिन-ए-कोह क उत्तर मुर्शिदाबाद की सीमा पर तथा गंगा के दक्षिण तट पर कहलगांव से राजमहल के बीच भी फैल गया था। 17 अगस्त को एक घोषणा की गई कि सभी विद्रोहियों को माफी दे दी जाएगी। पर विद्रोही नहीं माने। लगभग तीन हजार संतालों का जत्था भागलपुर जिले की रक्षादंगल नामक स्थान को लूटा। अक्टूबर में चारों भाइयों के नेतृत्व में दो सौ संतालों ने दुमका के दक्षिण स्थित अंबा हरना को लूटा। अंतत: दस नवंबर, 1855 को मार्शल लॉ की घोषणा कर दी गई। 30 नवम्बर 1855 को विश्वासघातियों ने सिदो को पकड़ कर भागलपुर की सेना को सौंप दिया। 20 फरवरी को कान्हू को जामताड़ा के पास ऊपर बंधा नामक स्थान पर कुजरों का घटवार सरदार ने कानू को पकड़ कर अंग्रेजों को सौपा और उसे 23 फरवरी 1856 में फांसी दी गई। चांद-भैरव सहित अन्य नेताओं की यही दशा हुई। 
हूल का क्षेत्र
संताल हूल केवल संताल तक सीमित नहीं था। एक व्यापक आंदोलन ने कई जिलों को प्रभावित किया था। ब्रिटिश शासन क्षेत्र के विद्रोह दबाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। कलकत्ता, बहरामपुर, सूरी, रानीगंज, देवघर, भागलपुर, पूर्णिया, मुंगेर, बाढ़ यहां तक कि पटना के अफसर, सेना को हूल पर नियंत्रण के लिए प्रयास करने पड़े। हजारीबाग के संताल संताल परगना के संताल को अपना सगा मानते थे, क्योंकि वे यहीं से ले जाए गए थे। हजारीबाग में भी संताल सक्रिय थे। वीरभूम में भी हूल का प्रभाव था। मुर्शिदाबाद के नवाब विद्रोह से परेशान था। जाहिर है कि हूल के नेताओं ने हूल को एक व्यापक क्षेत्र में फैलाने का काम किया था। इसलिए, इसके व्यापक क्षेत्र को देखते हुए इसे आसानी से देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम मानना चाहिए। यह एक जन आंदोलन था। संताल परगना के डिप्टी कमिश्नर के रिकार्ड आफिस में जो संताल कैदियों से संबंधित दस्तावेज मिले हैं, उनमें 251 कैदियों की सूची मिली है। इनमें 191 संताल, 34 नाई, पांच डोम, 6 धांगड़, सात कोल, एक ग्वाला, 6 भुइयां, एक रजवार पाए गए हैं, जो विभिन्न गांवों के रहने वाले थे। यही नहीं, एक और महत्वपूर्ण बात है। भागलपुर के कमिश्नर ने 28 जुलाई, 1855 को बंगाल सरकार के सेके्रटरी को लिखा कि ग्वाले, तेली व अन्य जातियां संतालों का नेतृत्व कर रही हैं। इससे साबित होता है कि इस आंदोलन में हर जाति सक्रिय थी। तेली, कुम्हार, लोहार, मोमिन, चमार, डोम भी सक्रिय थे। डोम गुप्तचर एवं संवाद वाहक का काम बड़ी कुशलता से करते थे। और, लोहार क्रितू व सूना नामक डोम ने परवाना लिखने का काम किया था और गुप्तचर का काम भी। इसलिए, इस हूल में सभी जातियों का योगदान था और यह एक जनक्रांति थी। 
संजय कृष्ण

जीवंत परंपरा को पुनर्जीवन की आस


चलना ही नृत्य, बोलना ही गीत। झारखंड की यह पहचान है। यही संस्कृति है। परंपरा है। गांव-गांव। एक जीवित परंपरा अखरा की, जिसे अब पुनर्जीवन की जरूरत है। झारखंड की 32 जनजातियों के अपने गीत हैं, अपने नृत्य है। नृत्य के कई भेद हैं। बंदी उरांव बोलते हैं कि उरांव नृत्य में साढ़े पांच हजार स्टेप हैं। इस तरह हर जनजातीय नृत्य में। यहां 12 महीने में 13 नृत्य हैं और हर नृत्य के अंदर भी कई-कई। यह लोक की थाती है। यहां चार कोस पर बानी ही नहीं बदलती, नृत्य और संगीत की परिभाषा भी बदल जाती है। यह धरती इतनी समृद्ध है। लेकिन आज जरूरत लोक संगीत व कला को बचाने की है। राज्य बने 19 साल से ऊपर हो गए, लेकिन यहां न संगीत अकादमी खुल सका, न भाषा अकादमी। गांव-गांव संगीत-गीत और साहित्य की पांडुलियां दीपकों का निवाला बन रही हैं। कलाकार पेट से जूझ रहे हैं। मनपूरन नायक कहते हैं अखरा तभी बचेगा, जब कलाकार बचेंगे। उनके सामने पेट की समस्या है। नागपुरी में एक कहावत है-पेट में भात ना, ड्योढ़ी पे नाच। पहले पेट की भूख मिटनी चाहिए। कलाकार ही नहीं रहेंगे, तो अखरा व कला कैसे बचेगी? झारखंड की पहचान, यहां के खनिज संपदा से नहीं, यहां की कला से है। यहां दसियों हजार पुरानी कला का दिग्दर्शन होता है, लेकिन सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की जाती। सब बर्बाद हो रहा है। संताल के फैले जीवाश्म को भी नष्ट किया जा रहा है। यह सब अपने झारखंड में। बहुत दुखद स्थिति है। आखिर, किसी भी राजनीति दलों के घोषणा पत्र में कला-साहित्य-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर एक शब्द क्यों नहीं रहता, जबकि हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है। डॉ रामदयाल मुंडा जी कहते थे-जे नाची से बाची। यह कैसे संभव होगा?
विलुप्त हो रहे वाद्य यंत्र
झारखंड की हर भाषा में गीत है। उसी तरह हर जनजातीय समुदाय के वाद्य भी हैं। कुछ वाद्य साझा हैं, लेकिन आज कुछ वाद्य तो विलुप्त हो गए, कुछ विलुप्ति के कगार पर हैं। ऐसा इसलिए कि हम इनके संरक्षण के प्रति उदासीन हैं। बंदी उरांव कहते हैं कि आज केंदरा, खोचोर, टेचका, टुहिला, मोहनबंसी, तिरियो, मुरली, भेर, बरसिंध, सरगी, पैजन, सोयको आदि वाद्य चलन से बाहर हो गए। आखिर, इनका संरक्षण कैसे होगा? इसके लिए समाज और सरकार दोनों को अपनी जवाबदेही लेनी होगी। भाषा का मरना, संस्कृति का मरना है। अब अपनी भाषा और संस्कृति से दूर हो रहे हैं, इसलिए हमारे जीवन में रस घोलने वाले वाद्य भी विलुप्ति के कगार पर खड़े हैं।

कला-संस्कृति विभाग की ओर से हर शनिवार को सनिपरब का आयोजन किया जाता था। इसके पीछे उद्देश्य यही था कि यहां के लोक कलाकारों को सप्ताह में एक न्यूनतम मानदेय दिया जाए ताकि वे अपनी कला को संरक्षित कर सकें और अगली पीढ़ी तक पहुंचा सके, लेकिन यह भी एक डेढ़ साल के बाद साल भर से बंद हो गया। इससे सरकार की अपने राज्य की कला के प्रति गंभीरता समझ सकते हैं। जब ऐसे आयोजन की यहां जरूरत है ताकि कलाकारों के पेट को भात नसीब हो सके। भूखे पेट कला का संरक्षण संभव नहीं है। कला-मर्मज्ञ डॉ गिरिधारी राम गौंझू कहते हैं, अपनी संस्कृति को बचाने के लिए कला के उपादानों को बचाना जरूरी है। नृत्य, संगीत, वाद्य का संरक्षण जरूरी है। यह काम सरकारी स्तर पर ही संभव है। दूसरे, यहां के लोक कलाकारों को बाहर भी भेजने की जरूरत है। दूसरे देशों में जब यहां के कलाकार जाते हैं तो खूब प्रभावित करते हैं। इसे बढ़ाने की जरूरत है। यहां की लोक कला काफी समृद्ध है। छऊ की अंतरराष्ट्रीय पहचान बन गई है, दूसरे कला विधाओं को भी इस पहचान तक लेना चाहिए। कलाकार मरते जा रहे हैं, उनके साथ विधा भी मरती जा रही है। यह बहुत दुखद है। बंगाल सरकार अपने कलाकारों को पेंशन दे रही है। पूर्वोत्तर अपने लोक कलाकारों को आर्थिक सहायता दे रहा है। पर, यहां नहीं है। इसकी पहल होनी चाहिए।

'तीर्थÓ की उपेक्षा का मलाल पर, लोकतंत्र में आस्था बरकरार


बिसुआ टाना भगत जतरा टाना भगत के वंशज हैं। वे चिंगरी गांव के नया टोला में रहते हैं। गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड का ऐतिहासिक गांव है। गांव कहना ठीक नहीं, यह वास्तव में तीर्थ है। मुख्य सड़क से गांव के अंदर जो पीसीसी सड़क जाती है,  सौ कदम अंदर चलने पर दाहिने ही पहला घर उनका है। घर में खेत है या खेत में घर कहना मुश्किल है। गांव के मकान मिट्टी हैं और छप्पर खपरैल के। अभी बिसुआ को पीएम आवास की कुछ राशि मिली है तो अपना नया मकान बना रहे हैं। मलाल उन्हें इस बात का है कि उन्हें भी वही राशि मिली, जो दूसरों को इस मद में मिलती है।
पर, ज्यादा दुख उन्हें इस बात का है कि राज्य सरकार ने जो पांच एकड़ जमीन दी है, उस पर किसी और का कब्जा है। आज तक उन्हें वह जमीन नसीब नहीं हो सकी। जब जमीन को अपने अधिकार में लेना चाहा तो किसी और ने दावा कर दिया और अब मामला कोर्ट में पहुंच गया। दो बार गुमला कोर्ट गया, लेकिन सुनावाई से आगे बात नहीं बढ़ पाती तो अब जाना ही बंद कर दिया।
सुबह-सुबह की बेला में, जब सूर्य की किरणें धरती को चूम रही थीं, बिसुआ के माथे की नसों में उभार दिखने लगा था। बोलने लगे, यहां गांव में उनका स्मारक भी ढंग का नहीं बना। शहीद आवास के नाम पर भी केवल खानापूर्ति की गई है। उनके बेटे श्रीचंद कहते हैं कि हमारी आस्था लोकतंत्र में हैं। हम सिर्फ मतदान ही कर सकते हैं। लेकिन जो जीतकर जाता है, मतदाता को भूल जाता है। श्रीचंद कहते हैं हमारे बच्चों को शिक्षा की भी कोई सुविधा नहीं। फीस नहीं जमा करने पर स्कूल वाले बच्चों को भगा देते हैं। सरकार कम से कम हमारे बच्चों को शिक्षा तो दे ही सकती है। परिवार की अपेक्षा है कि यहां जतरा टाना भगत के नाम पर भव्य एक स्मारक बने। यह टाना भगतों का तीर्थ है।  
युवक मनोज भगत भी यही कहते हैं। चिंगरी गांव के ही हैं। गांव के मुहाने पर ही जतरा की एक एक आदमकद प्रतिमा लगी है। चारों तरफ दीवार खड़ी कर दी गई है। मनोज दिल्ली में काम करते हैं और मतदान करने के लिए अपने गांव आए हैं। कहते हैं कि यहां हर गुरुवार को टाना भगत आते हैं, पूजा-पाठ और भजन करते हैं। अब कुछ ही बचे हैं, जिनका विश्वास जतरा टाना भगत के धर्म में हैं। चुनाव को लेकर उनमें कोई शंका नहीं। वे बताते हैं कि यहां कमल की हवा है। पर, एक दूसरे युवा बाबूलाल उरांव तीर की बात करते हैं। वे तीर की कई उपलब्धियां गिनाते हैं। कहते हैं कि दर्जन भर विद्या का मंदिर बना। आज शिक्षा बहुत जरूरी है। बाबूलाल के दो बड़े भाई बेहतर इलाज के अभाव में समय से पहले चल बसे। सो, पुलिस में लगी उनकी नौकरी को उनके पिता ने छुड़वा दिया और खेती-बारी में लगा दिया। वे खेती करते हैं। कहते हैं कि यहां खेती प्रकृति पर निर्भर है। लेकिन यहां सिंचाई की व्यवस्था हो जाए तो यह इलाका पंजाब को पीछे छोड़ सकता है। दोनों युवा एक ही गांव के हैं, आदिवासी हैं, लेकिन दोनों के विचार भिन्न हैं। दोनों साफगोई से बात करते हैं।